भारतीय निर्यातकों के लिए एक महत्वपूर्ण विकास सामने आया है। अमेरिका के उच्चतम न्यायालय ने वहां लागू किए गए जवाबी शुल्कों को अमान्य करार दिया है, जिसके परिणामस्वरूप 166 अरब डॉलर की राशि की वापसी की प्रक्रिया शुरू हो गई है। इसमें भारतीय वस्तुओं का हिस्सा लगभग 12 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) होने का अनुमान है। हालांकि, यह ध्यान देने योग्य है कि यह राशि सीधे भारतीय निर्यातकों को नहीं मिलेगी, बल्कि अमेरिकी आयातकों को दी जाएगी। इस संदर्भ में, निर्यातकों के शीर्ष संगठन फियो (FIEO) ने भारतीय व्यापारियों को विशेष रणनीतियों को अपनाने की सलाह दी है.
भारतीय निर्यातक संगठनों के महासंघ (फियो) के अध्यक्ष एस. सी. रल्हन ने मंगलवार को बताया कि इस शुल्क वापसी पर भारतीय निर्यातकों का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, क्योंकि यह राशि केवल अमेरिकी कंपनियों को प्राप्त होगी। उन्होंने कहा, "हालांकि, यदि किसी भारतीय निर्यातक के अपने अमेरिकी खरीदारों के साथ अच्छे संबंध हैं, तो उसे कुछ राशि मिल सकती है।"
चमड़ा क्षेत्र के एक उद्योग अधिकारी ने बताया कि व्यवसाय इस मुद्दे पर अमेरिकी आयातकों के साथ बातचीत करेंगे। एक चमड़ा निर्यातक ने कहा, "हम इस विषय पर अपने खरीदारों से चर्चा कर रहे हैं।" जवाबी शुल्क व्यवस्था 2 अप्रैल 2025 को 10 प्रतिशत से शुरू हुई थी और इसे धीरे-धीरे बढ़ाया गया। भारत के लिए दरें 7 अगस्त 2025 तक 25 प्रतिशत और 28 अगस्त तक 50 प्रतिशत तक पहुंच गईं।
अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने 20 फरवरी को एक निर्णय में ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए शुल्कों के पूरे ढांचे को अमान्य कर दिया, जिससे ये शुल्क कानूनी रूप से शून्य हो गए और इसकी वापसी की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा इन उच्च शुल्कों से प्रभावित हुआ है। शोध संस्थान जीटीआरआई के अनुसार, कुल शुल्क वापसी की राशि लगभग 166 अरब डॉलर है, जिसमें से करीब 12 अरब डॉलर भारतीय वस्तुओं से संबंधित हैं।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने कहा, "भारत से जुड़े अनुमानित 12 अरब अमेरिकी डॉलर में से, वस्त्र एवं परिधान का हिस्सा लगभग चार अरब डॉलर, इंजीनियरिंग सामान का हिस्सा भी लगभग चार अरब डॉलर और रसायन का हिस्सा करीब दो अरब डॉलर हो सकता है, जबकि अन्य क्षेत्रों का हिस्सा कम होगा।" उन्होंने यह भी बताया कि भारतीय निर्यातकों को ये शुल्क स्वतः वापस नहीं मिलेंगे और यह राशि केवल अमेरिकी आयातकों को जाएगी, इसलिए निर्यातकों का इस पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है। श्रीवास्तव ने सुझाव दिया कि निर्यातकों को अपने अनुबंधों पर ध्यान देना चाहिए और 'इनवॉइस' एवं शुल्क आंकड़ों के आधार पर लागतों को समायोजित करने पर विचार करना चाहिए।