भारत की कानूनी संप्रभुता पर अंतरराष्ट्रीय चर्चा: अडानी समूह का मामला
newzfatafat January 24, 2026 11:42 PM
भारत की कानूनी प्रक्रिया पर वैश्विक ध्यान

भारत की कानूनी प्रणाली और प्रक्रियाओं की स्पष्टता एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनी है। हाल ही में प्राप्त अदालती दस्तावेजों के अनुसार, भारत के विधि और न्याय मंत्रालय ने अमेरिकी नियामक संस्था U.S. Securities and Exchange Commission द्वारा भेजे गए कानूनी समन को दो बार अस्वीकार किया। यह समन प्रमुख उद्योगपति गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी के लिए भेजा गया था।


समन की अस्वीकृति का कारण

दस्तावेजों के अनुसार, भारत सरकार ने पहली बार मई 2025 और दूसरी बार दिसंबर 2025 में यह स्पष्ट किया कि इन समनों पर न तो स्याही से हस्ताक्षर थे और न ही कोई आधिकारिक मुहर। इसके अलावा, समन की सेवा को लेकर तकनीकी आपत्तियां भी उठाई गईं। भारत सरकार का यह रुख अंतरराष्ट्रीय संधियों के तहत प्रक्रियाओं की स्पष्ट व्याख्या पर आधारित है।


अमेरिकी अदालत में हस्तक्षेप की मांग

इन अस्वीकृतियों के बाद, अमेरिकी नियामक संस्था ने न्यूयॉर्क की एक संघीय अदालत में हस्तक्षेप की मांग की है। उसने अनुरोध किया है कि पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए समन को ईमेल के माध्यम से भेजने की अनुमति दी जाए। याचिका में कहा गया है कि संबंधित पक्षों को इस मुकदमे की जानकारी पहले से है और उन्होंने अमेरिका में वकीलों को नियुक्त किया है, इसलिए ईमेल के माध्यम से समन भेजना पर्याप्त होगा। यह संभावना जताई जा रही है कि जल्द ही गौतम अडानी और सागर अडानी को ईमेल के जरिए समन भेजा जाएगा।


अडानी समूह पर आरोप और शेयर बाजार पर प्रभाव

यह मामला तब और अधिक चर्चा में आया जब नवंबर 2024 में अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया कि अडानी समूह के कुछ कार्यकारी भारतीय अधिकारियों को रिश्वत देने की योजना में शामिल थे। इसी संदर्भ में एसईसी ने एक सिविल मामला दर्ज किया था, जो अमेरिकी न्याय विभाग की आपराधिक कार्यवाही से अलग है और अभी भी विचाराधीन है।


इस कानूनी प्रक्रिया की खबर का असर शुक्रवार को शेयर बाजार पर भी देखने को मिला, जहां अडानी समूह की कंपनियों के शेयरों में अस्थायी गिरावट आई। न्यूयॉर्क की अदालत में ईमेल के माध्यम से समन भेजने की अनुमति मांगे जाने के बाद बाजार में अनिश्चितता का माहौल बना, जिससे निवेशकों ने सतर्कता बरती। अडानी समूह से जुड़ी कंपनियों के शेयर 3 प्रतिशत से लेकर लगभग 15 प्रतिशत तक गिरे, और सेंसेक्स में करीब एक प्रतिशत की गिरावट आई। हालांकि, बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट अस्थायी है।


अडानी समूह का बचाव

अडानी समूह ने इन सभी आरोपों को निराधार बताते हुए खारिज किया है। समूह का कहना है कि वह अपने बचाव में सभी कानूनी विकल्पों का उपयोग करेगा। यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब भारत और अमेरिका के संबंधों में तनाव देखा जा रहा है। भारत के विधि मंत्रालय ने पहले भी स्पष्ट किया है कि यह मामला दो निजी पक्षों और अमेरिका की संस्था के बीच का है, जिसमें भारत सरकार की भूमिका केवल प्रक्रियागत नियमों के पालन तक सीमित है।


भारत की कानूनी संप्रभुता का संदेश

अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह स्पष्ट संदेश गया है कि भारत अपनी कानूनी संप्रभुता और नियमों से कोई समझौता नहीं करता। आज का भारत किसी भी विदेशी दबाव में आकर अपनी प्रक्रियाओं को ताक पर नहीं रखता। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून और संस्थागत मर्यादा सर्वोपरि है। बिना हस्ताक्षर और मुहर वाले दस्तावेजों को स्वीकार न करना एक जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान है। यह आत्मविश्वास भारत को वैश्विक निवेश और कूटनीति का भरोसेमंद केंद्र बनाता है।


अडानी समूह की भूमिका

अडानी समूह आज भारत के बुनियादी ढांचे, ऊर्जा और विकास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। समूह पर लगाए गए आरोपों को तथ्य और कानून के आधार पर परखा जाना चाहिए, न कि मीडिया ट्रायल या भू राजनीतिक खींचतान के आधार पर। अडानी समूह का यह कहना कि वह सभी कानूनी मंचों पर अपना पक्ष मजबूती से रखेगा, एक जिम्मेदार कॉरपोरेट आचरण का उदाहरण है।


भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा

भारत की कंपनियां अब वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, और उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बनना स्वाभाविक है। मोदी सरकार की नीति कि भारतीय उद्यमों के साथ न्याय होगा और देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं किया जाएगा, उद्योग जगत के लिए भरोसे का मजबूत आधार है।


नया भारत

आज भारत न केवल दुनिया की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है, बल्कि वह अपने नियम खुद तय करने की स्थिति में भी है। यही नया भारत है, जो विकास, कानून और स्वाभिमान के साथ आगे बढ़ रहा है।


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