Uttarakhand News: हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के लगातार पीछे खिसकने यानी ग्लेशियर रिसेशन ने उत्तराखंड में नई चिंता पैदा कर दी है. विशेषज्ञों के अनुसार, नॉर्थ ईस्ट से लेकर नॉर्थ वेस्ट हिमालय तक कई ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहे हैं. इसका सबसे बड़ा असर जल संसाधनों पर पड़ रहा है, क्योंकि भविष्य में ताजे पानी की उपलब्धता कम हो सकती है. वहीं ग्लेशियरों के पीछे हटने से उनके सामने बनने वाली झीलों, जिन्हें प्रोग्लेशियर और पैराग्लेशियर लेक कहा जाता है, का आकार और जल मात्रा भी लगातार बढ़ रही है, जो आने वाले समय में बड़े प्राकृतिक खतरे का कारण बन सकती है.
वाडिया हिमालयी भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक मनीष मेहता के मुताबिक, उत्तराखंड में ऐसी झीलों को लेकर खतरे का आकलन पहले भी किया जा चुका है. केंद्रीय जल आयोग द्वारा तैयार की गई इनवेंट्री में राज्य की 13 झीलों को संवेदनशील श्रेणी में रखा गया था, जिनमें से 6 झीलों को अतिसंवेदनशील माना गया. इनमें विलंगना, अलकनंदा और गौरीगंगा बेसिन की झीलें शामिल हैं. खासकर कुमाऊं क्षेत्र की कई झीलों पर विशेष निगरानी की जरूरत बताई गई है.
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25 झीले संवेदनशील श्रेणी मेंइसी के साथ वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक अन्य अध्ययन में उत्तराखंड की करीब 426 ग्लेशियर झीलों का विश्लेषण किया गया, जिनका क्षेत्रफल एक हजार वर्ग मीटर से अधिक था. इस अध्ययन में 25 झीलों को संवेदनशील और 6 को अतिसंवेदनशील पाया गया. इन झीलों के क्षेत्रफल और जल मात्रा में एक दशक के दौरान तेजी से वृद्धि दर्ज की गई, जिसके आधार पर इन्हें खतरे की श्रेणी में रखा गया, क्योंकि इनमें से कुछ झीलें ऐसी भी हैं, जो अगर टूटी तो निचले इलाकों में जानमाल के नुकसान की संभावना है.
ये टीमें मिलकर रोकेंगी आपदा!इसीलिए अब इन संवेदनशील झीलों की निगरानी के लिए उत्तराखंड डिजास्टर मैनेजमेंट अथॉरिटी, स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट और एनडीएमए के साथ मिलकर आधुनिक उपकरण स्थापित करने की तैयारी की जा रही है. इन क्षेत्रों में ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन, ऑटोमैटिक वॉटर लेवल रिकॉर्डर, कैमरे और भूकंपीय गतिविधियों से जुड़े उपकरण लगाए जाएंगे. ये उपकरण वहां के मौसम के पैटर्न, बारिश और बर्फबारी की तीव्रता के साथ-साथ झीलों के जलस्तर पर लगातार नजर रखेंगे.
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि भारी बारिश या किसी अन्य वजह से झीलों का जलस्तर अचानक बढ़ता है तो यह संभावित खतरे का संकेत हो सकता है. ऐसे में उपकरणों से मिलने वाली जानकारी सीधे कंट्रोल सेंटर तक पहुंचेगी, जिससे निचले इलाकों यानी डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को समय रहते अलर्ट कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकेगा. माना जा रहा है कि इस पहल से प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान और जनहानि को काफी हद तक कम किया जा सकेगा.
समय से अलर्ट मिलने में भी संकटहालांकि, ऊंचाई वाले दुर्गम हिमालयी इलाकों में अक्सर नेटवर्क और इंटरनेट सेवाओं की कमी बड़ी चुनौती बनी रहती है. ऐसे में इन उपकरणों से जुटाई गई जानकारी समय पर वेदर स्टेशन या कंट्रोल सेंटर तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंच पाएगी, यह अपने आप में बड़ा सवाल है. यह व्यवस्था जमीन पर कितनी कारगर साबित होगी, इसका सही आकलन आने वाला वक्त ही बताएगा.