बांग्लादेश में बीएनपी नेता तारिक रहमान की एंट्री से बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के पसीने छूट रहे हैं. पहले जमात जमात-ए-इस्लामी ने बीएनपी के साथ चुनाव से पहले समझौता करने की कोशिश की, लेकिन बीएनपी ने समझौता करने से इनकार कर दिया तो जमात ने अपनी साख बचाने के लिए NCP सहित 10 छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन किया है. शेख हसीना की सरकार के पतन में जिन छात्रों ने अहम भूमिका निभाई थी, उन्होंने ही नई पार्टी एनसीपी बनाई है, लेकिन इन पार्टियों से समझौता कर भी जमात को अपनी जीत का भरोसा नहीं है.
अब जमात चुनाव के बाद बीएनपी सरकार को समर्थन देने की बात कर रहा है. जमात मुस्लिस कट्टरपंथियों की पार्टी है और 1971 के स्वतंत्रता संग्राम में पाकिस्तान को समर्थन किया था और हाल में बांग्लादेश में हिंसा और अल्पसंख्यकों पर हमले के लिए जमात के समर्थक जिम्मेदार रहे हैं.
हाल में बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने कहा कि हम कम से कम पांच साल के लिए एक स्थिर देश देखना चाहते हैं. अगर राजनीतिक पार्टियां उस मकसद के लिए एक साथ आती हैं, तो हम मिलकर सरकार चलाएंगे.” 12 फरवरी को बांग्लादेश नेशनल पार्लियामेंट की सभी 300 सीटों पर एक ही राउंड में चुनाव होंगे. उसी दिन जुलाई चार्टर पर एक रेफरेंडम भी होगा. चुनाव से पहले हुए कई ओपिनियन पोल बताते हैं कि चुनावों में BNP पहले नंबर पर आ सकती है.
खालिदा जिया ने जमात के साथ मिलकर बनाई थी सरकारखालिदा जिया के 2001-06 तक प्रधानमंत्री रहने के दौरान जमात-बीएनपी की सहयोगी के तौर पर सत्ता में थी. बाद में, दोनों पार्टियों ने रिश्ता तोड़ लिया, लेकिन शफीकुर का दावा है कि वे ‘बड़े देश के हित’ में फिर से बीएनपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं. उन्होंने भारत के साथ सहयोग का भी संदेश दिया.
1971 में लिबरेशन वॉर के दौरान जमात के नेताओं और एक्टिविस्ट ने खुलेआम पाकिस्तानी सेना के लिए काम किया. पार्टी के कई नेताओं और एक्टिविस्ट पर रजाकार हत्यारों के लीडर के तौर पर नरसंहार में शामिल होने का आरोप है. हसीना के कार्यकाल में इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने कई लोगों को सजा भी सुनाई थी.
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2013 में बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने जमात के चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी. 2016 में बांग्लादेश सुप्रीम कोर्ट ने जमात का चुनाव निशान कैंसिल कर दिया था. 30 जुलाई 2024 को उस समय की प्रधानमंत्री हसीना की सरकार ने ‘कट्टरपंथी और आजादी विरोधी’ जमात और उसके ब्रांच संगठन इस्लामी छात्र शिबिर पर बैन लगा दिया था.
यूनुस के शासन में जमात की बढ़ी ताकतलेकिन 5 अगस्त के तख्तापलट के बाद हालात बदल गए. अब उन्हें मोहम्मद यूनुस की लीडरशिप वाली अंतरिम सरकार की ‘सबसे बड़ी ताकत’ के तौर पर जाना जाता है. हाल ही में जमात के स्टूडेंट संगठन इस्लामी छात्र शिबिर ने ढाका, जहांगीरनगर, चटगांव और राजशाही यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट काउंसिल चुनाव जीते हैं. बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की पार्टी, बीएनपी के स्टूडेंट संगठन ‘जातीयतावादी छात्र दल’ को जमात के स्टूडेंट संगठन ने हरा दिया है.
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दूसरी ओर, बीएनपी को बांग्लादेशी राजनीति में ‘प्रो-लिबरेशन वॉर फोर्स’ के तौर पर जाना जाता है. खालिदा के पति और बीएनपी के फाउंडर जियाउर रहमान पाकिस्तान आर्मी में पहले बंगाली ऑफिसर के तौर पर लिबरेशन वॉर में शामिल हुए थे. शेख मुजीबुर रहमान की तरह, जिया को भी आजादी के अग्रदूतों में से एक माना जाता है. तारिक रहमान की एंट्री के बाद पूरे बांग्लादेश में बीएनपी समर्थकों का उत्साह बढ़ा है. इससे जमात पहले से ही अपनी चाल चलना शुरू कर दिया है.
जमात ने एनसीपी सहित अन्य पार्टियों से किया गठबंधनइससे पहल जमात ने बांग्लादेशी स्टूडेंट्स और युवाओं की नई पार्टी, नेशनल सिटिजन्स पार्टी (NCP) के कन्वीनर नाहिद इस्लाम के साथ समझौते का ऐलान किया था. हालांकि इसे लेकर पार्टी के अंदर भी मतभेद खुलकर सामने आए. समझौता लगभग फाइनल होने के बाद एनसीपी के दो बड़े नेताओं, तस्नीम जारा और तस्नुभा जबीन ने पार्टी छोड़ दी. तस्नीम एनसीपी की सीनियर जॉइंट मेंबर सेक्रेटरी और पार्टी की पॉलिटिकल काउंसिल की मेंबर थीं. तस्नीम पार्टी की जॉइंट कन्वीनर थीं.
एनसीपी के कई और सदस्यों को जमात के साथ गठबंधन पर एतराज है. एनसीपी के 30 नेताओं ने नाहिद को एक मेमोरेंडम सौंपा, जिसमें जमात के साथ समझौते पर सैद्धांतिक एतराज जताया गया. उन्होंने कहा कि अगर पार्टी जमात के साथ किसी भी तरह का गठबंधन या समझौता करती है, तो एनसीपी की नैतिक स्थिति कमजोर होगी और इसका लंबे समय तक उसकी पॉलिटिकल क्रेडिबिलिटी पर बुरा असर पड़ेगा.
इस एतराज के बीच, एनसीपी ने जमात के साथ चुनावी समझौते का ऑफिशियली ऐलान कर दिया. जमात चीफ शफीकुर रहमान ने ढाका से ऐलान किया कि उनके साथ पहले से ही आठ पार्टियां हैं. इस बार दो और पार्टियां शामिल हुई.
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