जैक पैरक
22 जनवरी को ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के देशों का एक आपातकालीन शिखर सम्मेलन तब आयोजित किया गया, जब ट्रंप ने जर्मनी, डेनमार्क, फिनलैंड, फ्रांस, नीदरलैंड्स, स्वीडन, ब्रिटेन और नॉर्वे पर 10 फीसदी शुल्क लगाने की धमकी दी थी। ये वे देश थे जिन्होंने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण करने की अमेरिकी महत्वाकांक्षाओं के बीच डेनमार्क के इस क्षेत्र की रक्षा के लिए अपनी सेना भेजी थी।
स्विट्जरलैंड के दावोस में ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम' में नाटो के महासचिव मार्क रुटे के साथ ग्रीनलैंड पर ‘भविष्य के समझौते की रूपरेखा' तैयार होने के बाद ट्रंप ने टैरिफ लगाने की अपनी धमकी वापस ले ली। इससे ईयू के शिखर सम्मेलन में दबाव कम हो गया।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने शिखर सम्मेलन के बाद पत्रकारों से कहा, "हमने अलग-अलग स्तरों पर अमेरिका के साथ बहुत सक्रिय रूप से बातचीत की। हमने मजबूती से अपनी बात रखी, लेकिन स्थिति को बिगड़ने नहीं दिया। हम जानते हैं कि हमें एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर यूरोप के लिए और ज्यादा काम करना होगा।”
अमेरिका और यूरोप के बीच के तनाव को अब छिपाना नामुमकिन सा हो गया है। पिछला हफ्ता जिस तरह के संकट से गुजरा, उसने इन संबंधों को पूरी तरह टूटने की कगार पर पहुंचा दिया था। यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा ने कहा, "यूरोपियन जीवन शैली अमेरिकन जीवन शैली से अलग है। हमारा मानना है कि दोस्तों, सहयोगियों और साझेदारों के बीच रिश्तों को गर्मजोशी और सम्मान के साथ निभाया जाना चाहिए।”
हालांकि, यह बात साफ तौर पर जाहिर थी कि ईयू, अमेरिका के साथ सुलह की कोशिश जारी रखेगा। जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने ब्रसेल्स में कहा, "मुझे लगता है कि कई अमेरिकी भी इस बारे में वैसा ही महसूस करते हैं जैसा हम करते हैं। आप इस ट्रांस-अटलांटिक गठबंधन को ऐसे ही नहीं छोड़ सकते। हमने इसे 75 सालों में बनाया है। यह यूरोप और अमेरिका के बीच अब तक का सबसे सफल राजनीतिक गठबंधन है।”
जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार था ईयूएक बड़ा सवाल अब भी बना हुआ है कि अगर ट्रंप अपनी धमकियों से पीछे नहीं हटते, तो क्या यूरोपीय संघ अपनी सबसे कड़ी जवाबी कार्रवाई करने के लिए तैयार था?
ट्रंप की धमकियों के जवाब में यूरोपीय संघ 93 अरब यूरो के जवाबी टैरिफ पैकेज की तैयारी कर चुका था। साथ ही, वह अपने ‘एंटी-कोएर्सियन इंस्ट्रूमेंट (एसीआई)' उपाय के इस्तेमाल के लिए भी तैयार था, जिसे ‘ट्रेड बाजूका' भी कहा जाता है। इसके तहत, यूरोपीय संघ के बाजारों में अमेरिकी कंपनियों के व्यापार पर कड़े प्रतिबंध भी लगाए जा सकते थे।
फॉन डेय लाएन ने कहा, "हमने संभावित रूप से जरूरी जवाबी उपाय तैयार किए थे। वे टेबल पर थे। वे टेबल पर ही रहे।”
फ्रांस भी एसीआई का इस्तेमाल करने के पक्ष में था। फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने कहा था, "हम धमकियों के बजाय सम्मान को पसंद करते हैं।” जर्मनी ज्यादा हिचकिचा रहा था। मैर्त्स ने कहा कि यूरोप "मामला बढ़ने से बचना” चाहता है। आखिर में उनमें से किसी को भी यह फैसला लेने की जरूरत नहीं पड़ी।
किस वजह से बदला ट्रंप का मन?वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में माक्रों, मैर्त्स और ईयू के शीर्ष अधिकारियों की ट्रंप के साथ आमने-सामने की बैठकें नहीं हो पाईं। इसकी एक बड़ी वजह यह थी कि अमेरिकी राष्ट्रपति के विमान में तकनीकी खराबी आ गई थी, जिसके कारण उन्हें पहुंचने में देरी हुई।
ऐसे में दूसरा सवाल यह है कि क्या ईयू के दबाव की वजह से अमेरिकी राष्ट्रपति ने अपना मन बदला? असल में ट्रंप पर घरेलू राजनीतिक दबाव भी है। नवंबर में अमेरिका में मध्यावधि चुनाव होने वाले हैं और ग्रीनलैंड टैरिफ विवाद के कारण शेयर बाजार में भी भारी हलचल देखी गई थी।
फॉन डेय लाएन ने स्वीकार किया, "हो सकता है इन सभी कारणों ने अपनी भूमिका निभाई हो। लेकिन अगर यूरोपीय संघ के पास मजबूती, संयम और एकजुटता न होती, तो ये कारण भी काम नहीं करते।”
जानकारों का मानना है कि ईयू के रुख में बदलाव आया है। थिंक टैंक ‘जर्मन मार्शल फंड' की सीनियर फेलो जॉर्जीना राइट ने कहा, "यूरोपीय नेता इस बात पर तो बंटे हुए हैं कि डॉनल्ड ट्रंप से निपटने का सबसे अच्छा तरीका क्या है, लेकिन वे इस बात पर एकमत हैं कि उन्हें अब हर स्थिति के लिए तैयार रहना होगा। यूरोपीय संघ के पास अपनी ताकत दिखाने के कई तरीके मौजूद हैं।”
ट्रंप का संदिग्ध ग्रीनलैंड समझौताट्रंप ने मार्क रुटे के साथ ‘समझौते की जिस रूपरेखा' पर सहमति जताई है, उसके बारे में पूरी जानकारी अभी सामने नहीं आई है, लेकिन ऐसा लगता है कि यह 1951 के उस पुराने समझौते जैसा है जिसके तहत ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैनिकों को तेजी से तैनात करने की अनुमति दी गई थी। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस नए समझौते में सैन्य ठिकाने बनाने के लिए कुछ जमीन सौंपने की बात भी शामिल हो सकती है।
असल में, पुराने समझौते में पहले से ही ऐसे प्रावधान थे जिनके तहत अमेरिका ग्रीनलैंड में जितने चाहे उतने सैनिक तैनात कर सकता था। ईयू शिखर सम्मेलन से इतर डीडब्ल्यू से बात करते हुए एक ईयू राजनयिक ने कहा, "शायद ट्रंप ने इस समझौते की बात बस इसलिए गढ़ी है, ताकि जब वे अपनी बात से पीछे हटें, तो उन्हें शर्मिंदगी न उठानी पड़े।”
आखिर में जो भी वजह रही हो, यूरोप से निकलते समय ट्रंप संतुष्ट लग रहे थे। अमेरिका लौटते समय एयर फोर्स वन में ट्रंप ने पत्रकारों से कहा, "हम सब मिलकर काम करेंगे। हम नाटो के साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ेंगे, क्योंकि मेरी नजर में यही सबसे सही रास्ता है।”