92% मानसून रहने का क्या मतलब है? देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा?
et April 22, 2026 10:42 PM
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जिसकी अर्थव्यवस्था में बड़ा हिस्सा कृषि और एमएसएमई से आता है। मानसून की स्थिति देश की अर्थव्यवस्था की सेहत तय करने में बड़ा किरदार निभाती है। इस बार मौसम विभाग की तरफ से कहा जा रहा है कि 92% बारिश होगी। कमजोर मानसून केवल किसानों पर ही नकारात्मक प्रभाव नहीं डालता है बल्कि कृषि से शुरू होता इसका चैन रिएक्शन अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है। चलिए समझते हैं कैसे कम बारिश देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

92% बारिश का अर्थ क्या होता है? कमजोर मानसून या 92% बारिश का अर्थ है कि इस साल 8% कम बारिश होगी। देखने में तो यहां आंकड़ा बहुत छोटा लग रहा है, लेकिन इसका प्रभाव बड़ा होता है। जून महीने से लेकर सितंबर महीने के बीच मानसून की बारिश होती है। यह बारिश गर्मी से राहत के साथ ही कई किसानों के लिए उम्मीद बनकर आती है। इस आधुनिकता के दौर में अभी भी देश की लगभग आधी कृषि व्यवस्था बारिश पर निर्भर करती है। यदि सही समय पर बारिश नहीं आती है या कम बारिश होती है तो इससे किसानों का मुनाफा घट जाता है।

देश का किसान बारिश से परेशान बे मौसम बारिश ने पहले ही किसानों को कर दिया है बेहाल कई राज्यों में अप्रैल महीने में भारी बारिश और ओलावृष्टि हुई, जिसके कारण पहले ही कई किसानों की गेहूं जैसी अन्य फसलें बर्बाद हो चुकी है। इसके बाद अब कम मानसून का अनुमान भी किसानों के लिए बड़ी चिंता का कारण बन सकता है। क्योंकि केवल कम बारिश ही नहीं बल्कि जरूरत से ज्यादा बारिश या बे मौसम बारिश भी खेती को बड़ा नुकसान पहुँचती है। खेती को नुकसान यानी देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान।

क्यों कम बारिश का अनुमान जताया जा रहा है? IMD ने इस बार बारिश के मौसम में 8% कम बारिश का अनुमान जताया है। जिसके पीछे का मुख्य कारण पूर्वी प्रशांत महासागर में एलनीनो की स्थिति है। जिसके कारण बदलाव आ रहा है। तेजी से होते जलवायु परिवर्तन के कारण भी मौसम के पैटर्न बदलते जा रहे हैं। बे मौसम बारिश और बारिश के मौसम में सूखे की स्थिति न केवल किसानों को बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी सही नहीं है। वैसे तो सरकार के द्वारा ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कई प्रयास किए जाते हैं। पहले की तुलना में अभी भारत की स्थिति अच्छी है, लेकिन फिर भी इसका असर देखने को मिल सकता है।

कमजोर मानसून के प्रभाव किसानों की आय में गिरावट कमजोर मानसून से सूखे जैसी स्थिति बन जाती है जिससे फसलों का उत्पादन कम हो जाता है। क्योंकि अभी भी देश में लगभग 50% किसान सिंचाई के लिए बारिश के पानी पर निर्भर करते हैं। किसान पैसे लगाकर फसलों की बुवाई तो करेंगे, लेकिन कम बारिश होने से उत्पादन कम होगा, सिंचाई के महंगे संसाधनों का इस्तेमाल बढ़ने से लागत बढ़ जाएगी।

एफएमसीजी और अन्य सेक्टर्स पर असर यदि किसानों की आय कम होती है तो उनकी खरीदारी भी कम हो जाती है। जिसका सबसे पहला असर एफएमसीजी सेक्टर पर देखने को मिलता है। क्योंकि साबुन तेल बिस्कुट और अन्य चीजों की खरीदारी में कमी आ जाती है। इसके अलावा मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स की खरीदारी भी घट जाती है।

महंगाई में वृद्धि जब उत्पादन कम होता है तो सब्जियों, दालों और अन्य फसलों के दाम बढ़ जाते हैं, जिससे आम जनता भी कई चीजों की खरीदारी कम कर देती है। महंगाई बढ़ जाती है, लोन महंगे हो जाते हैं।

देश की अर्थव्यवस्था पर असर जब महंगाई बढ़ती है चीजों के दाम बढ़ने लग जाते हैं तो इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। सरकार सूखा प्रभावित क्षेत्र के लिए राहत पैकेज जारी करती है, सब्सिडी योजनाएं चलाई जाती है और सरकार को जरूरत पूरा करने के लिए आयात बढ़ाना पड़ता है। जिससे फिसकल डेफिसिट बढ़ता जाता है।

अब आप समझ गए होंगे कि कैसे कमजोर मानसून से न केवल किसान प्रभावित होते हैं बल्कि कृषि से शुरू हुए चैन रिएक्शन का असर देश की अर्थव्यवस्था तक देखने को मिलता है। इस देश का विकास धीमा हो जाता है और कई बार तो मानसून की स्थितियां भी शेयर बाजार प्रभावित करती है जिससे निवेशकों पर भी इसका असर देखने को मिलता है।
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