पश्चिम बंगाल में शरणार्थी मतुआ समुदाय के साथ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का रिश्ता वर्षों तक एक वादे पर टिका रहा - पार्टी का समर्थन करें और नागरिकता को लेकर चली आ रही अनिश्चितता खत्म हो जाएगी। लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बाद जारी अंतिम मतदाता सूची ने इस वादे को अब बीजेपी की सबसे बड़ी कमजोरी बना दिया है।
नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों में मतुआ समुदाय के लाखों नामों के हटाए जाने से उस हिंदू शरणार्थी क्षेत्र में राजनीतिक बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, जो 2019 से बंगाल में बीजेपी के विस्तार का केंद्र रहा है।
पार्टी को झटका सिर्फ हटाए गए नामों की संख्या से नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों से लगा है जहां इसका सबसे अधिक असर पड़ा।
बनगांव, बगदाह, गायघाटा, स्वरूपनगर, रानाघाट और कृष्णानगर जैसे इलाकों में बीजेपी ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के वादे पर मजबूत सामाजिक आधार बनाया था।
अब इन क्षेत्रों में राजनीतिक चर्चा बदल गई है। कुछ महीने पहले तक बीजेपी मतुआ मतदाताओं से सीएए के जरिए पहचान का संकट खत्म करने के नाम पर समर्थन मांग रही थी, लेकिन अब वही मतदाता पूछ रहे हैं कि वर्षों तक समर्थन देने के बाद भी उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने के लिए क्यों मजबूर किया जा रहा है।
गायघाटा के अशोक मंडल ने कहा, ‘‘नागरिकता के वादे पर वोट देने के बाद अब मेरा वोट देने का अधिकार ही खत्म हो गया। अगर मेरा नाम सूची में नहीं है, तो क्या गारंटी है कि कल मुझे यहां का निवासी नहीं कहा जाएगा?’’
मतदाता आधार में गिरावट के संकेत भी दिखने लगे हैं। बगदाह के बोयरा गांव में करीब 50 मतुआ परिवार अपने नाम सूची से गायब मिलने के बाद बीजेपी छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का समर्थन कर रहे हैं।
मतुआ वोट लगभग 55 विधानसभा सीटों में फैला है और दक्षिण बंगाल की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। बीजेपी के अंदरूनी सूत्र मानते हैं कि 2021 के चुनाव में उनकी 77 सीटों में से आधे से अधिक सीटें इन्हीं क्षेत्रों से आई थीं।
इसी वजह से अंतिम मतदाता सूची ने बीजेपी के लिए असहज स्थिति खड़ी कर दी है।
बनगांव के एक बीजेपी नेता ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया, ‘‘अगर मतुआ मतदान बाधित होता है, तो हमें नुकसान होगा क्योंकि यह हमारा मुख्य सामाजिक आधार है। अब हमारी चुनौती उन मतदाताओं को अपने साथ बनाए रखना है जो मतदाता सूची में बने हुए हैं और बाकी लोगों को यह विश्वास दिलाना है कि उनके नाम बहाल कर दिए जाएंगे।’’
उत्तर 24 परगना में 12.3 लाख से अधिक नाम हटाए गए, जबकि बनगांव उपखंड सबसे ज्यादा प्रभावित रहा।
नदिया जिले में भी बड़ी संख्या में नाम कटे हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित क्षेत्रों में ‘‘अनमैप्ड’’ मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक रही, जिससे मुख्य रूप से मतुआ और नामशूद्र समुदाय प्रभावित हुआ।
इस स्थिति ने बीजेपी को असहज कर दिया है, क्योंकि पहले वह कहती रही थी कि हिंदू शरणार्थियों को दस्तावेजों की चिंता करने की जरूरत नहीं है। अब वही लोग आधार, राशन कार्ड और अन्य कागजात लेकर अपनी पहचान साबित करने के लिए कतारों में खड़े हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे मुद्दा बनाते हुए बीजेपी पर हमला बोला है। वहीं बीजेपी नेताओं का कहना है कि लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है और उनके नाम फिर से जोड़े जाएंगे।
फिर भी मतुआ क्षेत्रों में असमंजस और नाराजगी बनी हुई है और लोग सवाल कर रहे हैं कि अगर वोट देने के बाद भी उनकी नागरिकता और मतदाता पहचान सुरक्षित नहीं है, तो उस समर्थन का आखिर क्या मतलब रह गया।