हाल ही में उच्च न्यायालय ने स्कूलों में छात्राओं के लिए टॉयलेट की कमी और पीने के पानी की सुविधा न होने पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने शिक्षा सचिव से पूछा कि आखिर कैसे बच्चे शिक्षा ग्रहण करें जब उन्हें मूलभूत सुविधाएं ही उपलब्ध नहीं हैं। न्यायालय ने कहा, “हम बच्चों को जवाब नहीं दे पा रहे हैं।”
जानकारी के अनुसार, यह मामला स्कूलों में बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी को लेकर उठाया गया था। कोर्ट ने नोट किया कि कई सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं, पीने का पानी उपलब्ध नहीं है और स्वच्छता की स्थिति भी खस्ता है। इस वजह से छात्राएं न केवल असुविधा महसूस कर रही हैं, बल्कि कई बार स्कूल आने से भी डरती हैं।
कोर्ट ने शिक्षा सचिव से स्पष्ट रूप से कहा कि यह मुद्दा सिर्फ सुविधा का नहीं, बल्कि बच्चों के अधिकार और शिक्षा के अधिकार का सवाल है। न्यायालय ने निर्देश दिया कि जल्द से जल्द स्कूलों में पर्याप्त टॉयलेट और पीने का पानी सुनिश्चित किया जाए।
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विशेषज्ञों का कहना है कि देश में अभी भी कई स्कूलों में छात्राओं की मूलभूत जरूरतों की अनदेखी की जा रही है। इसके कारण शिक्षा का अधिकार प्रभावित होता है और किशोरियों में स्कूल छोड़ने की दर बढ़ जाती है।
हाईकोर्ट ने यह भी जोर दिया कि बच्चों की शिक्षा पर कोई समझौता नहीं होना चाहिए और राज्य सरकारें इस मामले में ठोस कदम उठाएं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि अगर सुधार नहीं हुआ, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
इस मामले ने एक बार फिर स्कूलों में बुनियादी सुविधाओं और छात्राओं की सुरक्षा व सम्मान की आवश्यकता को उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा की गुणवत्ता तभी सुनिश्चित हो सकती है जब बच्चों को स्कूल में सुरक्षित और स्वच्छ माहौल मिले।