तारिक़ रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने अपने चुनाव अभियान की शुरुआत "न दिल्ली, न पिंडी, न कोई और देश, बांग्लादेश सबसे पहले" के नारे के साथ की थी.
22 जनवरी को सिलहट शहर के सरकारी आलिया मदरसा मैदान में तारिक़ रहमान ने एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा था, "कुछ लोग कहते हैं, 'आपने इसे देखा, उसे देखा, अब इसे भी देखिए.''
''प्रिय भाइयों और बहनों, 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान, जिसके माध्यम से यह देश, हमारी प्रिय मातृभूमि, लाखों लोगों के बलिदान से स्वतंत्र हुआ, हमने आम लोगों की भूमिकाएँ देखी हैं."
अपने भाषण के दौरान उन्होंने भीड़ से पूछा था, "काबा शरीफ़ का मालिक कौन है? यह दुनिया, जो हम देखते हैं, उसका मालिक कौन है? सूरज और सितारों का मालिक कौन है? जन्नत का मालिक कौन है? जहन्नुम का मालिक कौन है?"
भीड़ ने एक स्वर में "अल्लाह" कहा, तो तारिक़ रहमान ने कहा, "आप सभी ने गवाही दी कि दुनिया, जन्नत और काबा के मालिक अल्लाह हैं. अगर अल्लाह मालिक हैं, तो क्या किसी और के पास इसे देने की शक्ति है? नहीं है. तो इसका अर्थ क्या है?"
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अपने भाषण में तारिक़ रहमान ने दो चीज़ें साफ़ कर दी थीं. पिंडी मतलब पाकिस्तान से था. पाकिस्तान की सेना का मुख्यालय रावलपिंडी में है और पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि देश फ़ौज ही चलाती है.
यानी तारिक़ रहमान ने कहा था कि उनकी सरकार पाकिस्तान परस्त नहीं होगी. तारिक़ ने पिंडी के बाद कहा था कि दिल्ली भी नहीं. यानी उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि उनकी सरकार भारत के प्रभाव में काम नहीं करेगी.
दूसरी तरफ़ तारिक़ रहमान ने कहा कि अल्लाह ही मालिक है तो किसी और से क्या मतलब है. यानी उनकी राजनीति में इस्लाम प्रमुखता से रहेगा.
लेकिन चुनावी भाषण की बातें व्यावहारिक राजनीति से अलग होती हैं. इसके बावजूद एक अंदाज़ा लग जाता है कि सरकार की दिशा क्या होगी और उसकी सीमा क्या होगी.
@DrSJaishankar बीते दिसंबर में ख़ालिदा ज़िया के निधन पर शोक संदेश देने के लिए भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर तारिक़ रहमान से ढाका में मिले थे भारत के साथ रिश्ते
तारिक़ रहमान ने चुनाव से पहले कई ऐसी बातें कही हैं, जिनसे संकेत मिलते हैं कि वह अपनी नीतियों में भारत को कैसे लेंगे.
कई विवादित मुद्दे अब भी बने हुए हैं, जिनमें तीस्ता नदी का सवाल शामिल है, जहां बीएनपी 1997 के यूएन वाटर कन्वेंशन पर हस्ताक्षर कर पानी में न्यायसंगत हिस्सेदारी का दावा करती है.
तारिक़ रहमान ने अमेरिकी पत्रिका टाइम से कहा था, ''शेख़ हसीना के दौर में भारत और बांग्लादेश के बीच हुए कई समझौतों में असंतुलन है, जिन्हें द्विपक्षीय संबंधों को सही मायने में रीसेट करने के लिए ठीक करना होगा."
"बांग्लादेश का हित, हमारे लोगों के हितों की रक्षा, सबसे पहले आती है, फिर हम संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे."
बांग्लादेश की किसी भी सरकार के लिए भारत से भरोसे वाला संबंध मायने रखता है.
बांग्लादेश लगभग पूरी तरह दक्षिण एशिया की बड़ी शक्ति भारत से घिरा हुआ है. दोनों देशों के बीच लगभग 2,500 मील लंबी साझा सीमा दुनिया की सबसे लंबी सीमाओं में से एक है.
बांग्लादेश के अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए भारत अहम है. भारत बांग्लादेश के लिए कपास, अनाज, ईंधन, औद्योगिक सामग्री और बिजली सहित कई आयातों का एक बड़ा स्रोत भी है.
तारिक़ रहमान ने टाइम मैगज़ीन से कहा था, "हमारे लोगों और देश के हितों की रक्षा सबसे पहले है, उसके बाद हम संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे."
AFP via Getty Images बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना इस समय भारत में निर्वासित हैं शेख़ हसीना को शरण देने पर बीएनपी का रुख़
अटलांटिक काउंसिल में दक्षिण एशिया के वरिष्ठ फ़ेलो माइकल कुगलमैन मानते हैं कि हसीना को शरण देने और अवामी लीग के पक्ष में प्रचार को बढ़ावा देने के कारण युवा बांग्लादेशियों की नज़र में भारत की छवि नकारात्मक हुई है.
कुगलमैन ने टाइम मैगज़ीन से कहा, ''तारिक़ रहमान जैसे नेता के लिए भी खुलकर नई दिल्ली के साथ नज़दीकी की बात करना राजनीतिक रूप से जोखिम भरा रहेगा."
कई लोग मानते हैं कि जब शेख़ हसीना ख़ुद बांग्लादेश में अलोकप्रिय हो रही थीं, तब भारत को अपनी नीति बदलनी चाहिए थी.
बांग्लादेश में 2023 के चुनाव को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे थे लेकिन भारत ने शेख़ हसीना का बचाव किया था. कहा जाता है कि भारत ने टूटने की आशंका के बावजूद अपने सारे अंडे अवामी लीग की टोकरी में रख दिए थे.
बीएनपी के कई नेता बांग्लादेश बनाने में भारत की भूमिका का खुलकर नज़रअंदाज़ करते हैं.
बीएनपी के स्टैंडिंग कमिटी के सदस्य मिर्ज़ा अब्बास ने दिसंबर 2024 में कहा था, ''भारत ने बांग्लादेश नहीं बनाया. हमने बांग्लादेश मुक्त कराया. भारत ने तो पाकिस्तान को बाँटा और ये अपने स्वार्थ में किया न कि हमारे स्वार्थ के लिए.''
शेख़ हसीना के भारत में रहने का सवाल तारिक़ रहमान और मोदी सरकार दोनों को परेशान कर सकता है.
बांग्लादेश के भीतर शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग ख़त्म नहीं हुई है. यहाँ तक कि चुनाव जीतने के बाद बीएनपी के नेताओं ने भी कहा कि शेख़ हसीना के प्रत्यर्पण की मांग जारी रहेगी.
बीएनपी के वरिष्ठ नेता सलाहुद्दीन अहमद ने कहा, "विदेश मंत्री पहले ही उनके प्रत्यर्पण के मामले को आगे बढ़ा चुके हैं और हम भी इसका समर्थन करते हैं."
बीएनपी की शेख़ हसीना से शत्रुता किसी से छुपी नहीं है. तारिक़ रहमान की माँ ख़ालिदा ज़िया शेख़ हसीना के शासन में लंबे समय तक जेल में रही थीं और जेल में ही उनकी तबीयत बिगड़ी थी.
ढाका विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर दिलावर हुसैन ने क़तर के न्यूज़ चैनल अल-जज़ीरा से बांग्लादेश के चुनाव परिणाम को भारत और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय संबंधों में एक नया मोड़ बताया.
हुसैन ने अल जज़ीरा से कहा, "नई सरकार स्पष्ट मक़सद और रणनीतियों के साथ एक नीतिगत ढांचा ला सकती है. भारत-पाकिस्तान की दुश्मनी और चीन-भारत प्रतिद्वंद्विता, पड़ोस में बांग्लादेश की विदेश नीति की चालों के महत्वपूर्ण निर्धारक बने रह सकते हैं."
हुसैन ने कहा, "भारत को अतीत में बीएनपी-नेतृत्व वाले राजनीतिक शासन के साथ काम करने का अनुभव है. भारत ने भविष्य की बीएनपी सरकार के साथ काम करने की अपनी उत्सुकता दिखाई है. अब जब चुनाव समाप्त हो गए हैं, यह एक वास्तविकता बन गई है."
जॉर्जिया स्टेट यूनिवर्सिटी के जियोपॉलिटिकल विश्लेषक आसिफ़ बिन अली ने अल-जज़ीरा से ही कहा, ''बांग्लादेश में एक निर्वाचित सरकार के पास भारत के साथ संबंधों की ओर लौटने के कई कारण हैं लेकिन शेख़ हसीना वाली स्थिति नहीं होगी. मैं एक अधिक सतर्क मध्य-स्थिति की अपेक्षा करता हूँ, जो पारस्परिक सम्मान, परस्पर संप्रभुता और एक-दूसरे की घरेलू राजनीति में हस्तक्षेप न करने पर ज़ोर दे, साथ ही ढाका की अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के लिए स्थान बनाए रखे."
AFP via Getty Images शेख़ हसीना के साथ भारत की क़रीबी बढ़ने के साथ बीएनपी से दूरी भी बढ़ती गई.
1990–1991 में बांग्लादेश में लोकतंत्र की वापसी ने भारत में शुरुआत में यह उम्मीद जगाई कि द्विपक्षीय संबंधों में सुधार हो सकता है.
लेकिन बांग्लादेश में सत्ता में आई नई सरकार का नेतृत्व बीएनपी ने किया.
शुरुआती सकारात्मक संकेतों, जैसे 1992 में प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया की भारत यात्रा और दोनों देशों के बीच एक नए व्यापार समझौते के बावजूद, बेहतर संबंधों की उम्मीदें जल्द ही टूट गईं.
भारतीय अधिकारियों ने बांग्लादेश पर विद्रोहियों को समर्थन जारी रखने का आरोप लगाया और पानी-बँटवारे के साथ सीमा निर्धारण जैसे प्रमुख द्विपक्षीय मुद्दों पर बहुत कम प्रगति हो सकी.
जमात-ए-इस्लामी के समर्थन वाली बीएनपी सरकार पर भारत के आरोप के बाद अविश्वास बढ़ गया.
भारत की आंतरिक राजनीति का असर भी दोनों देशों के संबंधों पर पड़ा.
भारत के प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिन्दू ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ''बांग्लादेश में भारत-विरोधी भावनाएं गहरी हुई हैं क्योंकि कई लोग नई दिल्ली को हसीना सरकार का समर्थक मानते हैं."
"हसीना का भारत में लगातार रहना और उनके समय-समय पर दिए गए राजनीतिक बयान माहौल को और प्रभावित कर सकते हैं. पाकिस्तान जो पहले ढाका की रणनीतिक सोच में अपेक्षाकृत हाशिये पर था, उसने नए बांग्लादेश के साथ संबंधों को ज़िंदा और विस्तारित करने के लिए तेज़ी से क़दम बढ़ाए हैं."
14 फ़रवरी को हिन्दूने अपने संपादकीय में लिखा, ''जमात-ए-इस्लामी से आने वाली चुनौती के लिए भारत को तैयार रहना होगा. जमात गठबंधन ने संसद में 75 से ज़्यादा सीटें जीतकर अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है."
"अब अधिक मुखर विपक्ष के रूप में, जमात जिसके नेताओं ने महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक राजनीति पर रूढ़िवादी रुख़ अपनाया है, नए मध्यमार्गी सरकार को दाईं ओर धकेलने की कोशिश करेगी. मतदाताओं ने 'जुलाई चार्टर' जनमत-संग्रह का भी जोरदार समर्थन किया है, जिसमें कार्यवाहक सरकार, प्रधानमंत्री की शक्तियों में संभावित बदलाव और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के साथ संसद में उच्च सदन की स्थापना जैसे सुधारों की मांग की गई है.''
हिन्दू ने लिखा है, ''मोदी सरकार के बीएनपी के साथ पहले तनावपूर्ण संबंध रहे हैं, क्योंकि हसीना के कार्यकाल के दौरान बांग्लादेश के विपक्ष के साथ जुड़ाव कम हुआ था. भारत को उस कूटनीतिक और रणनीतिक स्थान को भी फिर से हासिल करना होगा, जिसे पाकिस्तान, अमेरिका और चीन ने हसीना के सत्ता से हटने के बाद मज़बूत किया है.''
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.