ईरान के दिवंगत सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार का वक्त आखिरकार आ गया है. खामेनेई की मौत को चार महीने से ज्यादा का वक्त हो गया और अब तेहरान में इसी हफ्ते उनके अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है. ईरान अपने सबसे बड़े नेता को पूरी शान के साथ विदाई दे रहा है. भारत समेत दुनिया के कई देशों के नेता खामेनेई की अंतिम यात्रा का हिस्सा बनने के लिए पहुंच रहे हैं. इतना ही नहीं, खामेनेई का शव इराक भी ले जाया जाएगा. अपने जीते-जी तो खामेनेई बीते 69 साल से यहां नहीं जा पाए थे, अब कफन में लिपटा उनका पार्थिव शरीर यहां ले जाया जाएगा. 9 जुलाई को ईरान के मशहद में दफनाने से ठीक एक दिन पहले खामेनेई का पार्थिव शरीर इराक के नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा.
खामेनेई के अंतिम संस्कार समारोह के प्रवक्ता ने बताया कि शहीद नेता को 69 साल बाद एक बार फिर इराक के पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा का सम्मान मिलेगा. उन्होंने बताया कि खामेनेई की कर्बला और नजफ की आखिरी यात्रा 1957 में हुई थी. हालांकि, 1968 में उनका इराक जाने का प्लान बना था, लेकिन देश छोड़ने पर रोक के कारण वो नहीं जा पाए थे. 8 जुलाई को अली खामेनेई के पार्थिव शरीर को इमाम अली, इमाम हुसैन और अब्बास इब्न अली के पवित्र स्थलों पर ले जाया जाएगा.
क्यों अहम है इराक?इराक और ईरान की सीमाएं तो आपस में जु़ड़ती ही हैं, दोनों देशों के लोगों का भी एक-दूसरे से धार्मिक तौर पर गहरा जुड़ाव है. खासकर, शिया मुसलमानों के लिए ये दोनों देश काफी अहम हैं. ईरान में पूरी तरह शिया मुसलमानों की सत्ता है. यहां की आबादी में 90 फीसदी से ज्यादा शिया मुसलमान हैं. इराक में भी 50 फीसदी से ज्यादा शिया मुसलमान हैं. हालांकि, यहां की सत्ता में शियाओं का प्रतिनिधित्व कमतर रहा है. इराक के दो शहर ऐसे हैं जहां सालभर दुनियाभर के शिया मुसलमानों का आना-जाना रहता है. ये शहर हैं नजफ और कर्बला.
नजफ और कर्बला इतना अहम क्यों?नजफ एक धार्मिक नगरी है. इराक की राजधान बगदाद से ये करीब 150 किमी दूर है. इस शहर में इस्लाम के आखिरी नबी पैगंबर मोहम्मद के दामाद इमाम अली की कब्र है. इमाम अली को दुनियाभर के सभी मुसलमान मानते हैं लेकिन शिया मुसलमानों का उनके प्रति लगाव प्रैक्टिकल तौर पर कुछ ज्यादा देखने को मिलता है. अली को शिया मुसलमान पहले इमाम के रूप में तवज्जो देते हैं. नजफ में इमाम अली की मस्जिद भी है. भारत समेत अन्य देशों से सालभर यहां तीर्थयात्री जाते हैं.
नजफ की तरह ही कर्बला भी इस्लामिक इतिहास के नजरिए से एक बेहद अहम जगह है. पैगंबर मोहम्मद के बेटे और इमाम अली के नवासे इमाम हुसैन की कब्र कर्बला में ही है. यहीं उन्हें शहीद किया गया था. उनकी याद में ही हर साल मुहर्रम मनाया जाता है. ये बगदाद से करीब 90 किमी दूर है. कर्बला की जंग इस्लामिक दौर की सबसे बड़ी जंगों में एक है. यजीद की फौज ने यहां इमाम हुसैन समेत उनके सौतेले भाई अब्बास को भी शहीद किया था. अब्बास की मस्जिद भी कर्बला में है.
यानी इराक के ये दो शहर वो हैं जहां शिया मुसलमानों की आस्था की जड़ें बसती हैं. खामेनेई की मौत को यूं तो शहादत माना जा रहा है लेकिन इन पवित्र स्थलों पर जब उनका शव पहुंचेगा तो निश्चित ही शिया समुदाय के लिए खामेनेई के कफन को देखना उनके अकीदे को मजबूती देगा. ये मंजर इस्लामिक हिस्ट्री के पन्नों में दर्ज हो जाएगा. कुछ लोग इसके राजनीतिक निहितार्थ भी निकाल रहे हैं. निश्चित ही, युद्ध में बहुत कुछ गंवा चुके ईरान के लिए खामेनेई की शव यात्रा उसके अपने समर्थक लोगों के बीच एक बड़ा संदेश देगी.