मुंबई, 29 अप्रैल। भारतीय सिनेमा आज विश्व के सबसे बड़े फिल्म उद्योगों में से एक माना जाता है। हर साल हजारों फिल्में बनती हैं और करोड़ों दर्शक इन्हें देखते हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब भारत में फिल्में बनाना एक सपना था। इस सपने को साकार करने वाले व्यक्ति का नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें दादासाहेब फाल्के के नाम से जाना जाता है।
फाल्के का फिल्मों के प्रति जुनून इतना गहरा था कि उन्होंने फिल्म निर्माण की तकनीक सीखने के लिए अपनी बीमा पॉलिसी गिरवी रख दी। उनकी पत्नी, सरस्वती फाल्के ने भी अपने गहने बेचकर उनका समर्थन किया। इसी संघर्ष और बलिदान से भारतीय सिनेमा की नींव रखी गई।
दादासाहेब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र में हुआ। उनके पिता संस्कृत के विद्वान थे और फाल्के को बचपन से ही कला में रुचि थी। उन्होंने मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा प्राप्त की और बाद में फोटोग्राफर के रूप में काम किया। हालांकि, उनके जीवन में कई कठिनाइयाँ आईं, जिसमें कारोबार में नुकसान भी शामिल था।
उनकी जिंदगी में बदलाव तब आया जब उन्होंने एक विदेशी फिल्म 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखी। इस फिल्म ने उन्हें प्रेरित किया कि भारत में भी 'रामायण' और 'महाभारत' जैसी कहानियों पर फिल्में बनाई जा सकती हैं। इसी सोच के साथ उन्होंने फिल्म निर्माण की दुनिया में कदम रखा।
उस समय भारत में फिल्म बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। न तो किसी को कैमरे की जानकारी थी और न ही फिल्म निर्माण की तकनीक का अनुभव। फाल्के ने खुद यह कला सीखने का निर्णय लिया और इसके लिए उन्होंने अपनी बीमा पॉलिसी गिरवी रखकर लंदन गए। वहां से लौटकर उन्होंने अपनी पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने की योजना बनाई।
हालांकि, पैसों की कमी एक बड़ी बाधा थी। इस कठिन समय में उनकी पत्नी सरस्वती ने उनका पूरा समर्थन किया। उन्होंने अपने गहने गिरवी रख दिए ताकि फिल्म का निर्माण हो सके। सरस्वती ने फिल्म की टीम के लिए खाना बनाने से लेकर कलाकारों के कपड़े संभालने तक हर काम में मदद की।
1913 में 'राजा हरिश्चंद्र' रिलीज हुई, जो भारत की पहली फीचर फिल्म बनी। इसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया। इसके बाद, दादासाहेब फाल्के ने कई सफल फिल्में बनाई, जैसे 'मोहिनी भस्मासुर', 'सत्यवान सावित्री', और 'लंका दहन'। अपने करियर में उन्होंने 95 फीचर फिल्में और 26 शॉर्ट फिल्में बनाई।
हालांकि, समय के साथ सिनेमा में बदलाव आया और मूक फिल्मों की जगह बोलती फिल्मों ने ले ली। दादासाहेब फाल्के इस बदलाव के साथ आगे नहीं बढ़ पाए। उनकी अंतिम फिल्म 'गंगावतरण' थी, जो 1937 में रिलीज हुई। इसके बाद उन्होंने फिल्म उद्योग से दूरी बना ली।
16 फरवरी 1944 को दादासाहेब फाल्के का निधन हो गया। लेकिन भारतीय सिनेमा में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा। उनके सम्मान में भारत सरकार ने 1969 में 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' की स्थापना की, जिसे भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान माना जाता है।