बांग्लादेश में चुनाव के साथ जनमत संग्रह, 24 घंटे बाद क्या-क्या बदल जाएगा?
TV9 Bharatvarsh February 12, 2026 05:43 PM

बांग्लादेश में 12 फरवरी को सिर्फ आम चुनाव नहीं हो रहे, बल्कि देश की राजनीतिक व्यवस्था को बदलने का दावा करने वाला एक बड़ा जनमत संग्रह भी हो रहा है. शेख हसीना के 15 साल लंबे शासन के अंत के बाद यह पहला आम चुनाव है. इसके साथ ही मतदाता जुलाई चार्टर 2025 पर हां या ना में फैसला देंगे.

यही चार्टर तय करेगा कि आने वाले वर्षों में बांग्लादेश की सत्ता संरचना कैसी होगी. मतदाताओं को दो बैलेट पेपर दिए जा रहे हैं, सफेद पर्ची से सांसद चुने जाएंगे, जबकि गुलाबी पर्ची से जुलाई चार्टर पर वोट डाला जाएगा.

क्या है जुलाई चार्टर?

जुलाई चार्टर 2024 के जनआंदोलन के बाद तैयार की गई एक सुधार रूपरेखा है. इस आंदोलन के बाद अंतरिम सरकार बनी, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे हैं. सरकार का कहना है कि यह चार्टर भविष्य में किसी एक दल या नेता के हाथ में सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण रोकने के लिए लाया गया है. चार्टर में कुल 84 प्रस्ताव हैं. इनमें से 47 को लागू करने के लिए संविधान संशोधन जरूरी होगा, जबकि बाकी 37 कानून या सरकारी आदेश से लागू किए जा सकते हैं.

अगर चार्टर पास हो गया तो क्या बदलेगा?

-सबसे बड़ा बदलाव होगा प्रधानमंत्री के कार्यकाल पर सीमा. प्रस्ताव है कि कोई भी व्यक्ति दो से ज्यादा बार प्रधानमंत्री नहीं बन सकेगा.

-संसद को द्विसदनीय (बाइकैमरल) बनाने की बात भी शामिल है. यानी मौजूदा संसद के साथ 100 सीटों वाला एक उच्च सदन बनाया जाएगा, जिसकी सीटें पार्टियों को राष्ट्रीय वोट प्रतिशत के आधार पर मिलेंगी.

-महिलाओं की संसद में भागीदारी बढ़ाने का भी प्रस्ताव है. साथ ही उपसभापति और संसदीय समितियों के प्रमुख विपक्ष से चुने जाने की व्यवस्था की बात कही गई है.

-चार्टर न्यायपालिका की स्वतंत्रता मजबूत करने, चुनाव प्रणाली में सुधार और निष्पक्ष केयरटेकर सरकार की वापसी की भी सिफारिश करता है.

तो अगर जनमत संग्रह में बहुमत हां में आता है, तो नई संसद को 270 दिनों के भीतर जरूरी संवैधानिक संशोधन करने होंगे. अगर ऐसा नहीं होता, तो अंतरिम सरकार का प्रस्ताव स्वतः पारित माना जाएगा.

कौन कर रहा है समर्थन?

अंतरिम सरकार और मुहम्मद यूनुस इस चार्टर को अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं. मुख्य विपक्षी दल बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी गठबंधन भी हां के पक्ष में हैं. छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) भी इसका समर्थन कर रही है. हालांकि, पूर्व सत्ताधारी अवामी लीग को चुनाव में हिस्सा लेने से रोका गया है.

आलोचना क्यों हो रही है?

आलोचकों का कहना है कि 84 प्रस्तावों को एक साथ हां या ना में बांध देना उचित नहीं है. मतदाता कुछ सुधारों से सहमत हो सकते हैं और कुछ से नहीं, लेकिन उन्हें अलग-अलग फैसला करने का मौका नहीं दिया गया. कुछ कानूनी विशेषज्ञों ने जनमत संग्रह की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि मौजूदा संविधान लागू रहते हुए इतने बड़े बदलाव जनमत संग्रह से लागू करना कानूनी रूप से जटिल हो सकता है.

पहले भी हो चुके हैं जनमत संग्रह

बांग्लादेश में इससे पहले तीन बार जनमत संग्रह हो चुका है. साल 1977, 1985 और 1991 में. हर बार सत्ता और संविधान से जुड़े अहम फैसले लिए गए थे. अब चौथी बार देश फिर एक बड़े मोड़ पर खड़ा है. तो अगर जुलाई चार्टर पास होता है, तो बांग्लादेश की राजनीतिक व्यवस्था में बड़े ढांचेगत बदलाव देखने को मिल सकते हैं.

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