भारतीय सशस्त्र बल पारंपरिक रूप से राजनीति से अलग रहे हैं। भारत के आजाद होने के फौरन बाद मांग उठी थी कि नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा स्थापित ‘आजाद हिन्द फौज’ को भारतीय सेना में मिला दिया जाए। इस मांग को अस्वीकार कर दिया गया और सेना को राजनीति से मुक्त रखने के लिए इसे भंग कर दिया गया। सांप्रदायिक दंगों के दौरान शांति बहाल करने के लिए सेना को ही बुलाया जाता है, क्योंकि उसपर एक निष्पक्ष शक्ति के रूप में भरोसा किया जाता है। लेकिन, अब ये परंपराएं सुरक्षित नहीं।
भारत में सऊदी अरब के ‘मुतावीन’ जैसी अर्ध-धार्मिक पुलिस फोर्स नहीं है, लेकिन आरएसएस-हिन्दुत्व ब्रिगेड के स्वयंभू रक्षक कानून अपने हाथ में लेते हैं; मुसलमानों की लिंचिंग करते हैं, उन्हें सजा देते हैं, धमकाते हैं और उनसे उगाही करते हैं। दरअसल, भारत ने हाल ही में ‘मुतावीन’ जैसी एक फोर्स बनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है। काशी विश्वनाथ मंदिर में तैनात पुलिसकर्मियों को भगवा धोती-कुर्ता, रुद्राक्ष की माला और त्रिपुंड तिलक पहनाया गया, और उन्हें तीर्थयात्रियों का स्वागत ‘हर हर महादेव’ के जयघोष के साथ करने को कहा गया।
भारत के इस ‘भगवाकरण’ ने तब खतरनाक मोड़ ले लिया जब सैनिक स्कूलों को ‘पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप’ मॉडल के तहत संघ से जुड़े संगठनों को सौंप दिया गया। इससे सैन्य शिक्षण संस्थानों में हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रवेश का गंभीर खतरा पैदा हो गया है। चूंकि सैनिक स्कूल बड़ी संख्या में छात्रों को सशस्त्र बलों में शामिल होने के लिए तैयार करने में मदद करते हैं, इसलिए इसका नतीजा यह हो सकता है कि हमारे धर्मनिरपेक्ष सशस्त्र बल, हिन्दुत्व ब्रिगेड की ही एक शाखा में तब्दील हो जाएं।
पहले, स्वायत्त सैनिक स्कूल सोसाइटी रक्षा मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के तहत 33 सैनिक स्कूल चलाती थी। इनमें 16,000 छात्र पढ़ते थे, और उनमें से 25-30 फीसद को भारतीय सशस्त्र बलों की विभिन्न प्रशिक्षण अकादमियों में भेजा जाता था। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने आधिकारिक तौर पर कहा है कि सैनिक स्कूलों ने सशस्त्र बलों को 7,000 से अधिक अधिकारी दिए हैं।
2021 में, केन्द्र सरकार ने निजी क्षेत्र के लिए भी इन स्कूलों के दरवाजे खोल दिए। देश में 100 करोड़ के बजट के साथ 100 नए सैनिक स्कूल खोलने की योजना की घोषणा की गई। एक नया सैनिक स्कूल शुरू करने के लिए बस ‘जमीन, भौतिक और बुनियादी आईटी ढांचा, वित्तीय संसाधन और कर्मचारी’ की जरूरत थी। चुने गए स्कूलों को सरकार से 1.2 करोड़ रुपये तक की वित्तीय मदद मिलती और उन्हें एक विशेष वर्टिकल (मॉडल) के रूप में चलाने की तैयारी हुई जो रक्षा मंत्रालय के मौजूदा सैनिक स्कूलों से अलग और भिन्न था।
आरटीआई जवाबों और सरकारी प्रेस रिलीज के आधार पर ‘रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ द्वारा पुष्टि किए गए इस आसान क्राइटेरिया से पता चला कि ‘अब तक हुए 40 सैनिक स्कूल समझौतों में से, कम-से-कम 62 प्रतिशत समझौते आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों, बीजेपी नेताओं, उनके राजनीतिक सहयोगियों और दोस्तों, हिन्दुत्व संगठनों और अन्य हिन्दू धार्मिक संगठनों से जुड़े स्कूलों को दिए गए’ (3 अप्रैल 2024)। मई 2025 तक, 46 और स्कूलों को मंजूरी मिल गई।
इनमें से कई आवंटियों पर गंभीर सवाल उठते हैं। विश्व हिन्दू परिषद की उग्रवादी महिला शाखा, दुर्गा वाहिनी की संस्थापक साध्वी ऋतंभरा इनमें से एक हैं। उनके वृंदावन स्थित स्कूल का नाम ‘संविद गुरुकुलम गर्ल्स सैनिक स्कूल’ है। 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद गिराए जाने से पहले, मुसलमानों के खिलाफ भावनाएं भड़काने में ऋतंभरा ने अहम भूमिका निभाई थी। बाबरी मस्जिद गिराए जाने की जांच करने वाले लिब्रहान आयोग ने उन्हें उन 68 लोगों में शामिल किया था, जिन्हें देश को ‘सांप्रदायिक कलह के कगार’ पर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार माना गया था।
सेंट्रल हिन्दू मिलिट्री एजुकेशन सोसाइटी द्वारा संचालित भोंसला मिलिट्री स्कूल (बीएमएस), नागपुर को भी सैनिक स्कूल के तौर पर चलाने की मंजूरी मिली। इस स्कूल की स्थापना 1937 में हिन्दू दक्षिणपंथी विचारक बी.एस. मुंजे ने की थी।
2006 के नांदेड़ बम धमाके और 2008 के मालेगांव धमाकों की जांच के दौरान, महाराष्ट्र एंटी-टेरर स्क्वॉड और अन्य एजेंसियों ने खुलासा किया कि साजिश में शामिल लोगों ने बीएमएस में हथियारों और विस्फोटकों का प्रशिक्षण लिया था। परिसर में आयोजित 40-दिवसीय प्रशिक्षण शिविर, जिसमें 54 लोगों को प्रशिक्षित किया गया था, का संबंध बजरंग दल के उन कार्यकर्ताओं से था, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने मस्जिदों और अन्य ठिकानों पर बम धमाके किए थे। 2025 में, मालेगांव धमाके के 17 साल बाद, मुंबई की एक विशेष एनआईए अदालत ने सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया।
आंध्र प्रदेश के नेल्लोर में अडानी समूह द्वारा संचालित अडानी वर्ल्ड स्कूल को भी सैनिक स्कूल का दर्जा मिल गया है। समूह पर अमेरिकी सरकार ने सोलर पावर के ठेके के लिए अरबों डॉलर की रिश्वत और धोखाधड़ी की साजिश रचने का आरोप लगाया है, और उन पर अमेरिकी सिक्योरिटी नियमों के उल्लंघन का भी आरोप है। ज्यादातर नए सैनिक स्कूल बीजेपी नेताओं या उनके ट्रस्टों को सौंपे गए हैं। ये स्कूल देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश के तवांग सैनिक स्कूल का मालिकाना हक राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के पास है। खांडू के भाई त्सेरिंग ताशी, जो बीजेपी विधायक हैं, इसके प्रबंध निदेशक हैं।
गुजरात के मेहसाणा में, मोतीभाई आर. चौधरी सागर सैनिक स्कूल, दूधसागर डेयरी से जुड़ा है। इस डेयरी के अध्यक्ष अशोककुमार भवसंगभाई चौधरी हैं, जो मेहसाणा में बीजेपी के महासचिव रह चुके हैं। इसी तरह, बनासकांठा का बनास सैनिक स्कूल का प्रबंधन, बनास डेयरी के अंतर्गत आने वाले ‘गलबाभाई नानजीभाई पटेल चैरिटेबल ट्रस्ट’ द्वारा किया जाता है। इस ट्रस्ट के प्रमुख शंकर चौधरी हैं, जो गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष हैं।
यही पैटर्न उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में भी देखने को मिलता है। वर्ष 1978 से, आरएसएस ‘विद्या भारती’ के बैनर तले स्कूलों का एक नेटवर्क चला रहा है। अभी यह 12,065 औपचारिक स्कूल संचालित करता है, जिनमें 3,158,658 विद्यार्थी हैं; इस तरह यह भारत में निजी स्कूलों के सबसे बड़े नेटवर्कों में एक है। अपनी वेबसाइट पर, विद्या भारती ने अपने मिशन के बारे में कहा है कि उसका उद्देश्य ‘एक ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण करना है, जो हिन्दुत्व के प्रति समर्पित हो और जिसमें देशभक्ति का प्रबल जज्बा भरा हो।’
एक रिटायर्ड मेजर जनरल ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘यह पूरी तरह से गैर-संवैधानिक है। ये नए सैनिक स्कूल न सिर्फ सेना के गैर-राजनीतिक चरित्र को बदल देंगे, बल्कि भारतीय लोकतंत्र भी खतरे में पड़ जाएगा। सरकार को मौजूदा राष्ट्रीय इंडियन मिलिट्री कॉलेज और स्कूलों को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए था। उन्हें राष्ट्रीय संस्थानों, खासकर रक्षा संस्थानों से जोड़कर, सरकार देश के लिए एक ऐसा खतरा पैदा कर रही है, जिसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इससे रक्षा बलों में बहुसंख्यकवादी और सांप्रदायिक सोच का आना तय है।”
सेना के पूर्व डिप्टी चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल जमीरुद्दीन शाह का मानना है कि मौजूदा सरकार ‘सेना को ऐसे लोगों से भरना चाहती है, जिन्हें एक खास विचारधारा में ढाल दिया गया हो। इसका मतलब यह नहीं है कि पहले हम धार्मिक नहीं थे। बात बस इतनी थी कि कुछ सीमाएं पार नहीं की जाती थीं। सरकार शायद भूल रही है कि इस रास्ते को चुनकर, वे हमारे गले में एक फंदा डाल रहे हैं। उन दूसरे समुदायों के सैनिकों का क्या होगा, जो अपने देश की सेवा करना चाहते हैं?’
अग्निवीर योजना की भी कड़ी आलोचना करते हुए शाह ने कहा, ‘मेरे अनुभव के अनुसार, सबसे बेहतरीन सैनिक 25-35 वर्ष की आयु वर्ग के होते हैं। लेकिन अग्निवीर योजना के तहत, ये नौजवान 18 साल की उम्र में सेना में शामिल होते हैं और 22 तक बाहर हो जाते हैं।’ लेफ्टिनेंट जनरल प्रकाश मेनन (सेवानिवृत्त), जो वर्तमान में तक्षशिला संस्थान के रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं, ने सरकार और निजी पक्षों के बीच पनप रहे उस गठजोड़ के प्रति आगाह किया है, जिसका उद्देश्य वैचारिक रूप से शिक्षा के ऐसे पक्षपाती संस्करण को बढ़ावा देना है, जो संविधान में निहित मूल्यों से कोसों दूर है।