श्रमिक आंदोलन: आखिर क्यों जल उठे नोएडा और मानेसर!
Navjivan Hindi April 18, 2026 10:43 PM

जब 13-14 अप्रैल 2026 को नोएडा के औद्योगिक सेक्टरों में फैक्ट्री मजदूर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, प्राइम टाइम टीवी एंकर एक मनगढ़ंत साजिशी थ्योरी पर काम करने में जुटे थे: यह आग कौन भड़का रहा था? क्या कोई विदेशी हाथ? रात 9 बजे का यह ड्रामा अब किसी के लिए नया नहीं रहा: टीवी की स्क्रीन बंटी हुई थीं, एंकर गला फाड़-फाड़ कर चीख-चिल्ला रहे थे और साजिश का एक संभावित उम्मीदवार भी मौजूद ही था- पाकिस्तान। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ‘राज्य के विकास को अस्थिर करने की साजिश रचने वाले असामाजिक तत्वों’ को गंभीर चेतावनी भी दे डाली।

अगर आप पहले से नहीं जानते हैं, तो टेलीविजन पर होने वाली बहसों से तो आपको यह सच कभी पता नहीं चलने वाला कि पिछले लगभग दस सालों में, जहां एक तरफ मजदूरी लगभग स्थिर रही है, वहीं किराया दोगुना हो चुका है और महंगाई आसमान पर है। कॉरपोरेट मुनाफा 15 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है, जबकि फैक्ट्री के गेट के बाहर खड़े मजदूर की क्रय क्षमता उसी अनुपात में सबसे निचले स्तर पर है। जो लोग इस बात को समझते हैं, उनके लिए यह ‘मोदीनॉमिक्स’ का एक स्वाभाविक नतीजा है- जिसे ऊपर वालों के लिए बनाया गया है, और जिसकी कीमत चुकाने के लिए नीचे वाले अभिशप्त हैं।

मजदूरी के साथ असल में हुआ क्या?

पिछले दो दशकों में भारत में मजदूरी की कहानी (देखें टेबल: ‘मजदूरी और कॉरपोरेट मुनाफा’ और ‘असली मजदूरी में बढ़ोतरी’) बहुत कुछ बताती है। यूपीए के कार्यकाल (2004-2014) में डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अनौपचारिक क्षेत्र में असल मजदूरी हर साल 5 से 7 प्रतिशत की दर से बढ़ी। आजाद भारत में यह मजदूरी में सबसे तेज और लगातार होने वाली बढ़ोतरी थी। वजह थी- वास्तविक आर्थिक विस्तार, नरेगा के तहत तय न्यूनतम मजदूरी (जिसने अनौपचारिक क्षेत्र में मजदूरी बढ़ाने पर जोर दिया), खेती के उत्पादों के बढ़ते समर्थन मूल्य और आईटी क्षेत्र में प्रतिभा के लिए प्रतिस्पर्धा।

फिर आया साल 2014, और समय मानो थम-सा गया।

बात अपने आप में चौंकाने वाली है कि 2014 के बाद से जहां आईटी क्षेत्र का मुनाफा दस गुना बढ़ा है, शुरुआती स्तर के वेतन जस का तस बने हुए  हैं। कस्टमर केयर में काम करने वाला व्यक्ति 2014 में 15 से 25 हजार रुपये तक कमाता था, अब उससे भी कम कमा रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह क्षेत्र अब छोटे-छोटे, बिना किसी नियम-कानून वाले ‘गिग’ (अस्थायी) कामों में बंट गया है, जहां मजदूरी की कोई न्यूनतम सीमा तय नहीं है। और तो और, फैक्ट्रियों में काम करने वाले अकुशल मजदूरों की मजदूरी में पिछले 12 सालों में महज 3 हजार रुपये की बढ़ोतरी हुई है! इस बीच, नोएडा में एक कमरे का किराया 2014 के 4 से 6 हजार रुपये से बढ़कर अब 8 से 14 हजार रुपये तक पहुंच चुका है। महंगाई ने मजदूर की कमाई को तो पीछे छोड़ दिया, लेकिन मकान मालिक की कमाई पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। यही वह आर्थिक समझौता है जिसे मोदी सरकार ने चुपके से लागू कर दिया है, और यही वजह है कि पिछले हफ्ते नोएडा की सड़कों पर जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन देखने को मिले।

लेबर ब्यूरो और एनएसएसओ के आंकड़ों के आधार पर अर्थशास्त्री ज़्यां द्रेज़ और रीतिका खेड़ा 2014 के बाद से वास्तविक मजदूरी में वृद्धि को लगभग पूरी तरह से ठप पड़ जाने के रूप में दर्ज करते हैं।

वास्तविक वेतन वृद्धि

ये सारे निष्कर्ष सरकारी आंकड़ों, लेबर ब्यूरो की ‘वेज रेट्स इन रूरल इंडिया’  (डब्ल्यूआरआरआई) शृंखला और समय-समय पर होने वाले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षणों से लिए गए हैं। इनसे स्वतः पुष्टि हो जाती है कि पिछले दस वर्षों में, वास्तविक मजदूरी की वार्षिक वृद्धि दर लगभग शून्य रही है। कृषि मजदूरों के लिए तो वास्तविक रूप से गिरावट आई है।

जब शिक्षा और गरीब बनाने लगे 

शिक्षा को हमेशा गरीबी से बाहर निकलने की एक भरोसेमंद सीढ़ी एक जरिया माना गया है। लेकिन आजाद भारत में पहली बार है कि आबादी के एक बढ़ते हिस्से के लिए शिक्षा में निवेश पर मिलने वाला लाभ (रिटर्न) नकारात्मक हो गया है।

कोई भी परिवार जो अपने बच्चे को किसी प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में भेजने के लिए जमीन गिरवी रखता है, रिश्तेदारों से उधार लेता है, या 15 लाख रुपये का एजुकेशन लोन लेता है, वह अब सामाजिक-आर्थिक तरक्की में निवेश नहीं कर रहा है। मान लिया जाए कि ग्रेजुएशन के बाद नौकरी मिल जाएगी, तब भी शुरुआती वेतन 18 से 22 हजार रुपये प्रति महीना होगा, और अगर वे पर्याप्त खुशकिस्मत रहे कि उन्हें कोई पक्की नौकरी मिल गई, तो अगला पूरा दशक उनका लोन चुकाने में ही निकल जाएगा। किसी प्राइवेट यूनिवर्सिटी से सिर्फ बीए की डिग्री लेने में ही 6 लाख रुपये से ज्यादा खर्च हो जाते हैं, और ज्यादातर ग्रेजुएट ‘गिग वर्कर’ (अस्थायी कामगार) या सेमी-स्किल्ड मजदूरों की जमात को थोड़ा और लंबा कर देते हैं।

2020 से 2024 के बीच, बकाया एजुकेशन लोन 65,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.29 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। यह उस आबादी की बेबसी का सबूत है जो अपने बच्चों को शिक्षित करने की मजबूरी और एक ऐसे लेबर मार्केट के बीच फंसी हुई है, जहां उन्हें बदले में कुछ भी नहीं मिलता।

जाति व्यवस्था की ओर वापसी

जब बी.टेक की डिग्री के बावजूद जोमेटो डिलीवरी बाइक चलाने से भी कम कमाई होती है, तो गुणा-गणित  स्वाभाविक ही बदल जाता है।

इसका नतीजा पहले से ज्ञात है। पहली पीढ़ी के जो छात्र आगे बढ़ना चाहते हैं, वे खुद को ऐसे ‘गिग वर्क’ (अस्थायी काम) की ओर जाते हुए पाएंगे, मसलन- डिलीवरी राइडर, मॉल में कस्टमर सर्विस, वेयरहाउस में सामान छांटने वाले, सप्लाई चेन में मजदूरी आदि... और जिन्हें यह काम भी नहीं मिल पाएगा, उनके लिए सबसे पुराना सहारा ही फिर से लौट आएगा: ऐसा काम जो योग्यता या अपनी चाहत से नहीं, बल्कि जाति से तय होता है। जहां बढ़ई का बेटा बढ़ई ही बनता है। बुनकर की बेटी बुनकर ही रह जाती है। दरअसल, उनके लिए अन्य सभी रास्ते बंद हो चुके होते हैं।

यह कोई डराने वाली बात नहीं है। पर सच्चाई यह है कि जाति-आधारित आर्थिक ढांचे की ओर वापसी अब बस होने को है। अगर लोगों को यह लगने लगे कि डिग्री से बेहतर रोजगार नहीं सिर्फ कर्ज का बोझ ही मिलेगा, तो शिक्षा का महत्व पूरी तरह से खत्म ही हो जाएगा।

पिछले हफ्ते नोएडा में जिन मजदूरों ने वाहन जलाए थे, वे पाकिस्तान के एजेंट नहीं थे। वे न तो ‘देश-विरोधी’ थे और न ही ‘अर्बन नक्सल'। वे एक ऐसे नए श्रम कानून के शिकार हैं, जो उन्हें 12 घंटे की शिफ्ट में काम करने पर मजबूर करता है, और इसे ‘अपनी मर्जी’ से किया गया काम बताकर प्रस्तुत करता है!

हरियाणा और उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकारों ने इन विरोध-प्रदर्शनों के जवाब में ‘रैपिड एक्शन फोर्स’ तैनात की, दंगा करने के आरोप में मजदूरों/कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया और कमेटियां बना दीं। अपना संपादकीय विवेक और हिम्मत बहुत पहले ही विज्ञापन और पहुंच के बदले बेच चुके टेलीविजन चैनलों ने इसमें ‘किसी विदेशी हाथ’ के संकेत तलाशने  शुरू कर दिए।

लेकिन असल में तो यह कहानी लिखने वाला हाथ मोदी का ही है। आग की चिंगारी तो एक वेल्डिंग टॉर्च से उठी थी, लेकिन उसे लगातार जलाए रखने के लिए जरूरी ईंधन पिछले दस साल से जमा हो रहा था। और इसका नाम है- मोदीनॉमिक्स।

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