बिहार के पूर्व सांसद आनंद मोहन की रिहाई एक बार फिर कानूनी बहस की चर्चा में आ गई है. सुप्रीम कोर्ट ने उनकी सजा में दी गई छूट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है. सुनवाई के दौरान अदालत ने सिर्फ बिहार सरकार के फैसले पर ही नहीं, बल्कि पूरी छूट की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने पूछा कि जब कानून के मुताबिक जरूरी शर्तें पूरी नहीं हुई थीं, तब रिहाई कैसे दी गई?
अदालत ने यह भी कहा कि किसी लोक सेवक की हत्या को ‘दुर्लभतम’ अपराध नहीं मानना समाज में गलत संदेश दे सकता है. सुनवाई के दौरान जजों की टिप्पणियों से साफ संकेत मिला कि वे यह देखना चाहते हैं कि क्या नियमों का पालन निष्पक्ष तरीके से हुआ या किसी खास व्यक्ति को फायदा पहुंचाने के लिए प्रक्रिया बदली गई. अब इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिर्फ आनंद मोहन की रिहाई तय करेगा, बल्कि भविष्य में राज्यों की रिमिशन नीति पर भी असर डाल सकता है.
मिली थी उम्रकैद की सजायह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि आनंद मोहन को 1994 में तत्कालीन गोपालगंज के जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. उन्हें साल 2008 में उम्रकैद की सजा मिली थी. साल 2023 में बिहार सरकार ने जेल नियमों में संशोधन किया, जिसके बाद आनंद मोहन को रिहा कर दिया गया. इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने अदालत में कई गंभीर दलीलें रखीं.
एक नजर में पूरा मामला (Getty Image)
उनका कहना था कि रिमिशन के लिए जरूरी 20 साल की वास्तविक सजा पूरी नहीं हुई थी, जेल प्रशासन ने पुराने आपराधिक रिकॉर्ड छिपाए, पैरोल की अवधि को गलत तरीके से सजा में जोड़ दिया गया और उम्र से जुड़े तथ्यों में भी गड़बड़ी की गई. इन दलीलों पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई तीखे सवाल किए और अब सभी की नजर अंतिम फैसले पर टिकी है.
आनंद मोहन को 1994 में गोपालगंज के तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या के मामले में दोषी ठहराया गया था. पहले उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई थी, जिसे बाद में उम्रकैद में बदल दिया गया. साल 2023 में बिहार सरकार ने जेल मैनुअल में संशोधन किया और कुछ श्रेणी के कैदियों को रिमिशन देने का रास्ता साफ किया. इसके बाद आनंद मोहन जेल से रिहा हो गए. इस फैसले को जी. यह याचिका डीएम जी. कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया ने दायर की थी.
2023 में आए थे बाहरकृष्णैया की हत्या मोहन की अगुवाई वाली भीड़ के हमले के बाद कर दी गई थी. इस अपराध के लिए मोहन को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी. हालांकि, बिहार सरकार के सजा में छूट दिए जाने के बाद, 14 साल की सजा काटने के बाद वह 24 अप्रैल, 2023 को जेल से बाहर आ गए थे. सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा कि पटना हाई कोर्ट की यह टिप्पणी कि किसी सरकारी कर्मचारी की हत्या सबसे दुर्लभ मामलों की श्रेणी में नहीं आती, असल में अपराधियों को सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अपराध करने के लिए बढ़ावा देगी.
‘बिहार में उस वक्त जंगल राज’बिहार सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने इस पर कहा कि ‘दुर्भाग्यवश उस वक्त बिहार में जंगल राज था.’ यह टिप्पणी जस्टिस दीपांकर और जस्टिस शील नागू की बेंच ने उस याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जिसमें बिहार सरकार के उस फैसले को चुनौती दी गई थी जिसके तहत 1994 में गोपालगंज के डीएम जी. कृष्णैया की मॉब लिंचिंग के मामले में बिहार के पूर्व सांसद आनंद मोहन को समय से पहले रिहा कर दिया गया था. जिसके बाद अदालत ने इस मामले में 5 अहम सवाल किए हैं.
सुप्रीम कोर्ट के सारे सवाल (Getty Image)
सुप्रीम कोर्ट के 5 बड़े सवाल1. क्या 20 साल की शर्त पूरी किए बिना रिमिशन दिया गया?
याचिकाकर्ता का दावा है कि रिमिशन के लिए जरूरी 20 साल की वास्तविक सजा पूरी नहीं हुई थी. अदालत ने भी इस पहलू पर गंभीर सवाल उठाए.
2. क्या नियम बदलकर आनंद मोहन को फायदा पहुंचाया गया?
कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार ने जेल नियमों में बदलाव कर किसी खास व्यक्ति को लाभ पहुंचाने का रास्ता बनाया?
3. क्या डीएम की हत्या को ‘दुर्लभतम’ नहीं माना जा सकता?
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी लोक सेवक की हत्या को दुर्लभतम श्रेणी का अपराध न मानना गलत संदेश देगा. इस टिप्पणी को मामले की सबसे अहम टिप्पणियों में माना जा रहा है.
4. क्या पुराने रिकॉर्ड छिपाए गए?
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि जेल प्रशासन ने आनंद मोहन के पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी रिमिशन बोर्ड को नहीं दी. अदालत ने इस पर भी नाराजगी जताई और कहा कि रिकॉर्ड का सही तरीके से सत्यापन होना चाहिए था.
5. क्या पैरोल और उम्र के नियमों का गलत इस्तेमाल हुआ?
वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ लूथरा ने कहा कि आनंद मोहन द्वारा ली गई तीन बार की पैरोल की अवधि को भी सजा में जोड़ लिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट पहले स्पष्ट कर चुका है कि ऐसा नहीं किया जा सकता. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि रिमिशन का लाभ लेने के लिए उम्र ज्यादा बताई गई. इस पर जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी की कि ऐसा लगता है जैसे सब एक ही दिशा में काम कर रहे थे.
बिहार सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील रंजीत कुमार ने पटना हाईकोर्ट के उस फैसले का हवाला दिया, जिसमें आनंद मोहन की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलते हुए मामले को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ नहीं माना गया था. सरकार का दावा है कि नियम किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि सभी पात्र कैदियों के लिए बदले गए थे. हालांकि, याचिकाकर्ता इस दलील से सहमत नहीं हैं और उनका कहना है कि बदलाव का सीधा लाभ आनंद मोहन को मिला.