चीन के CCTV कैमरों से सुरक्षा को खतरा! क्या भारत तैयार है Digital Security के लिए?
et April 02, 2026 09:47 PM
विराग गुप्ता
मोबाइल और CCTV नेटवर्क की डिजिटल रेकी से ईरान पर इजराइल और अमेरिका के साइबर हमलों से भारत में चिंता बढ़ी है। भारत में निजी और सरकारी तौर पर करोड़ों सीसीटीवी कैमरों का जाल बिछा है। ये कैमरे या तो चीन में बने हैं या उनमें चीनी उपकरणों और इंटीग्रेटेड चिप्स का इस्तेमाल हुआ होगा। इन कैमरों को सस्ती दरों पर भारत जैसे देशों में एक्सपोर्ट करने के लिए चीनी सरकार निजी कंपनियों को बड़े पैमाने पर सब्सिडी देती है। उसके एवज में चीन को भारत की जासूसी करने के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा में सेंध लगाने का सामरिक मौका मिलता है। चीनी कैमरों से जासूसी का खतरा राजधानी दिल्ली के साथ पूरे देश में मंडरा रहा है, जिससे जुड़े पहलुओं की समझ जरूरी है।
संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार संचार के अंतर्गत इंटरनेट और सीसीटीवी कैमरे यूनियन लिस्ट यानी केंद्र सरकार के अधीन आते हैं। इन कैमरों को अपराध रोकने के लिए लगाया जाता है, जिसके लिए राज्यों की पुलिस को अधिकार है। दिल्ली में पुलिस के साथ NDMC और PWD द्वारा कैमरे लगवाए जा रहे हैं। सरकारी फंड के साथ कैमरों के लिए पार्षद, विधायक और सांसद निधि से भी अरबों रुपये खर्च हो रहे हैं।
दिल्ली में साल 2018 के बाद दो चरणों में पीडब्ल्यूडी ने 652 करोड़ की लागत से 2.64 लाख कैमरे लगाए हैं। इनमें से 32,000 कैमरे काम नहीं कर रहे और 1.4 लाख चीनी कैमरों को अब तीन चरणों में हटाया जा रहा है। जिन चीनी कैमरों के बारे में दिल्ली सरकार को जानकारी है, उन्हें चरणों में हटाने की बजाय तुरंत प्रभाव से क्यों नहीं हटाना चाहिए? जरूरी सवाल यह भी है कि जब राजधानी दिल्ली में चीनी कैमरे लगाए जा रहे थे तो उस समय केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस और खुफिया एजेंसियों ने विरोध क्यों नहीं दर्ज कराया?
हार्डवेयर के क्षेत्र में चीनी उत्पादों का वर्चस्व है। इसे समझने के लिए बीसवीं सदी के उस दौर में जाना पड़ेगा जब चीन ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों को मानने से इनकार करते हुए बड़े पैमाने पर सस्ते उत्पादों को बढ़ावा दिया। दूसरी ओर भारत में डब्ल्यूटीओ के प्रतिबंधों की वजह से हार्डवेयर की उभरती अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे ध्वस्त हो गई। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में अमेरिकी कंपनियों का वर्चस्व है। इसके दायरे में ई-मेल, सोशल मीडिया, अकाउंटिंग, क्लाउड, डेटा सेंटर, ईआरपी जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र आते हैं। इस वर्चस्व के आधार पर चीन और अमेरिका की कंपनियां AI के क्षेत्र में झंडे गाड़ रही हैं। जबकि 140 करोड़ की आबादी वाले भारत की अर्थव्यवस्था चीनी हार्डवेयर और अमेरिकी सॉफ्टवेयर के डिजिटल साम्राज्यवाद के कुचक्र में बुरी तरह से फंस गई है।
सीसीटीवी में कैमरा, डीवीआर, केबल और वीडियो स्क्रीन मुख्य हिस्से होते हैं। चीन की 3 बड़ी कंपनियों—हिकविजन, दहुआ और टीपी लिंक—का इन कैमरों के निर्माण में वर्चस्व है। कोरोना के बाद पबजी समेत कई चीनी ऐप्स पर भारत ने प्रतिबंध लगा दिया था। उसके अलावा चीनी टेलीकॉम उपकरणों के आयात पर भी अनेक प्रकार के प्रतिबंध हैं। इन प्रतिबंधों को दो तरीके से धता बताया जा रहा है। चीनी कंपनियां अपने कैमरों को हांगकांग, ताइवान और दुबई के माध्यम से भेज रही हैं। दूसरा—कैमरों में लगने वाली इंटीग्रेटेड चिप्स को भारतीय कंपनियां आयात करके उन्हें Make in India का नाम दे रही हैं। इन दोनों स्थितियों में कैमरों में जासूसी का नियंत्रण चीनी कंपनियों और चीन की सरकार के पास बरकरार रहता है। दिल्ली सरकार पुराने कैमरों को हटाकर नए कैमरे लगाने की बात कर रही है। लेकिन भारत में बिकने वाले अधिकांश कैमरों का कंट्रोल चीनी कंपनियों के पास होने से स्थिति गंभीर है।
सीसीटीवी के नियमन के लिए अनेक तरह के कायदे-कानून हैं, लेकिन उनका पालन नहीं हो रहा। केंद्र सरकार के आईटी मंत्रालय के अधीन स्टैंडर्डाइजेशन टेस्टिंग एंड क्वालिटी सर्टिफिकेशन डायरेक्टोरेट (STQC) कैमरों की क्वालिटी, सोर्स कोड, सॉफ्टवेयर और सुरक्षा की जांच करती है। लेकिन भारत में चीन के करोड़ों सीसीटीवी के नेटवर्क से जाहिर है कि एसटीक्यूसी अपने लक्ष्य को पूरा करने में विफल रही है। चीनी कैमरों और इम्पोर्ट को रोकने के लिए वित्त मंत्रालय के अधीन कस्टम्स विभाग और वाणिज्य मंत्रालय के अधीन DGFT भी विफल हो रहे हैं। सीसीटीवी के अलावा कई अन्य तरीकों से भारत के खिलाफ जासूसी हो रही है। उसे रोकने के लिए IT Act के अलावा BNS और Official Secrets Act जैसे कई कानूनों में प्रावधान हैं। डिजिटल इंडिया के तहत केंद्र सरकार के सभी कार्यालयों में अटेंडेंस दर्ज करने के लिए मशीन लगाई गई हैं। इनमें से अधिकांश मशीनें चीन से इम्पोर्ट की गई हैं।
स्मार्ट सिटी, सरकारी दफ्तर, रेलवे, स्कूल, बाजार, आवासीय कॉलोनियों और सड़कों में फैले करोड़ों सीसीटीवी कैमरों के डेटा को सुरक्षित रखने और उसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है। साल 2017 में पुट्टास्वामी मामले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों के फैसले के अनुसार संसद ने डेटा सुरक्षा के लिए साल 2023 में DPDP Act बनाया था। लेकिन उसे अभी तक लागू नहीं किया गया। इसकी वजह से लोगों की निजता के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे बढ़ रहे हैं। अपराधों की रोकथाम और बेहतर पुलिसिंग के लिए सीसीटीवी का नेटवर्क जरूरी है। लेकिन देश की सुरक्षा को खतरे में डालने वाले सीसीटीवी नेटवर्क को लगाने के लिए सरकारें खरबों रुपये बर्बाद नहीं कर सकतीं।
विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं और डिजिटल कानून, साइबर नीति तथा डेटा सुरक्षा से जुड़े मामलों के विशेषज्ञ माने जाते हैं। वे “डिजिटल कानूनों से समृद्ध भारत” के लेखक हैं और तकनीक व कानून के अंतर्संबंधों पर नियमित रूप से लेखन करते हैं।
यह लेख पूरी तरह से लेखक के निजी विचारों और उनके शोध पर आधारित है। इसमें व्यक्त विचार किसी भी रूप में टाइम्स ऑफ इंडिया समूह व उसके सहयोगी प्रकाशनों के आधिकारिक दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व नहीं करते।