शताब्दी वर्ष में आत्मविश्लेषण व आत्मचिंतन कर रहा संघ: निम्बाराम
Tarunmitra January 26, 2026 01:43 PM

बांसवाड़ा । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शताब्दी वर्ष में आत्मविश्लेषण और आत्मचिंतन के दौर से गुजर रहा है। संघ का उद्देश्य केवल संगठन विस्तार नहीं, बल्कि समाज को बड़ा करने और व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र सेवा करना है।
यह विचार प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राजस्थान के क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने तीन दिवसीय माही टॉक फेस्ट के अंतिम दिन “राष्ट्र सेवा/राष्ट्र साधना के 100 वर्ष” विषय पर आयोजित उद्बोधन एवं संवाद सत्र में व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि संघ का कार्य मूलतः समाज कार्य है, जिसमें स्वयंसेवक राष्ट्र सेवक के रूप में संस्कारित होते हैं। मन से किया गया आत्मविश्लेषण यह दर्शाता है कि संघ ने बीते वर्षों में निरंतर प्रगति की है और सेवा व संवेदना के संस्कार समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचे हैं।
निम्बाराम ने संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि संघ और समाज का एक होना ही उनका मूल लक्ष्य था। इसी दृष्टि से शिशु, विद्यार्थी, कॉलेज छात्र, व्यवसायी, तरुण और प्रौढ़—हर आयु वर्ग के लिए अलग-अलग शाखाओं का संचालन किया जाता है, जिससे संस्कार और संगठन की भावना निरंतर मजबूत होती है।
उन्होंने कहा कि इंडिया टुडे के एक सर्वे में संघ के सेवा कार्यों को देश का सबसे बड़ा एनजीओ माना गया है, जो स्वयंसेवकों के सतत सामाजिक योगदान का प्रमाण है। संघ शाखा चलाता है, परंतु स्वयंसेवक समाज से कभी अलग नहीं होता; वह हर परिस्थिति में व्यक्ति निर्माण और राष्ट्र निर्माण का कार्य करता है।
संवाद सत्र में क्षेत्र प्रचारक ने बताया कि संघ ने तीन प्रमुख शक्तियों—मातृ शक्ति, सज्जन शक्ति और सम्पूर्ण समाज के संगठन—पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है। संघ को समझने के लिए संघ में आना आवश्यक है, और आने-जाने के दोनों द्वार सदैव खुले हैं। उन्होंने कहा, “जो हमसे टकराएगा, वह हमारे जैसा हो जाएगा,” जो संघ की समरसता और संवाद की कार्यशैली को दर्शाता है।
युवाओं का आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान ने केवल अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का बोध भी कराया है। सामाजिक सद्भाव के साथ आगे बढ़ना और स्वदेशी को स्वावलंबन आंदोलन के रूप में अपनाना आज की आवश्यकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ में केवल उपदेश नहीं, बल्कि कर्म साधना का भाव निहित है।
अपने विचारों को और अधिक धार देते हुए उन्होंने कहा, “शक्तिहीन के सारे शस्त्र जग में ठुकरा दिए जाते हैं,” इसलिए समाज को संगठित और सशक्त बनाना आवश्यक है। वर्तमान में लगभग 70 प्रतिशत घरों तक स्वयंसेवकों की पहुँच हो चुकी है। संघ के विभिन्न सेवा प्रकल्पों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाता है तथा प्रत्येक प्रदेश का अपना जाग्रत पत्र भी है।
कार्यक्रम के अंतिम दिन आयोजित इस संवाद सत्र में मॉडरेटर रुचि श्रीमाली रहीं, जबकि संचालन रणधीर व्यास ने किया। उपस्थित श्रोताओं ने प्रश्नों के माध्यम से अपनी जिज्ञासाओं का समाधान किया और राष्ट्र साधना के सौ वर्षों की यात्रा पर हुए इस विचारोत्तेजक संवाद को प्रेरणादायी बताया।

माही टॉक फेस्ट 4.0 का भव्य समापन:
‘घर से शुरू होगा बदलाव, तभी बदलेगा राष्ट्र’- निंबाराम

गोविंद गुरु जनजातीय विश्वविद्यालय, बांसवाड़ा एवं विश्व संवाद केन्द्र के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीन दिवसीय साहित्य, संवाद और कला उत्सव माही टॉक फेस्ट (MTF) 4.0 का समापन रविवार को विचार, संस्कृति और राष्ट्रबोध के सशक्त संदेश के साथ भव्य रूप से संपन्न हुआ।
समापन समारोह के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक एवं प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक निंबाराम रहे, जबकि अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. केशव सिंह ठाकुर ने की। मंच पर विश्व संवाद केन्द्र के मेंटर मदन मोहन टांक एवं कुलसचिव कश्मी कौर भी उपस्थित रहे।
अपने प्रेरक संबोधन में निंबाराम ने कहा कि घर से बदलाव शुरू होगा, तभी समाज, राज्य और देश में परिवर्तन आएगा।
उन्होंने कुटुंब प्रबोधन को सामाजिक परिवर्तन की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि जो समाज समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालता है, वही निरंतर विकास करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ युगानुकूल परिवर्तन में विश्वास करता है और उसी मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।
निंबाराम ने वागड़ अंचल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं, माही नदी, बेणेश्वर धाम और मानगढ़ धाम के ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महात्म्य का उल्लेख करते हुए इस अंचल की मुक्तकंठ से प्रशंसा की और माही टॉक फेस्ट जैसे आयोजनों को प्रेरणादायक बताया।
समारोह की अध्यक्षता करते हुए प्रो. केशव सिंह ठाकुर ने कहा कि माही टॉक फेस्ट जैसे आयोजन युवाओं में वैचारिक चेतना, सांस्कृतिक आत्मबोध और राष्ट्रबोध को सुदृढ़ करने का कार्य करते हैं। समारोह के आरंभ में विश्व संवाद केंद्र के मेंटर मदनमोहन टांक ने स्वागत उद्बोधन दिया जबकि फेस्ट के समन्वयक डॉ. कमलेश शर्मा ने तीन दिवसीय आयोजन का संक्षिप्त प्रतिवेदन प्रस्तुत किया।
समापन अवसर पर फेस्ट के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेताओं एवं सहयोगियों को स्मृति चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. नीरज श्रीमाली ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन कुलसचिव कश्मी कौर ने किया।
पुस्तक विमोचन :
इस अवसर पर लेखक भागीरथ चौधरी द्वारा लिखित पुस्तक
‘और यह जीवन समर्पित’ का विमोचन भी किया गया, जो जीवन मूल्यों और समर्पण की भावना को रेखांकित करती है। पुस्तक परिचय देवांश गोस्वामी ने दिया।
रील्स और कार्यशालाओं से हुई दिन की शुरुआत :
फेस्ट के तीसरे दिन की शुरुआत नागरिक शिष्टाचार विषयक रील्स मेकिंग प्रतियोगिता से हुई, जिसमें युवाओं ने सामाजिक जिम्मेदारी और नागरिक कर्तव्यों को रचनात्मक ढंग से प्रस्तुत किया। इसके पश्चात उदयपुर की रूचि श्रीमाली द्वारा ‘आर्ट ऑफ रीडिंग’ विषय पर प्रभावी कार्यशाला आयोजित की गई, जिसमें विद्यार्थियों को गहन पठन और विवेकपूर्ण अध्ययन की विधियों से परिचित कराया गया।
मीडिया और साहित्य पर हुए विचारोत्तेजक संवाद :
वैश्विक मीडिया और भारतीय मीडिया विषय पर आयोजित सत्र में वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय की क्षेत्रीय निदेशक डॉ. रश्मि बोहरा एवं वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र पालीवाल ने मीडिया की सामाजिक भूमिका और उत्तरदायित्व पर विचार साझा किए। सत्र के मॉडरेटर जुगनू त्रिवेदी रहे तथा संचालन डॉ. अर्पिता जैन ने किया।
द्वितीय सत्र में राजस्थान साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष इंदुशेखर तत्पुरुष ने ‘आनंद मठ और वंदे मातरम् के 150 वर्ष’ विषय पर संवाद किया। इस सत्र की मॉडरेटर मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय की प्रो. राजश्री चौधरी रहीं तथा संचालन कनन राठौड़ ने किया।
संगीतमय कथा से सजा समापन सत्र :
अंतिम दिन का प्रमुख सांस्कृतिक आकर्षण रहा आदि शंकराचार्य पर आधारित इंदौर की ख्यातनाम स्टोरीटेलर भारती दीक्षित की संगीतमय कहानी प्रस्तुति, जिसने श्रोताओं को आध्यात्मिक और सांस्कृतिक भावभूमि से जोड़ दिया।
माही टॉक फेस्ट 4.0 का समापन यह संदेश देकर गया कि संवाद, साहित्य, मीडिया और संस्कृति के माध्यम से राष्ट्रबोध को सशक्त किया जा सकता है। यह आयोजन बांसवाड़ा को वैचारिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में स्थापित करने की दिशा में सार्थक पहल साबित हुआ।
इस अवसर पर प्रो. राजेश जोशी, प्रो. नरेंद्र पानेरी, डॉ. प्रमोद वैष्णव, डॉ. राकेश डामोर, डॉ. लोकेन्द्र कुमार, डॉ. नीरज श्रीमाली, मामराज, विश्व संवाद केंद्र की ओर से मदन मोहन टांक, डॉ. कमलेश शर्मा, डॉ. सुनील कुमार खटीक, विकास छाजेड़, जयराज सहित बड़ी संख्या में युवा, विद्यार्थी और विश्वविद्यालय स्टाफ ने सक्रिय सहभागिता निभाई।

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