Kokila Vrat Ki Katha: सनातन धर्म में कोकिला व्रत का विशेष महत्व माना जाता है. ये व्रत माता पार्वती के कोकिला रूप को समर्पित किया गया है. धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को रखने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है. यही नहीं ये व्रत कुंवारी कन्याओं के लिए भी एक वरादन है. मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से कुंवारी कन्याओं को मनचाहा वर प्राप्त होता है. द्रिक पंचांग के अनुसार, इस साल कोकिला व्रत 28 अगस्त को रखा जाएगा. इसी दिन सावन माह की पूर्णिमा भी मनाई जाएगी.
एक बार देवी सती ने कोयल का रूप धारण करके हजारों वर्षों तक तपस्या की थी. ये कोकिला व्रत माता सती के उस कठिन तप की याद दिलाता है. इसी कारण से इस व्रत में मिट्टी से बनाई गई कोयल की मूर्ति की पूजा की जाती है. कहा जाता है कि माता सती को कोकिला यानी कोयल का रूप मिलने के पीछे का कारण भगवान शिव द्वारा दिया गया एक श्राप था. ऐसे में आइए जानते हैं कोकिला व्रत की कथा.
पौराणिक कथा के अनुसार…पौराणिक कथा के अनुसार, माता सती के पिता राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने सभी देवी-देवताओं को आंमत्रित किया था, लेकिन माता सती और महादेव को नहीं बुलाया था. जब देवी सती को इस बात का पता चला तो वो महादेव से यज्ञ में जाने की जिद्द करने लगीं. भगवान शिव ने सती को बहुत समझाया कि बिना बुलाए इस यज्ञ में जाना ठीक नहीं, लेकिन माता सती ने महादेव की एक न मानी और यज्ञ में चली गईं.
कोयल बनकर जीने का श्राप दियामाता सती जैसे ही अपने पिता दक्ष के यज्ञ में पहुंची तो उनके पिता ने उनका और उनके पति यानी भगवान शिव बहुत अपमान किया. माता महादेव का अपमान न सह सकीं और यज्ञकुंड की अग्नि में कुद गईं. जब भगवान शिव को इस बात का पता चला तो उन्होंने दक्ष को मृत्यु दंड दिया. साथ ही माता सती को आज्ञा न मानने के लिए हजारों वर्षों तक कोयल बनकर जीने का श्राप दे दिया.
कहा जाता है कि भगवान शिव के इसी श्राप की वजह से देवी सती कई हजारों साल तक नंदन वन में कोयल बनकर जीवन जीती रहीं. फिर जाकर उनका जन्म माता पार्वती के रूप में हुआ और उन्होंने भगवान शिव को प्राप्त किया.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.