राजेंद्र कुमार: हिंदी सिनेमा के अमर सितारे की यादें
Udaipur Kiran Hindi July 12, 2026 08:42 AM

मुंबई, जुलाई 12: राजेंद्र कुमार, जिन्हें हिंदी फिल्म उद्योग में ‘जुबली कुमार’ के नाम से जाना जाता है, ने अपने अभिनय, व्यक्तित्व और फिल्मों के माध्यम से दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी. 12 जुलाई, 1999 को उनका निधन हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम युग में एक शानदार अध्याय का अंत था.

राजेंद्र कुमार का जन्म 20 जुलाई, 1927 को सियालकोट (अब पाकिस्तान में) हुआ. विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया. मुंबई पहुंचने पर, उन्होंने फिल्म उद्योग में किस्‍मत आजमाने का निर्णय लिया और शुरुआत में निर्देशक एच.एस. रावल के सहायक के रूप में काम किया, जहाँ उन्होंने फिल्म निर्माण की बारीकियाँ सीखी.

कुमार ने 1950 के दशक में अपने अभिनय करियर की शुरुआत की और धीरे-धीरे खुद को स्थापित किया. फिल्म ‘मदर इंडिया’ (1957) में उनके प्रदर्शन ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई, जिसके बाद उन्होंने कई सफल फिल्मों में काम किया और हिंदी सिनेमा के शीर्ष अभिनेताओं में अपनी जगह बनाई.

1960 का दशक राजेंद्र कुमार के करियर का स्वर्णिम काल माना जाता है, जब उनकी कई फिल्मों ने लगातार सफलता प्राप्त की और लंबे समय तक सिनेमाघरों में चलीं. इस सफलता ने उन्हें ‘जुबली कुमार’ का खिताब दिलाया. उनकी प्रसिद्ध फिल्मों में ‘मेरे महबूब’, ‘संगम’, ‘दिल एक मंदिर’, ‘अर्जू’, ‘सूरज’, ‘आई मिलन की बेला’ और ‘धूल का फूल’ शामिल हैं.

कुमार को उनके भावनात्मक भूमिकाओं के लिए जाना जाता था, जिसमें उन्होंने प्रेम, बलिदान, पारिवारिक जिम्मेदारियों और मानव भावनाओं से जुड़े पात्रों को प्रभावी ढंग से निभाया. उनकी ऑन-स्क्रीन उपस्थिति में एक स्वाभाविक आकर्षण था, जिससे दर्शक उनके पात्रों से जुड़ जाते थे.

अभिनय के अलावा, कुमार ने फिल्म निर्माण में भी कदम रखा और अपने बेटे कुमार गौरव के करियर को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्हें फिल्म उद्योग में उनके सौम्य स्वभाव और मजबूत संबंधों के लिए भी जाना जाता था.

Indian सिनेमा में उनके योगदान के लिए, भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया. चार दशकों से अधिक के करियर में, उन्होंने 80 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया, और हिंदी सिनेमा में कई यादगार पात्रों को पीछे छोड़ा.

राजेंद्र कुमार का निधन 12 जुलाई, 1999 को मुंबई में हुआ. उनकी विरासत केवल उनकी सफल फिल्मों से नहीं, बल्कि दर्शकों के साथ बनाए गए भावनात्मक संबंधों से भी परिभाषित होती है. आज भी, उनकी फिल्में हिंदी सिनेमा के क्लासिक युग की यादों को ताजा करती हैं, और उनका रोमांटिक छवि उन्हें सदाबहार सितारों में बनाए रखती है.

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