लखनऊ । राजधानी में आयोजित 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन के समापन अवसर पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि विधानसभा का समय अत्यंत मूल्यवान है और इसे कुशलतापूर्वक उपयोग करना आवश्यक है। उन्होंने जोर दिया कि सदन में संवाद और चर्चा हमेशा प्राथमिकता होनी चाहिए। सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि कोई राजनीतिक गतिरोध न उत्पन्न हो। इसके लिए सभी दलों को मिलकर यह तय करना चाहिए कि विधायी प्रक्रियाओं में निरंतर बाधा नहीं आए।
ओम बिरला ने कहा कि पीठासीन अधिकारी का कर्तव्य निष्पक्षता और न्यायसंगत निर्णय लेना है। राज्य की विधानसभा ही वह माध्यम है, जिसके जरिए आम नागरिक की आवाज सरकार तक पहुंचती है। जैसे न्यायपालिका में जनता का विश्वास आवश्यक है, उसी प्रकार विधानसभाओं में भी सकारात्मक दृष्टिकोण और प्रभावी विमर्श से समाज के मुद्दों का समाधान संभव है। उन्होंने बताया कि लोकतंत्र का वास्तविक स्वरूप वही है, जिसमें चर्चाओं और विचार-विमर्श से ठोस परिणाम सामने आते हैं। यही प्रक्रिया लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत बनाती है और समाज के विकास में योगदान देती है।
उन्होंने आगे कहा कि यह संकल्प केवल एक विधायी संस्था तक सीमित नहीं है। आने वाले समय में हमें अपने-अपने लोकतांत्रिक संस्थानों के माध्यम से “विकसित भारत” की दिशा में कार्य करना है और राज्य को भी प्रगतिशील बनाना है। इसके लिए सभी सदस्यों की सक्रिय भागीदारी, खुले संवाद और विचारों का आदान-प्रदान आवश्यक है।
बिरला ने यह भी रेखांकित किया कि विकास के लिए विचार और विमर्श महत्वपूर्ण हैं। समाज के विभिन्न वर्गों से सुझाव लेना और उन्हें गंभीरता से लागू करना लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। उन्होंने कहा कि सरकारों की जवाबदेही बढ़ाने और प्रशासनिक चुनौतियों को विधायी स्तर पर उठाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। विपक्ष की भूमिका को सशक्त बनाने के कदम भी सकारात्मक परिणाम दे रहे हैं। भविष्य में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि राज्य की विधानसभा की कम से कम 30 बैठकें हों, जिनमें जनहित से जुड़े विषयों पर सार्थक चर्चा संभव हो।
लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि विधानसभा वह मंच है, जहां आम नागरिक की आवाज सीधे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से सामने आती है। मतदाता यह उम्मीद करता है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधि अगले पांच वर्षों में उसकी समस्याओं और आवश्यकताओं पर काम करेंगे। जनता का विश्वास जितना न्यायपालिका पर है, उतना ही विधानसभाओं पर होना चाहिए। इसके लिए आधुनिक तकनीक और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल बढ़ाया गया है। एआई और अन्य नवाचारों के जरिए पुरानी चर्चाओं और निर्णयों को अधिक पारदर्शी, सुलभ और प्रभावी बनाया जा रहा है।
अंत में उन्होंने बताया कि राज्यों के बीच विधायी सहयोग, सूचकांक, जवाबदेही और दक्षता बढ़ाना समय की आवश्यकता है। नए नियम, प्रक्रियाएं और सक्रिय संसदीय समितियां लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती में सहायक हैं। संविधान के अंतर्गत निष्पक्षता, पारदर्शिता और जनउत्तरदायित्व सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। जनता ने हम पर जो विश्वास रखा है, उसे मजबूत बनाना हमारा दायित्व है।