क्या ध्वस्त होगी सहारनपुर कलेक्ट्रेट की मस्जिद? 30 दिन में परिसर खाली करने के आदेश, 6.41 करोड़ की होगी वसूली
TV9 Bharatvarsh July 17, 2026 03:43 AM

Saharanpur News: सहारनपुर के कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को लेकर पिछले डेढ़ साल से चल रहे विवाद में नगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है. नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने उत्तर प्रदेश लोक परिसर (अनधिकृत अध्यासियों की बेदखली) अधिनियम, 1972 के तहत पारित 36 पन्नों के आदेश में संबंधित पक्षों को 30 दिनों के भीतर परिसर खाली करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही करीब 6 करोड़ 41 लाख रुपए की वसूली के आदेश भी दिए गए हैं. इस फैसले के बाद सहारनपुर में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अब कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को ध्वस्त किया जाएगा?

यह विवाद वर्ष 2025 में उस समय शुरू हुआ था, जब बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से शिकायत कर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को सरकारी जमीन पर बना होने का आरोप लगाया था. इसके बाद प्रशासन ने मामले की जांच शुरू की और वाद संख्या-2032/2025 नगर मजिस्ट्रेट की अदालत में पहुंचा.

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सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है जमीन

नगर मजिस्ट्रेट के आदेश के मुताबिक, ग्राम पठानपुरा स्थित खसरा संख्या-539 राजस्व अभिलेखों में कलेक्ट्रेट/कचहरी की सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है. अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि विवादित भवन मूल रूप से कलेक्ट्रेट आने वाले लोगों के ठहरने और डाकघर की सुविधा के लिए इस्तेमाल होता था. बाद में यहां नमाज अदा की जाने लगी और भवन के कुछ हिस्सों का उपयोग अन्य कार्यों में भी होने लगा.

सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों ने अदालत में दावा किया कि मस्जिद 100 वर्ष से अधिक पुरानी है और वक्फ संपत्ति है. इसके समर्थन में कई दस्तावेज और गवाह भी पेश किए गए. कुछ गवाहों ने बताया कि वे बचपन से यहां नमाज अदा होते देख रहे हैं. वहीं, प्रशासन ने राजस्व अभिलेख, खतौनी और अन्य सरकारी रिकॉर्ड अदालत में प्रस्तुत किए.

नगर मजिस्ट्रेट ने 36 पन्नों का आदेश जारी किया

36 पन्नों के आदेश में नगर मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह ने कहा कि उपलब्ध राजस्व अभिलेखों में संबंधित भूमि को कभी वक्फ या धार्मिक स्थल के रूप में दर्ज नहीं पाया गया. आदेश में यह भी दर्ज है कि सरकारी परिसर के कुछ कमरों का किराये पर उपयोग किया गया और उससे किराया वसूला जाता रहा. अदालत ने इसे सरकारी संपत्ति का अनधिकृत उपयोग माना है.

नगर मजिस्ट्रेट ने अपने आदेश में संबंधित पक्षों को अनधिकृत अध्यास की श्रेणी में मानते हुए 30 दिनों के भीतर परिसर खाली करने के निर्देश दिए हैं. इसके अलावा, सरकारी संपत्ति के अनधिकृत उपयोग के एवज में 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज सहित करीब 6 करोड़ 41 लाख रुपए की वसूली के आदेश भी दिए गए हैं.

शिकायतकर्ता ने फैसले को ‘सत्य की जीत’ बताया

फैसले के बाद शिकायतकर्ता विकास त्यागी ने इसे “सत्य की जीत” बताते हुए कहा कि सरकारी परिसरों का इस्तेमाल केवल सरकारी कार्यों के लिए होना चाहिए. वहीं, मस्जिद पक्ष के पास इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती देने का कानूनी विकल्प मौजूद है. फिलहाल, नगर मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद पूरे सहारनपुर की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है. यदि 30 दिनों के भीतर आदेश का पालन नहीं होता है तो प्रशासन को आगे की कार्रवाई का रास्ता खुल जाएगा.

क्या बोले कांग्रेस सांसद इमरान मसूद?

इस मामले में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्होंने जारी आदेश का अध्ययन किया है. यह कोई न्यायिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक आदेश है. उनके मुताबिक, यह फैसला किसी को खुश करने के उद्देश्य से लिया गया प्रतीत होता है. अदालत में टिक नहीं पाएगा. उन्होंने दावा किया कि जिस खसरा नंबर की जमीन पर मस्जिद होने की बात कही जा रही है, उसी भूमि पर मंदिर भी बना हुआ है. इमरान मसूद ने कहा कि उनकी पार्टी इस मामले को कोर्ट में चुनौती देगी. साथ ही उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यह आदेश ऐसे समय जारी किया गया है, जब कांवड़ यात्रा शुरू होने वाली है.

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