Thrissur Pooram Festival In Kerala: केरल के त्रिशूर शहर में इन दिनों प्रसिद्ध त्रिशूर पूरम की तैयारियों के बीच एक दर्दनाक हादसे ने माहौल को झकझोर दिया. जिले की एक पटाखा फैक्ट्री में हुए भीषण ब्लास्ट ने उत्सव की खुशियों पर मानो ग्रहण लगा दिया. यह हादसा उस समय हुआ, जब पूरे शहर में भव्य मंदिर उत्सव की तैयारियां जोरों पर थीं. इस घटना ने एक बार फिर आतिशबाजी से जुड़े खतरों को सामने ला दिया है. आइए जानते हैं त्रिशूर पूरम उत्सव और उसके मुख्य केंद्र वडक्कुनाथन मंदिर की कहानी जिसका पौराणिक इतिहास 1000 साल पुराना माना जाता है.
पूरमों की जननी क्यों कहलाता है त्रिशूर पूरम?त्रिशूर पूरम को केरल का सबसे भव्य और प्रसिद्ध मंदिर उत्सव माना जाता है. इसे पूरमों की जननी कहा जाता है, क्योंकि इसकी भव्यता और परंपराएं अन्य सभी पूरम उत्सवों के लिए आदर्श मानी जाती हैं. मलयालम महीने मेदम (अप्रैल-मई) में आयोजित होने वाले इस उत्सव की शुरुआत 18वीं शताब्दी में हुई थी. इस दौरान सजे-धजे हाथियों की भव्य शोभायात्रा, पारंपरिक चेंडा मेलम की गूंज, रंग-बिरंगी छतरियों का प्रदर्शन (कुडमट्टम) और रातभर चलने वाली आतिशबाजी इसका मुख्य आकर्षण होती है. यह पूरा आयोजन त्रिशूर के प्रसिद्ध वडक्कुनाथन मंदिर के आसपास स्थित विशाल थेक्किनाडु मैदान में होता है, जहां लाखों लोग इस अद्भुत नजारे को देखने पहुंचते हैं.
वडक्कुनाथन मंदिर की कहानीवडक्कुनाथन मंदिर केरल के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण शिव मंदिरों में से एक है. यहां भगवान शिव की पूजा वडक्कुनाथन यानी उत्तर के स्वामी के रूप में की जाती है. मंदिर की वास्तुकला पारंपरिक केरल शैली की बेहतरीन मिसाल है. लकड़ी की बारीक नक्काशी और प्राचीन भित्ति चित्र इसे और भी खास बनाते हैं. माना जाता है कि यह मंदिर 1000 साल से भी अधिक पुराना है और इसे यूनेस्को की संभावित विश्व धरोहर सूची में भी शामिल किया गया है.
भगवान परशुराम से जुड़ी पौराणिक कथापौराणिक कथाओं और ‘ब्रह्मांड पुराण’ के अनुसार, वडक्कुनाथन मंदिर की स्थापना परशुराम ने की थी. कहा जाता है कि परशुराम ने समुद्र के देवता वरुण से प्रार्थना कर केरल की भूमि का निर्माण कराया था. इसके बाद उन्होंने भगवान शिव को इस भूमि पर निवास करने के लिए आमंत्रित किया. मान्यता है कि भगवान शिव यहां स्वयं प्रकट हुए और एक दिव्य शिवलिंग के रूप में स्थापित हो गए, जो आज भी श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है.
मंदिर की अनोखी विशेषताएंइस मंदिर का सबसे बड़ा आकर्षण यहां स्थित विशाल शिवलिंग है, जो करीब 16 फुट ऊंचा माना जाता है. यह शिवलिंग वर्षों से चढ़ाए जा रहे घी की परतों से ढंका हुआ है. दिलचस्प बात यह है कि यह घी न तो पिघलता है और न ही इससे किसी प्रकार की दुर्गंध आती है, जो इसे एक रहस्यमयी और अद्भुत धार्मिक चमत्कार बनाता है. मंदिर परिसर में भगवान राम, शंकर-नारायण (शिव और विष्णु का संयुक्त रूप) और नंदी की विशाल प्रतिमा भी मौजूद है.
आदि शंकराचार्य से भी जुड़ा है संबंधमाना जाता है कि आदि शंकराचार्य के माता-पिता ने संतान प्राप्ति के लिए इसी मंदिर में प्रार्थना की थी. यह तथ्य इस मंदिर के आध्यात्मिक महत्व को और भी बढ़ा देता है.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.