वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं. राज्यसभा में सरकार ने कहा कि वायु प्रदूषण से मौतों को लेकर कोई ठोस या निष्कर्षात्मक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन इसी सरकार की संस्था ICMR के आंकड़े बिल्कुल अलग कहानी बयान करते हैं। RTI के जरिए सामने आए ये आंकड़े सरकारी बयानों और सरकारी शोध के बीच साफ विरोधाभास दिखाते हैं.
27 जनवरी 2026 को RTI के जवाब में बताई गई जानकारी देश के लिए बहुत जरूरी है. इसमें एक साल में 12 लाख से ज्यादा मौतें होने की बात कही गई है. ICMR के अनुसार, 'साल 2017 में भारत में करीब 12.4 से 12.5 लाख मौतें वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं. यह उस साल देश में हुई कुल मौतों का लगभग 12.5 प्रतिशत हिस्सा है.'
ये आंकड़े बताते हैं कि वायु प्रदूषण कोई छोटी या भविष्य की समस्या नहीं, बल्कि एक मौजूदा और गंभीर संकट है.
सिर्फ बुज़ुर्ग नहीं, युवा भी शिकार
रिपोर्ट में यह बात और भी चिंताजनक है कि मरने वालों में से 51 प्रतिशत से अधिक लोग 70 साल से कम उम्र के थे. इसका मतलब यह है कि वायु प्रदूषण केवल बुज़ुर्गों तक सीमित खतरा नहीं है, बल्कि कामकाजी और अपेक्षाकृत युवा आबादी भी इसकी चपेट में आ रही है.
बाहर की हवा और घर के अंदर का जहर
अध्ययन के मुताबिक करीब 6.7 लाख मौतें बाहरी वायु प्रदूषण, खासकर PM 2.5 और PM 10 जैसे सूक्ष्म कणों के कारण हुईं. वहीं लगभग 4.8 लाख मौतें घरेलू वायु प्रदूषण से जुड़ी थीं. यह दिखाता है कि खतरा सिर्फ सड़कों और शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि घरों के भीतर भी लोगों की सेहत दांव पर लगी हुई है.
अंतरराष्ट्रीय जर्नल में प्रकाशित, फिर भी अनदेखी
यह अध्ययन PHFI और IHME के सहयोग से किया गया था और इसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल The Lancet Planetary Health में प्रकाशित किया गया. इसके बावजूद संसद में ऐसे आंकड़ों से इनकार किया जाना कई सवाल खड़े करता है.
RTI से सामने आई सच्चाई
इस पूरे मामले को उजागर करने में सॉफ्टवेयर इंजीनियर अमित गुप्ता की अहम भूमिका रही. उन्होंने RTI के जरिए ICMR से सवाल पूछे कि क्या वायु प्रदूषण पर कोई स्टडी की गई है और क्या इससे मौतें हुई हैं. 27 जनवरी को मिले जवाब में ICMR ने साफ किया कि 2017 में स्टडी हुई थी और उसके नतीजे प्रकाशित भी किए गए थे.
'सारा दोष किसानों पर डाल दिया जाता है'
अमित गुप्ता का कहना है कि वह पिछले 10–11 साल से प्रदूषण के मुद्दे पर काम कर रहे हैं. उनके मुताबिक आज भी कई शहरों में AQI 300 से ऊपर दर्ज किया जा रहा है, जबकि बारिश जैसी परिस्थितियां भी राहत नहीं दे पा रही हैं. इसके बावजूद अक्सर प्रदूषण की जिम्मेदारी किसानों पर डाल दी जाती है और 2017 के बाद का कोई नया सार्वजनिक डेटा सामने नहीं लाया गया.
बड़ा सवाल अब भी कायम
ICMR के आंकड़े यह साफ दिखाते हैं कि वायु प्रदूषण भारत में एक जानलेवा समस्या बन चुका है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार इस स्पष्ट विरोधाभास पर क्या सफाई देती है और वायु प्रदूषण से निपटने के लिए आगे क्या ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाते हैं.