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इसके बाद जो हुआ, वह किसी फिल्मी सीन से कम नहीं था। काली ने पूरी ताकत के साथ सांप पर हमला कर दिया और उसे रोकने की कोशिश करने लगी। काफी देर तक दोनों के बीच संघर्ष चलता रहा। आखिरकार काली ने उस जहरीले सांप को मार गिराया, लेकिन इस बहादुरी की कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। लड़ाई के दौरान सांप ने उसे कई बार काटा, जिनमें एक खतरनाक काट उसके मुंह पर भी था। जहर तेजी से उसके शरीर में फैल गया और कुछ ही देर में काली ने उसी जमीन पर दम तोड़ दिया, जिसे बचाने के लिए वह लड़ी थी।
जैसे ही गांव वालों को इस घटना का पता चला, पूरे गांव में शोक की लहर दौड़ गई। जो काली कभी एक ‘आवारा’ कुतिया मानी जाती थी, उसी को अब लोग अपने बच्चों की रक्षक और हीरो के रूप में देख रहे थे। गांव वालों ने उसके बलिदान को सम्मान देने के लिए जो किया, उसने हर किसी का दिल छू लिया। काली के पार्थिव शरीर को फूलों से सजाया गया, सफेद कपड़े में लपेटा गया और पूरे गांव में एक अंतिम यात्रा निकाली गई ठीक वैसे ही जैसे किसी इंसान को विदाई दी जाती है। पूरे सम्मान के साथ उसका अंतिम संस्कार किया गया।
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काली की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि इंसानियत सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं होती। कभी-कभी वो सबसे खूबसूरत रूप में उन बेजुबानों में दिखती है, जिन्हें हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। एक ‘आवारा’ कुतिया ने अपनी जान देकर 30 बच्चों को सुरक्षित रखा और यह सिखा गई कि सच्चा प्यार और वफादारी किसी पहचान के मोहताज नहीं होते।
आज भले ही काली इस दुनिया में नहीं है, लेकिन धीराकुला गांव के लोगों के दिलों में वह हमेशा जिंदा रहेगी एक ऐसी रक्षक बनकर, जिसने बिना कुछ सोचे अपनी जान कुर्बान कर दी। सच में, हीरो सिर्फ इंसान नहीं होते… कभी-कभी वो चार पैरों पर भी चलते हैं।