जंग की आग में झुलसा सोना! 29 हजार तक टूटे दाम, क्यों बिखर रहा है सेफ हैवन का तिलिस्म?
TV9 Bharatvarsh March 24, 2026 10:42 AM

आमतौर पर दुनिया में जब भी जंग के हालात बनते हैं, तो निवेशक सबसे पहले सोने की तरफ दौड़ते हैं. इसे हमेशा से सबसे सुरक्षित निवेश यानी ‘सेफ हैवन’ माना गया है. लेकिन पश्चिमी एशिया में चल रहे भारी तनाव के बीच इस बार उलटी गंगा बह रही है. अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच पिछले 24 दिनों से जारी युद्ध के बावजूद सोने की कीमतों में भयंकर गिरावट दर्ज की गई है. पीली धातु करीब 18 फीसदी टूट चुकी है, प्रति 10 ग्राम सोने के दाम में लगभग 29,000 रुपये की भारी कमी आई है.

एक तरफ कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिसने वैश्विक बाजारों को हिला कर रख दिया है. ऐसे हालात में सोने के दाम आसमान छूने चाहिए थे, लेकिन सोमवार को यह 5% से ज्यादा गिरकर 2026 के अपने सबसे निचले स्तर पर आ गया. यह पिछले 43 वर्षों में सोने के लिए सबसे खराब हफ्ता साबित हुआ है. एक आम निवेशक के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है .

डॉलर का बढ़ता दबदबा कम रहा सोने की चमक

मौजूदा समय में सोने पर सबसे बड़ा दबाव अमेरिकी डॉलर की बढ़ती ताकत का है. भू-राजनीतिक अनिश्चितता के दौर में निवेशक सिर्फ सोने की तरफ नहीं भाग रहे, बल्कि डॉलर में भी भारी निवेश कर रहे हैं क्योंकि यह ज्यादा भरोसेमंद माना जाता है. मध्य फरवरी में अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) 97 के स्तर पर था, जो मध्य मार्च तक उछलकर 100.15 पर पहुंच गया है.

चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का व्यापार डॉलर में होता है, इसलिए डॉलर के मजबूत होने से अन्य मुद्राओं वाले निवेशकों के लिए सोना काफी महंगा हो जाता है. इससे इसकी मांग घटती है. इसके अलावा, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों ने दुनियाभर में महंगाई का डर पैदा कर दिया है. इस घबराहट में निवेशक अपना पैसा सुरक्षित करने के लिए निवेश निकाल रहे हैं. पिछले हफ्ते अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने भी अपनी नीतिगत बैठक में ब्याज दरों को 3.5% से 3.75% पर स्थिर रखा है. फेड के कड़े रुख से साफ संकेत मिलता है कि फिलहाल ब्याज दरें घटने की कोई जल्दबाजी नहीं है, जिससे सोने का आकर्षण कम हुआ है.

2025 की तेजी का असर

इस महा-गिरावट को समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा. पश्चिमी एशिया में युद्ध शुरू होने से पहले ही सोने ने निवेशकों को मालामाल कर दिया था. अकेले साल 2025 में सोने ने 70% की असाधारण छलांग लगाई थी. इस जबरदस्त तेजी के बाद सोने के भाव पहले ही काफी ऊंचे हो चुके थे.

ऐसे में जब युद्ध के कारण बाजार में अस्थिरता और घबराहट बढ़ी, तो निवेशकों ने महंगे भाव पर नया सोना खरीदने के बजाय अपना पुराना सोना बेचकर मुनाफा पक्का करना बेहतर समझा. बाजार के जानकारों के मुताबिक, जब कोई एसेट इतनी लंबी और तेज छलांग लगाता है, तो उसके बाद मुनाफावसूली एक बेहद आम बात है. निवेशकों ने नए जोखिम लेने के बजाय अपनी कमाई को सुरक्षित रखने को प्राथमिकता दी.

संकट में ‘कैश’ बना किंग

बाजार में भारी उथल-पुथल के समय अक्सर निवेशक सबसे ज्यादा अहमियत नकदी (Cash) को देते हैं. सोना दुनिया की उन चुनिंदा संपत्तियों में से एक है, जिसे तुरंत बेचकर कैश हासिल किया जा सकता है. इन दिनों शेयर बाजार या अन्य जगहों पर हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए लोग बड़े पैमाने पर अपना सोना बेच रहे हैं.

इसका सबसे अच्छा उदाहरण दुबई में देखने को मिल रहा है. वहां रहने वाले कई अप्रवासी भारतीय (NRI) इस युद्ध के बीच अपना सोना धड़ल्ले से बेच रहे हैं. स्थानीय ज्वैलर्स के मुताबिक, जब से यह इलाका तनाव की चपेट में आया है, रोजाना 100 से ज्यादा ग्राहक सोना बेचने पहुंच रहे हैं. लोग अपने गहने और सोने के बिस्कुट डिस्काउंट पर भी बेचने को तैयार हैं, ताकि नकदी इकट्ठा कर सकें और जरूरत पड़ने पर पैसा सुरक्षित अपने घर (भारत) भेज सकें. वहां के व्यापारी रोजाना करीब एक किलो सोना सिर्फ ऐसे ही ग्राहकों से खरीद रहे हैं.

इसके साथ ही, अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US bond yields) में हो रही लगातार बढ़ोतरी ने भी सोने की चमक फीकी कर दी है. जब सरकारी बॉन्ड पर बिना किसी जोखिम के अच्छा रिटर्न मिलने लगता है, तो निवेशक सोने जैसी संपत्तियों (जिस पर कोई तय ब्याज नहीं मिलता) से दूरी बनाने लगते हैं.

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