हिंदी की पहली पुस्तक: पृथ्वीराज रासो का महत्व
newzfatafat January 10, 2026 02:42 PM

नई दिल्ली: हिंदी भाषा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हिंदी की पहली पुस्तक कौन सी है। साहित्य के छात्र और पाठक इस विषय में हमेशा उत्सुक रहते हैं।


इतिहासकारों और साहित्यकारों के अनुसार, पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली पुस्तक माना जाता है। यह ग्रंथ न केवल भाषा के विकास को दर्शाता है, बल्कि उस समय की सांस्कृतिक और वीर परंपरा की झलक भी प्रस्तुत करता है।


पृथ्वीराज रासो का साहित्यिक महत्व

पृथ्वीराज रासो को हिंदी साहित्य का प्रारंभिक महाकाव्य माना जाता है। यह रचना उस समय की भाषा और काव्य शैली को उजागर करती है, जब हिंदी अपने प्रारंभिक रूप में विकसित हो रही थी। इसे वीरगाथा काल की प्रमुख कृति के रूप में देखा जाता है, जिसने हिंदी काव्य परंपरा की दिशा निर्धारित की।


ब्रजभाषा में रचित महाकाव्य

यह ग्रंथ ब्रजभाषा में लिखा गया है, जो हिंदी की प्रारंभिक बोलियों में से एक मानी जाती है। ब्रजभाषा उस समय उत्तर भारत में प्रचलित थी और साहित्य सृजन का प्रमुख माध्यम थी। पृथ्वीराज रासो की भाषा सरल, ओजपूर्ण और वीर रस से भरी हुई है, जो इसे ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बनाती है।


पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर आधारित कथा

पृथ्वीराज रासो 12वीं शताब्दी के महान योद्धा और शासक पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर केंद्रित है। इसमें उनके पराक्रम, युद्ध कौशल और शासन से जुड़ी कथाओं का वर्णन किया गया है। ग्रंथ में राजपूत वीरता और उस समय की सामाजिक व्यवस्था की झलक भी मिलती है, जो इसे ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में महत्वपूर्ण बनाती है।


चंद बरदाई को रचना का श्रेय

इस महाकाव्य की रचना का श्रेय चंद बरदाई को दिया जाता है, जिन्हें पृथ्वीराज चौहान का दरबारी कवि माना जाता है। कहा जाता है कि चंद बरदाई ने अपने राजा के जीवन को काव्य रूप में प्रस्तुत कर उसे अमर बना दिया। हालांकि इसके विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, फिर भी साहित्य इतिहास में चंद बरदाई का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।


हिंदी साहित्य में स्थान और मान्यता

पृथ्वीराज रासो को हिंदी की पहली पुस्तक मानने का कारण इसका ऐतिहासिक और साहित्यिक महत्व है। यह ग्रंथ हिंदी के प्रारंभिक स्वरूप, काव्य परंपरा और वीरगाथा शैली को समझने का आधार प्रदान करता है। इसलिए इसे हिंदी साहित्य के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है।


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