'थलपति' के 'जननायक' बनने की कहानी, तमिलनाडु की राजनीति में जोसेफ विजय चंद्रशेखर ने कैसे किया चमत्कार
Webdunia Hindi May 05, 2026 07:43 PM


Vijay Thalapathy Political Stance: तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से सिनेमा और जननेतृत्व के अद्वितीय मेल की साक्षी रही है। इसी परंपरा को एक नया आयाम देते हुए दक्षिण भारतीय सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता Joseph Vijay Chandrasekhar (विजय थलपति) ने राजनीति में औपचारिक प्रवेश किया है। उनकी पार्टी Tamilaga Vetri Kazhagam (टीवीके) ने हालिया विधानसभा चुनावों में उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए स्थापित द्रविड़ दलों—Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) को कड़ी चुनौती दी है।

हिंदी पट्टी सहित पूरे देश के लिए यह घटनाक्रम उत्सुकता का विषय है—एक ऐसा अभिनेता, जो पर्दे पर एक्शन और डायलॉग्स के लिए मशहूर था, अब जनता की सेवा के लिए राजनीति के मैदान में उतरा और ‘जननायक’ बनने की राह पर है। लेकिन यह सफर संयोग नहीं, बल्कि त्याग, संकल्प और गहरी जनस्वीकृति का परिणाम है।

शुरुआती जीवन और सिनेमा : जनाधार की बुनियाद

22 जून 1974 को चेन्नई में जन्मे विजय एक फिल्मी परिवार से आते हैं। उनके पिता SA Chandrasekhar एक प्रतिष्ठित निर्देशक रहे हैं, जबकि माता Shoba Chandrasekhar जानी-मानी गायिका हैं।

वे मात्र कुछ वर्ष के थे जब पिता की फिल्म ‘वेट्री’ में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में कैमरे के सामने आए। कॉलेज में विजुअल मीडिया पढ़ते हुए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और अभिनय को अपना करियर बनाया। 1992 में मां शोभा द्वारा लिखी और पिता द्वारा निर्देशित फिल्म ‘नालैया थीरपू’ से बतौर लीड एक्टर डेब्यू किया। फिल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हुई, लेकिन एक नया चेहरा उभरकर सामने आया।

शुरुआती संघर्ष के बाद 1996 की ‘पूवे उनक्कागा’ और फिर 2000 के दशक की ब्लॉकबस्टर फिल्मों जैसे ‘गिल्ली’ ने उन्हें ‘मास हीरो’ बना दिया। बच्चों से लेकर युवाओं तक, सब उनके डांस, स्टाइल और एक्शन के दीवाने हो गए। ‘मर्सल’, ‘सरकार’ और ‘लियो’ जैसी फिल्मों ने न केवल बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया, बल्कि इनमें विजय ने सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को भी बेबाकी से उठाया, जो बाद में उनकी राजनीतिक विचारधारा की झलक बन गया। उन्हें ‘थलपति’ (सेनापति) का खिताब मिला, जो अब जनता के बीच उनकी छवि का प्रतीक बन चुका है।

स्वतंत्र राजनीति की नींव

विजय का राजनीति में प्रवेश पारंपरिक ‘फिल्म से राजनीति’ मॉडल से कुछ अलग दिखाई देता है। राजनीति में विजय का सफर आसान नहीं था। 2020-21 में पिता एसए चंद्रशेखर ने उनके नाम पर ‘ऑल इंडिया थलपति विजय मक्कल इयक्कम’ नाम की पार्टी रजिस्टर करा दी। विजय ने इसे सख्ती से खारिज किया और बिना अनुमति के नाम के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। उन्होंने अदालत का रुख किया और सार्वजनिक बयान जारी कर कहा कि इस पार्टी से उनका कोई संबंध नहीं है।

यह टकराव दर्शाता है कि विजय किसी विरासत या पारिवारिक दबाव में राजनीति में नहीं आए। वे अपनी शर्तों पर उतरे—साफ-सुथरी छवि, बिना गठबंधन और भ्रष्टाचार-मुक्त शासन के वादे के साथ। यह रुख उनके राजनीतिक व्यक्तित्व की एक प्रमुख विशेषता बनकर उभरा है— जहां व्यक्तिगत लोकप्रियता के साथ वैचारिक स्वतंत्रता को भी महत्व दिया गया है।

टीवीके का गठन और सिनेमा को अलविदा

फरवरी 2024 में विजय ने आधिकारिक रूप से Tamilaga Vetri Kazhagam की स्थापना की। यह निर्णय उस समय आया जब वे अपने फिल्मी करियर के शिखर पर थे। उन्होंने यह घोषणा भी की कि उनकी आगामी फिल्म थलपति 69 अंतिम फिल्म होगी और इसके बाद वे पूरी तरह राजनीति को समर्पित रहेंगे। विक्रवंडी में आयोजित उनकी पहली बड़ी रैली में उमड़ी भीड़ ने संकेत दिया कि उनका सिनेमा-आधारित जनाधार राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित हो सकता है।

विचारधारा : द्रविड़ परंपरा और समकालीन संतुलन

विजय की राजनीतिक विचारधारा द्रविड़ आंदोलन की मूल भावना से प्रेरित दिखाई देती है, लेकिन उसमें एक संतुलित दृष्टिकोण भी शामिल है। उन्होंने Periyar EV Ramasamy के सामाजिक न्याय और समानता के सिद्धांतों का उल्लेख किया है, जबकि नास्तिकता के कठोर पक्ष से दूरी बनाई है।

विजय ने अपनी पहली रैली में ही स्पष्ट किया कि टीवीके द्रविड़ राष्ट्रवाद और तमिल गौरव को अलग नहीं करेगी। दोनों को राज्य की 'दो आंखें' बताया। पार्टी सामाजिक न्याय, महिला सशक्तिकरण, धर्मनिरपेक्षता और पेरियार के विचारों से प्रेरित है, लेकिन पेरियार की नास्तिकता से पूर्ण सहमत नहीं। भाषा नीति पर दो-भाषा (तमिल-अंग्रेजी) का समर्थन, जातिगत जनगणना और सामाजिक बराबरी पर जोर दिया। उन्होंने परिवारवाद का विरोध कर साफ छवि पेश की, जो युवा मतदाताओं को खास तौर पर प्रभावित किया। यह रुख उन्हें पारंपरिक द्रविड़ राजनीति के भीतर रहते हुए एक वैकल्पिक सुधारवादी नेता के रूप में प्रस्तुत करता है।

2026 का चुनाव : सत्ता समीकरणों में बदलाव

2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने तमिलनाडु की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया है। टीवीके का प्रदर्शन केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि उसने पारंपरिक दलों के वोट बैंक में भी उल्लेखनीय सेंध लगाई है। यह जीत एंटी-इनकंबेंसी, युवा आकांक्षा और विजय की जमीनी पकड़ का नतीजा है। रैलियों में उमड़ने वाली भीड़ पहले से संकेत दे रही थी। अब सत्ता गठन की चर्चाएं हैं और विजय को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जा रहा है

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, इसके पीछे कई कारक रहे:

  • व्यक्तिगत करिश्मा और जनसंपर्क
  • स्थापित दलों के प्रति असंतोष
  • युवा मतदाताओं की भागीदारी

हालांकि, यह देखना अभी बाकी है कि यह समर्थन दीर्घकालिक राजनीतिक स्थिरता में किस हद तक परिवर्तित हो पाता है।

प्रशंसक से हमसफर तक और अब अलगाव

विजय की प्रेम कहानी भी फिल्मी है। लंदन में रहने वाली श्रीलंकन मूल की संगीता सोरलिंगम उनकी कट्टर प्रशंसक थीं। वे भारत आईं, मुलाकातें हुईं और 25 अगस्त 1999 को दोनों ने शादी कर ली। संगीता न केवल पत्नी बनीं, बल्कि उनकी सबसे करीबी सलाहकार भी रहीं।

हालांकि, इस सुखी जोड़ी की कहानी अब दर्द भरे मोड़ पर पहुंच गई है। फरवरी 2026 में संगीता सोरलिंगम ने चेंगलपट्टू फैमिली वेलफेयर कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर दी। उन्होंने 27 वर्षों के वैवाहिक जीवन के बाद अलगाव की मांग की है। याचिका में कथित infidelity (वैवाहिक संबंधों के बाहर संबंध), मानसिक क्रूरता और विश्वासघात का आरोप लगाया गया है। संगीता ने अप्रैल 2021 से इस संबंध की जानकारी होने का जिक्र किया है और अंतरिम निवास व वित्तीय सहायता की भी मांग की है।

कोर्ट ने अप्रैल 2026 में सुनवाई की और मामले को 15 जून 2026 तक स्थगित कर दिया है। दोनों पक्षों को व्यक्तिगत रूप से या वीडियो कॉल के जरिए पेश होने के निर्देश दिए गए हैं। इस मामले ने मीडिया में खासी चर्चा बटोरी है और कुछ रिपोर्ट्स में अभिनेत्री तृषा कृष्णन के नाम का भी जिक्र आया है, हालांकि ये अफवाहें हैं और विजय पक्ष ने इन्हें खारिज किया है। यह निजी संकट विजय के राजनीतिक सफर के साथ-साथ सामने आया है, जिसने उनके समर्थकों में मिश्रित प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं।

क्या यह स्थायी परिवर्तन है?

Joseph Vijay Chandrasekhar का उदय तमिलनाडु की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत देता है। यह न केवल सिनेमा और राजनीति के पारंपरिक संबंधों को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि मतदाता अब नए विकल्पों के प्रति खुले हैं। फिर भी, असली परीक्षा अब शुरू होती है— क्या यह जनसमर्थन प्रभावी शासन में बदल पाएगा या यह भी तमिलनाडु की राजनीति में करिश्माई नेतृत्व की एक और क्षणिक लहर बनकर रह जाएगा?

फिलहाल, इतना स्पष्ट है कि राज्य की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है—और इस परिवर्तन के केंद्र में हैं विजय। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का नया अध्याय शुरू हो चुका है। क्या विजय इस चुनौती को पूरा कर पाएंगे, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन एक बात तय है: ‘थलपति’ अब ‘जननायक’ बन चुके हैं।

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