देहरादून/लखनऊ: ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को लेकर शुरू हुआ विवाद अब उत्तर प्रदेश की सीमाओं को लांघकर उत्तराखंड के पहाड़ों तक जा पहुंचा है। एक तरफ जहां उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के मंत्री ने उन्हें शंकराचार्य मानने से साफ इनकार कर दिया है, वहीं दूसरी ओर बद्रीनाथ धाम के पुजारियों ने उनके समर्थन में मोर्चा खोल दिया है। इस टकराव ने अब सनातन धर्म की परंपराओं और प्रशासनिक मान्यताओं के बीच एक नई बहस छेड़ दी है।
यूपी सरकार के मंत्री ने दिया था कड़ा बयानविवाद की शुरुआत उत्तर प्रदेश के कद्दावर मंत्री धर्मपाल सिंह के उस बयान से हुई, जिसमें उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा था कि सरकार स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य स्वीकार नहीं करती। इस बयान के बाद धार्मिक हलकों में हलचल मच गई और सरकार बनाम संत की स्थिति पैदा हो गई। राजनीतिक गलियारों में इस बयान को स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के कुछ पुराने रुख से जोड़कर देखा जा रहा था, लेकिन इसका असर उत्तराखंड में अलग ही देखने को मिला।
बद्रीनाथ के डिमरी समाज ने दिखाया आईनायूपी में हो रहे विरोध के बीच बद्रीनाथ धाम से जुड़ी डिमरी पंडितों की पंचायत ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पुरजोर समर्थन किया है। डिमरी समाज ने साफ कर दिया है कि उनके लिए अविमुक्तेश्वरानंद ही असली शंकराचार्य हैं। इतना ही नहीं, परंपराओं का सम्मान करते हुए उन्हें प्रसिद्ध ‘गाड़ू कलश’ (तेल कलश) यात्रा में शामिल होने का आधिकारिक निमंत्रण भी भेज दिया गया है। डिमरी समाज का यह कदम सीधे तौर पर यूपी सरकार के बयान को चुनौती माना जा रहा है।
परंपरा बनाम राजनीति की लड़ाईडिमरी समाज का तर्क है कि शंकराचार्य की पहचान किसी सरकार की मुहर या किसी मंत्री के बयान से तय नहीं होती। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि सनातन परंपरा में शंकराचार्य का पद आस्था और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं का विषय है, न कि किसी प्रशासनिक या राजनीतिक रुख का। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका फैसला पूरी तरह से धार्मिक मर्यादाओं पर आधारित है और इसमें किसी भी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। अब देखना यह होगा कि इस विवाद के बीच आने वाली गाड़ू कलश यात्रा में क्या नया मोड़ आता है।