जुलाई का महीना शुरू हो चुका है. मौसम विज्ञानियों ने इस महीने में बहुत कम बारिश का अलर्ट जारी किया है. लगभग पूरा जून महीना मानसून के इंतजार में गुजर गया. ऐसे में सूखे की आशंका सताने लगी है. अगर बारिश नहीं हुई तो केवल फसलों का उत्पादन ही नहीं, बहुत कुछ प्रभावित होगा. मंहगाई भी तेजी से बढ़ेगी. अनाज का आयात करना पड़ सकता है. प्रकृति किसी न किसी रूप में अपना रूप दुनिया भर को दिखा रही है. ठंडे कहे जाने वाले यूरोप के देश तप रहे हैं. बारिश में भीग जाने वाला पूरा भारत जून महीने में सूखे में गुजर गया.
भारत में मानसून हर साल लगभग जून महीने में आ जाता है. कई बार तो मई के अंत में ही दस्तक दे देता है. अरब सागर और बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर हवा भारत की ओर आती है. यह हवा गरम भूमि से ठंडी समुद्री हवा की ओर बहती है. इसी प्रक्रिया से बारिश होती है. मानसूनी हवाओं का वेग और रास्ता तय करता है कि देश में कहां कितनी कितनी बारिश होगी.
इस साल जून सूखा क्यों रहा?कई कारण मिलकर जून को सूखा बना रहे हैं. सबसे बड़ा कारण समुद्र के तापमान में बदलाव है. अगर समुद्र सतह का तापमान सामान्य से ऊपर या नीचे चलता है तो मानसून प्रभावित होता है. दूसरा कारण वायु वेग की कमजोरी है. मानसूनी हवाओं में ताकत नहीं रही. यह बारिश लाने वाले बादलों को जन्म नहीं दे पाई. जेट स्ट्रीम्स और उच्च दबाव का प्रभाव भी एक बड़ा कारण है. ऊपरी वायुमंडल में बदलाव से मौसम के पैटर्न बदल जाते हैं. इन सब के साथ स्थानीय परिस्थितियां, जैसे भूमि की नमी और तापमान, भी कम बारिश में योगदान देती हैं.
इस साल जून में पूरे देश में 99.5 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य दशा में 165 मिमी बारिश होती रही है. बीते 125 साल में इस साल पांचवां सबसे सूखा जून रहा है. इससे भयावहता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है.
बीते 125 साल में इस साल पांचवां सबसे सूखा जून रहा है. फोटो: PTI
जुलाई में कम बारिश का अलर्ट क्यों दिया जा रहा है?मौसम वैज्ञानिक जुलाई के लिए कम बारिश की चेतावनी दे रहे हैं. आकलन है कि जुलाई में बारिश का दीर्घकालिक औसत काफी कम रहने वाला है. इसके पीछे समुद्र में बने तापमान असंतुलन, वैश्विक पैटर्न एल नीनो आदि का असर हो सकता है. मानसून की दक्षिणी-पूर्वी दिशा कमजोर दिख रही है. ये सब मिलकर अगले महीनों में बारिश कम होने का संकेत दे रहे हैं. जुलाई का महीना धान, मक्का, कपास, सोयाबीन, अरहर समेत कई फसलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. क्योंकि इन्हें पानी ज्यादा चाहिए होता और बारिश से यह जरूरत पूरी होती है. भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का कहना है कि अगले कुछ दिनों में देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश हो सकती है. जहां बारिश हो जाएगी, वहां तो ठीक लेकिन जहां नहीं होगी, वहाँ की फसलें प्यासी रह जाएंगी.
मौसम विभाग का कहना है, जुलाई में कम बारिश होगी. फोटो: PTI
अल-नीनो और इंडियन ओशियन डिपोल क्या करते हैं?अल-नीनो के सक्रिय होने की चेतावनी पहले से ही विश्व मौसम संगठन और अन्य एजेंसियों ने जारी कर रखा है. यह प्रशांत महासागर में तापमान बढ़ने की घटना है. इसका असर पूरे विश्व के मौसम पर पड़ता रहा है. अल-नीनो के सक्रिय होने का मतलब है कि अतिशय बारिश, सूखा. इसके आने का प्रभाव बड़े स्तर पर पहले भी देखा गया है. आईओडी भारतीय महासागर का प्रभाव है. सकारात्मक आईओडी बंगाल की खाड़ी में ठंडा पानी और अरब सागर में गर्म पानी बनाता है. यह भी मानसून को प्रभावित कर सकता है. दोनों घटनाएं समेकित रूप से बारिश में कमी ला सकती हैं.
विश्व मौसम संगठन ने पहले ही अल-नीनो के सक्रिय होने की चेतावनी दे रखी है. फोटो: PTI
मानसून क्यों बिगड़ा?कम बारिश का सीधा असर फसल पर होगा. खरीफ फसलों में बुवाई और बढ़वार प्रभावित हो सकती है. छोटे किसान सबसे अधिक प्रभावित होंगे. पानी की कमी से पेयजल और सिंचाई भी प्रभावित होंगे. नदियों और झीलों का जलस्तर घट सकता है. इससे शहरों और गाँवों, दोनों को समस्या होगी.

सरकारें अलर्ट जारी कर सकती हैं. जल भंडार और बांधों का प्रबंधन कर सकते हैं. सार्वजनिक जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं. फसल बीमा और राहत पैकेजों की व्यवस्था पहले से ही कर सकते हैं. सिंचाई परियोजनाओं को प्राथमिकता देना ऐसे कठिन समय में श्रेयस्कर होगा. छोटे किसानों को तकनीकी सहायता और बीज उपलब्ध कराने पर विचार करना होगा.
मानसून की कमजोरी के कई कारण होते हैं. इनमें महासागरीय तापमान, वैश्विक पैटर्न, वायुमंडलीय ब्लॉक, और जलवायु परिवर्तन शामिल हैं. जून का सूखा और जुलाई में कम बारिश का अलर्ट इन कारणों का नतीजा हो सकता है. इनके प्रभाव गंभीर हो सकते हैं. पर तैयारी से नुकसान कम किया जा सकता है. सरल जल बचत और कृषि उपाय तुरंत उपयोगी होंगे.
यह भी पढ़ें: ब्रिज ढहा, ट्रेनें बंद, 45 हजार बेघर…असम हर साल क्यों डूब जाता है?