चिप से लेकर खाद तक…100+ विदेशी सामानों का पत्ता साफ करेगी मोदी सरकार! आयात रोकने के लिए बंपर इंसेंटिव देने की तैयारी
TV9 Bharatvarsh July 16, 2026 01:43 PM

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सप्लाई चेन को सुरक्षित रखने और करेंसी पर दबाव कम करने के लिए इकोनॉमी में जरूरी इंपोर्ट को कम करने के कदम उठा रहे हैं. ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों के अनुसार, मोदी के ऑफिस ने प्रमुख मंत्रालयों को उन सामानों की कैटेगरी की पहचान करने का निर्देश दिया है, जिनके लिए इंपोर्ट पर ज्यादा निर्भरता है और जिन्हें स्थानीय रूप से बने उत्पादों से बदला जा सकता है. उन्होंने कहा कि सरकार घरेलू प्रोडक्शन को बढ़ावा देने के लिए सब्सिडी और दूसरे इंसेंटिव्स देने पर विचार कर रही है.

अधिकारियों ने बताया कि कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री 100 से अधिक प्रोडक्ट्स की लिस्ट तैयार कर रहा है, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक्स, रसायन, प्रमुख दवाएं, खाद, सेमीकंडक्टर, ऑटोमोबाइल और मशीनरी शामिल हैं, जिनका प्रोडक्शन बढ़ाया जा सकता है. अधिकारियों ने कहा कि कई मंत्रालयों के बीच चर्चा चल रही है और अभी तक कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है.

चिप और स्मार्टफोन प्रोडक्शन पर बड़े ऐलान

घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने का यह नया कदम बुधवार को उठाया गया, जब मोदी की कैबिनेट ने चिप और स्मार्टफोन प्रोडक्शन के लिए वित्तीय सहायता को 1.9 ट्रिलियन रुपए (19.7 बिलियन डॉलर) और बढ़ाने की योजना को मंजूरी दी. इसने होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से जुड़ी कमी के बाद लोकल फर्टीलाइजर प्रोडक्शन बढ़ाने की पॉलिसी को भी मंजूरी दी. भारत की मैन्युफैक्चरिंग काफी हद तक इंपोर्टेड इनपुट पर निर्भर है, खासकर चीन से, जिससे सप्लाई पर रोक लगने की स्थिति में यह उद्योग जोखिम में पड़ जाता है, जैसा कि भारत के ऑटो और टेक उद्योगों ने पिछले साल अनुभव किया है. ईरान वॉर ने भारत की निर्भरता को और अधिक उजागर कर दिया है. हाल के महीनों में एनर्जी की भारी कमी और बढ़ते इंपोर्ट बिलों के कारण करेंसी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गई है.

सरकार ने बनाया टास्क फोर्स

मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर के दौरान भारत ने लगभग 775 अरब डॉलर का सामान इंपोर्ट किया, जिसमें से लगभग पांचवां हिस्सा अकेले चीन से आया. घरेलू क्षमता बढ़ाना अब मोदी के आर्थिक एजेंडे का एक अहम हिस्सा है. इसका मकसद ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) को कम करना, फॉरेन करेंसी बचाना और भारत को चीन के विकल्प के तौर पर मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना है. मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट में कहा कि सेंट्रल बैंक के पूर्व गवर्नर और अब मोदी के ऑफिस में प्रिंसिपल सेक्रेटरी, शक्तिकांत दास एक टास्क फोर्स की अगुवाई कर रहे हैं. यह टास्क फोर्स इकॉनमी के लिए इंपोर्ट सब्स्टिट्यूशन (आयात के विकल्प) का ब्लूप्रिंट तैयार कर रही है. इस प्रोजेक्ट में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी शामिल हैं.

भारत चीन और मिडिल ईस्ट से बड़े पैमाने पर आयात करता है

देश

इंपोर्ट (बिलियन डॉलर में)

चीन

131.63

यूएई

63.89

रूस

55.37

अमेरिका

52.90

सऊदी अरब

30.79

इराक

24.56

हांगकांग

24.33

स्विट्जरलैंड

24.27

सिंगापुर

24.24

जापान

21.44

इन ऑप्शंस पर विचार

अधिकारियों ने बताया कि मोदी ने अहम सरकारी मंत्रालयों को ऐसे क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश दिया है जहां भारत बेहतर तरीके से और कम लागत में सामान बना सकता है. उन्होंने कहा कि सरकार देश में फैक्ट्री लगाने के लिए प्राइवेट और विदेशी निवेशकों को मैन्युफैक्चरिंग इंसेंटिव देने पर विचार कर सकती है या सरकारी कंपनियों से जॉइंट वेंचर के जरिए अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए कह सकती है. कॉमर्स मिनिस्टर पीयूष गोयल ने इस महीने राज्यों और इंडस्ट्री से ऐसे प्रोडक्ट्स की पहचान करने को कहा जिनका देश में कॉम्पिटिटिव तरीके से मैन्युफैक्चरिंग की जा सके. उन्होंने कहा कि इन कोशिशों से इंपोर्ट पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने में मदद मिलेगी. साथ ही, विदेशी सप्लायर्स पर बहुत ज़्यादा निर्भरता से पैदा होने वाले जोखिमों को कम करने के लिए घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत किया जा सकेगा.

अमेरिका का रूसी बिल बनेगा मुसीबत

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल इम्पोर्टर है. यह ज़्यादातर तेल मिडिल ईस्ट और रूस से खरीदता है, जिससे देश जियोपॉलिटिकल तनावों के प्रति संवेदनशील हो जाता है. अमेरिका रूसी तेल और नेचुरल गैस के पांच सबसे बड़े खरीदारों – जिनमें भारत और चीन भी शामिल हैं – पर नए प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव कर रहा है. इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को इन देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल जाएगा. नई दिल्ली में अधिकारियों ने कहा कि हालांकि कच्चे तेल, सोने और जरूरी मिनरल्स के इम्पोर्ट का विकल्प खोजना मुश्किल है, लेकिन सरकार कृषि सुधारों के जरिए दालों और खाने के तेल जैसी दूसरी चीजों पर निर्भरता कम करने की गुंजाइश देख रही है.

एक्सपोर्ट से जुड़ी ढील देने का विचार

लोगों ने बताया कि जिन सेक्टर में इम्पोर्ट का विकल्प तुरंत खोजना मुमकिन नहीं है, वहां सरकार घरेलू प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए लंबी अवधि की रणनीति अपनाने की योजना बना रही है. कुछ क्षेत्रों में, जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए जरूरी अहम इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स, चीन ग्लोबल सप्लाई चेन में अहम भूमिका निभाता है और उसका विकल्प नहीं ढूंढा जा सकता. एक व्यक्ति ने बताया कि जिन दूसरे प्रस्तावों पर विचार किया जा रहा है, उनमें एक्सपोर्टर्स के लिए एक्सपोर्ट से जुड़ी शर्तों में ढील देने का विकल्प भी शामिल है. यह ढील तब मिल सकती है जब वे अपने एक्सपोर्ट के लिए ज़्यादातर स्थानीय स्तर पर बने कैपिटल गुड्स का इस्तेमाल करें.

अधिकारी ‘एडवांस ऑथराइजेशन प्रोग्राम’ में बदलाव करने पर भी विचार कर रहे हैं. इस प्रोग्राम के तहत एक्सपोर्टर्स बिना कस्टम ड्यूटी दिए कच्चा माल इम्पोर्ट कर सकते हैं, बशर्ते वे तय समय-सीमा के भीतर एक निश्चित मूल्य के तैयार उत्पाद एक्सपोर्ट करें और कम से कम 15 फीसदी वैल्यू एडिशन डॉमेस्टिक लेवल पर करें. उस व्यक्ति ने बताया कि बातचीत मुख्य रूप से इस बात पर हो रही है कि क्या वैल्यू एडिशन के नियमों में ढील दी जा सकती है, अगर एक्सपोर्टर्स लोकल लेवल पर बने इंटरमीडिएट प्रोडक्ट्स (मध्यवर्ती उत्पादों) का इस्तेमाल बढ़ाते हैं.

मामले की जानकारी रखने वाले एक व्यक्ति ने बताया कि सरकार फर्टिलाइज़र (खाद) के इंपोर्ट में अगले तीन वर्षों में 30 फीसदी की कमी लाने का लक्ष्य बना रही है. उस व्यक्ति ने कहा कि इस कोशिश के तहत अधिकारी बंद पड़े घरेलू फर्टिलाइजर प्लांट को फिर से शुरू करने की योजना बना रहे हैं, और कुछ प्रोजेक्ट्स के अगले साल तक पूरे होने की उम्मीद है.

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