Border Connection With Tanot Mata Temple: भारतीय सिनेमा के इतिहास की सबसे बड़ी वॉर फिल्म ‘बॉर्डर’ का जब भी जिक्र होता है, जेपी दत्ता के निर्देशन और सनी देओल की दहाड़ के साथ-साथ थार के रेगिस्तान की वो मिट्टी आंखों के सामने आ जाती है, जो वीरों के लहू से सींची गई है. अब ‘बॉर्डर 2’ के ट्रेलर ने फिर से वही रोमांच पैदा कर दिया है. हाल ही में इस फिल्म के आइकोनिक गाने ‘संदेशे आते हैं’ का नया वर्जन जैसलमेर के तनोट माता मंदिर के पास लॉन्च किया गया. ये वही मंदिर है जिसे भारतीय सेना और सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ‘युद्ध की देवी’ के रूप में पूजते हैं. आइए जानते हैं इस मंदिर का वो इतिहास, जो किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कहीं ज्यादा रोमांचक और हैरतअंगेज है.
जैसलमेर शहर से लगभग 120 किलोमीटर दूर, जहां सड़कें खत्म होने लगती हैं और सिर्फ रेत के समंदर और कटीली तारें नजर आती हैं, वहां स्थित है मां तनोट का मंदिर. ये मंदिर भारत-पाकिस्तान सीमा की आखिरी चौकी के ठीक पहले पड़ता है. इसके आगे सिर्फ सेना के बंकर, गश्त लगाते जवान और सरहद की खामोशी सुनाई देती है. तनोट माता को राजस्थान की हिंगलाज माता का साक्षात अवतार माना जाता है.

तनोट मां का दर्शन लेने आईं एक फौजी मां कल्पना भाटी ने बताया कि 800 वे शतक में भाटी राजपूत राजा तनु राव ने इस मंदिर की स्थापना की थी. सिर्फ राजपूत ही नहीं चारण समुदाय के लोग भी मां को अपनी ‘कुलदेवी’ मानते हैं. लेकिन 1965 तक ये मंदिर केवल स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र था, दुनिया को इसकी ‘शक्ति’ का अंदाजा तब हुआ जब सरहद पर तोपें गरजने लगीं.
बारूद भी हुए थे ‘बेअसर’1965 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने राजस्थान सीमा पर भारी हमला बोल दिया. पाकिस्तानी सेना का लक्ष्य तनोट के रास्ते जैसलमेर पर कब्जा करना था. क्योंकि रणनीतिक रूप से तनोट बहुत महत्वपूर्ण था. रिपोर्ट्स बताती हैं कि पाकिस्तानी सेना ने इस मंदिर और आसपास के इलाके को निशाना बनाते हुए लगभग 3000 तोप के गोले दागे. उस वक्त वहां तैनात जवान और नजदीकी गांव में रहने वाले लोग मंदिर परिसर में ही शरण लिए हुए थे. आश्चर्य की बात ये थी कि मंदिर के प्रांगण में करीब 450 गोले गिरे, लेकिन उनमें से एक भी नहीं फटा. मंदिर की एक ईंट भी नहीं हिली. सैनिकों ने इसे अपनी आंखों से देखा और वे दंग रह गए. आज भी वे ‘जिंदा बम’ मंदिर के संग्रहालय में रखे हुए हैं, जिन्हें श्रद्धालु करीब से देख सकते हैं. इसी घटना के बाद तनोट माता को ‘युद्ध की देवी’ के रूप में ख्याति मिली.
तनोट माता मंदिर के म्यूजियम में है जिन्दा बम के सबूत
लोंगेवाला की ऐतिहासिक जीत और तनोट माता का आशीर्वाद1971 के युद्ध में भी इतिहास ने खुद को दोहराया. लोंगेवाला की मशहूर लड़ाई, जिस पर पूरी ‘बॉर्डर’ फिल्म बनी है, वो लड़ाई तनोट से महज कुछ ही दूरी पर लड़ी गई थी. उस रात जब पाकिस्तानी टैंकों की पूरी रेजिमेंट ने भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश की, तब वे रेत के टीलों में इस तरह फंस गए कि हिलना नामुमकिन हो गया. सैनिकों का मानना है कि ये मां तनोट का ही प्रभाव था कि मुट्ठी भर भारतीय जवानों ने दुश्मन की पूरी टैंक रेजिमेंट को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. जीत के बाद, भारतीय सेना ने मंदिर परिसर में एक ‘विजय स्तंभ’ का निर्माण किया, जो आज भी हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा कर देता है.
बलि की परंपरा में बदलावपुराने समय में, देवी की शक्ति की उपासना के लिए युद्ध पर जाने से पहले बकरे की बलि देने की प्रथा थी. धर्मेंद्र की आखिरी फिल्म ‘इक्कीस’ में इस प्रथा को दिखाया है. जैसलमेर के इस इलाके में भी सेना के जवान और स्थानीय लोग युद्ध में जीत की मन्नत मांगने के लिए बकरे की बलि दिया करते थे. लेकिन, समय के साथ इस परंपरा को बदल दिया गया. अब यहां जीवों की हत्या नहीं होती. अब भक्त और जवान बकरे लेकर आते हैं, उनके कानों को हल्का सा ‘पियर्स’ (छिद्रित) किया जाता है और उन्हें देवी के नाम पर छोड़ दिया जाता है. ये बकरे पूरे इलाके में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं और इन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाता. ये परंपरा श्रद्धा और जीव-दया का एक अनूठा संगम है. इसके अलावा लाल बॉर्डर वाले सफेद रुमाल भी मन्नत पूरी होने पर यहां बांधे जाते हैं.
मन्नत पूरी होने पर बांधे जाते हैं लाल बॉर्डर वाले सफेद रुमाल
सेना ही है ‘पुजारी’तनोट माता मंदिर की सबसे खास बात ये है कि इसकी व्यवस्था कोई ट्रस्ट या पंडित नहीं, बल्कि सीमा सुरक्षा बल संभालती है. यहां सुबह और शाम की आरती वर्दी पहले हुए जवान पूरी सैनिकी अनुशासन के साथ करते हैं. मंदिर में एक ज्योति अखंड रूप से जलती रहती है. जवानों के लिए यहाँ मत्था टेकना सिर्फ धार्मिक कार्य नहीं, बल्कि ड्यूटी पर जाने से पहले ‘एनर्जी बूस्टर’ की तरह है. यहां तक कि पाकिस्तान के एक ब्रिगेडियर शहनवाज खान ने भी मां के चमत्कार से प्रभावित होकर यहां चांदी का छत्र चढ़ाया था.
एक अनसुलझी पहेलीमाता के चमत्कारी मंदिर के बारे में जहां हमने वहां ड्यूटी कर रहीं एक महिला सुरक्षाकर्मी से बात की तब उन्होंने कहा कि साइंस तो कहता है कि शायद वे गोले पुराने थे या उनके फ्यूज में नमी थी, या रेगिस्तान की नर्म रेत ने उनके प्रभाव को सोख लिया. लेकिन तर्क देने वाले पूछते हैं कि क्या 3000 के 3000 गोले खराब हो सकते हैं? क्या दो अलग-अलग युद्धों (1965 और 1971) में एक जैसा तकनीकी संयोग होना मुमकिन है? क्योंकि जहां विज्ञान हार मान लेता है, वहीं से आस्था शुरू होती है. आज भी यहां के जवानों की ये आस्था है कि मुश्किल घडी में मां उनके साथ खड़ी रहेगी. ये सिर्फ एक मंदिर नहीं है, येभारत के स्वाभिमान और सैनिकों के अदम्य साहस का प्रतीक है. तनोट माता की चौखट पर आकर हर नागरिक को ये एहसास होता है कि हमारी सीमाओं की रक्षा सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि एक अटूट विश्वास से भी होती है. जो नागरिकों को हमारी सेना पर है और सेना को मां पर.”
क्या आप भी जाना चाहते हैं तनोट माता के मंदिर?अगर आप भी इस ‘युद्ध की देवी’ के दरबार में जाकर उनका दर्शन लेना चाहते हैं, तो जैसलमेर से टैक्सी या अपनी गाड़ी से ये 2 घंटे का सफर है. यहां मोबाइल नेटवर्क बहुत कमजोर होता है, इसलिए ऑफ-लाइन मैप साथ रखें. यहां पास में लोंगेवाला वॉर मेमोरियल है, जो बिना बात किए भी हमारी सेना के शौर्य के किस्से सुनाता है.