2011 में तपती गर्मी का मौसम... दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना हजारे की भूख हड़ताल, हजारों लोगों की भीड़, मीडिया का लाइव कवरेज और पूरे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक लहर. उस आंदोलन ने भारतीय राजनीति को हिलाकर रख दिया था. अन्ना हजारे, अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी जैसे 10 चेहरे उस आंदोलन की पहचान थे. अन्ना आंदोलन को 15 साल बीत चुके हैं और देश में नया आंदोलन छिड़ा हुआ है. ऐसे में सवाल है कि अन्ना आंदोलन के सभी 10 बड़े चेहरे अब कहां हैं और किसने क्या रास्ता चुना...
1. अन्ना हजारे: जहां से चले थे, वहीं पहुंच गए
अन्ना हजारे आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे थे. 2011 में रामलीला मैदान में उनकी भूख हड़ताल ने UPA सरकार को घुटनों पर ला दिया था. लेकिन आंदोलन के बाद उन्होंने राजनीति में आने से साफ इनकार कर दिया और रालेगण सिद्धी (महाराष्ट्र) लौट गए.
11 दिसंबर 2025 को अन्ना हजारे ने एक बार फिर आमरण अनशन का ऐलान किया. अन्ना ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को पत्र लिखकर कहा कि अगर लोकायुक्त कानून तुरंत लागू नहीं किया गया, तो वे 30 जनवरी 2026 से रालेगण सिद्धि में आमरण अनशन शुरू कर देंगे. राज्य सरकार ने 28 दिसंबर 2022 को विधानसभा और 15 दिसंबर 2023 को विधान परिषद से लोकायुक्त बिल पास किया था, लेकिन अभी तक लागू नहीं किया गया. 87 साल की उम्र में भी अन्ना हजारे ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वच्छता के कामों में लगे हैं और राजनीति से पूरी तरह अलग हैं.
2. अरविंद केजरीवाल: आंदोलन से मुख्यमंत्री तक
अन्ना आंदोलन के दौरान केजरीवाल अन्ना के सबसे करीबी सहयोगियों में से एक थे. आंदोनालन के बाद उन्होंने 2012 में आम आदमी पार्टी (AAP) की स्थापना की और दिल्ली के मुख्यमंत्री बने.
मई 2026 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP को सिर्फ 18 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी को 52 सीटें मिलीं. अरविंद केजरीवाल अब पूर्व मुख्यमंत्री और विपक्ष के नेता हैं. वे AAP के राष्ट्रीय संयोजक के रूप में एक्टिव हैं और केंद्र सरकार पर निशाना साधते रहते हैं. NEET पेपर लीक मामले में उन्होंने सरकार को घेरा. 7 AAP सांसदों के बीजेपी में विलय से पार्टी और कमजोर हुई है. ED ने उन्हें दिल्ली शराब घोटाले में भी तलब किया था. अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री रहते हुए जेल जाने वाले देश भर में पहले CM बने.
3. किरण बेदी: अन्ना की सहयोगी से उपराज्यपाल तक
2011 में किरण बेदी अन्ना के सबसे मजबूत सहयोगियों में से एक थीं. वे देश की पहली महिला IPS अधिकारी हैं.
अन्ना आंदोलन के बाद किरण ने बीजेपी में शामिल हो गईं. 2016 से 2021 तक पुडुचेरी की उपराज्यपाल रहीं. 2026 में दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली करने के केंद्र सरकार के फैसले पर उन्होंने दुख जताया और कहा, 'ऐसा लगा जैसे मुझे घर से निकाला जा रहा हो.' वे अब सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में काम करती हैं. 2024 में बीजेपी ने उन्हें सांसद बनाने की पेशकश की, लेकिन उन्होंने मना कर दिया.
4. कुमार विश्वास: अन्ना की टीम से कवि और राजनेता
अन्ना आंदोलन के दौरान कुमार विश्वास एक कवि और वक्ता के रूप में उभरे. उनकी कविताएं और भाषण खूब पसंद किए गए.
कुमार विश्वास AAP के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन 2018 में केजरीवाल से मतभेद के बाद पार्टी छोड़ दी. 2026 से वे बीजेपी के करीब नजर आ रहे हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों पर उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट शेयर की. वे कवि सम्मेलनों में सक्रिय हैं और मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में काम कर रहे हैं.
5. बाबा रामदेव: सबसे विवादस्पत रास्ता
अन्ना आंदोलन के दौरान बाबा रामदेव 'तमंचा' (टॉर्च) लेकर रामलीला मैदान में आए थे. उन्होंने योग, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाई.
रामदेव ने सबसे बड़ा उलटफेर किया. रामदेव आंदोलन के बाद बीजेपी सरकार के प्रबल समर्थक बन गए. वे पतंजलि के जरिए से योग, आयुर्वेद और स्वदेशी पर काम कर रहे हैं. 2026 में पतंजलि स्थापना दिवस मनाया. 17 जून 2026 को पतंजलि सिविल सर्विस अकादमी लॉन्च की, जो भविष्य के IAS अधिकारियों को प्रशिक्षित करेगी. 2024 में उन्होंने विपक्षी आंदोलन की आलोचना की.
6. योगेंद्र यादव: सबसे अलग रास्ता
अन्ना आंदोलन के दौरान योगेंद्र यादव एक राजनीतिक विश्लेषक और आंदोलन के सैद्धांतिक मार्गदर्शक थे.
योगेंद्र AAP के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन 2015 में केजरीवाल से मतभेद के बाद पार्टी छोड़ दी. योगेंद्र ने 'स्वराज अभियान' की शुरुआत की, जो गांवों और स्थानीय स्वशासन पर काम करता है. 2026 में उन्होंने वाराणसी से स्वराज यात्रा शुरू की. 1 अगस्त 2026 से 'दिल्ली सदन कूच' अभियान चलाने की घोषणा की, जो भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ किसानों को एकजुट करेगा. वे CJP प्रोटेस्ट में भी शामिल हुए.
7. प्रशांत भूषण: वकील से कार्यकर्ता तक सफर
अन्ना आंदोलन के दौरान प्रशांत भूषण एक वरिष्ठ वकील और आंदोलन की सबसे तीखे आवाजों में से एक थे.
प्रशांत AAP के संस्थापक सदस्य थे, लेकिन पार्टी छोड़ दी. वे सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं. 2020 में सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के मामले में दोषी ठहराए गए. 2026 में उन्होंने SHANTI Act, 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली जनहित याचिका दायर की. वे 'स्वराज अभियान' में योगेंद्र यादव का साथ दे रहे हैं. योगेंद्र कानूनी सुधार और न्यायपालिका में पारदर्शिता पर काम कर रहे हैं.
8. मनीष सिसोदिय: शिक्षा से जेल तक सफर
अन्ना आंदोलन के दौरान मनीष सिसोदिया एक स्कूल टीचर और कार्यकर्ता थे. आंदोलन के बाद वे AAP में शामिल हुए और दिल्ली के उपमुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री बने.
26 फरवरी 2023 को दिल्ली शराब नीति मामले में CBI ने उन्हें गिरफ्तार किया. 17 महीने जेल में रहने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी. सिसोदिया के समर्थकों का कहना है कि उन्हें राजनीतिक रूप से खत्म करने के लिए यह किया गया है.
9. शांति भूषण: जो आंदोलन से अलग हो गए
शांति भूषण अन्ना आंदोलन के कानूनी सलाहकार और वरिष्ठ वकील थे. वे जनलोकपाल बिल के मसौदे में शामिल थे.
31 जनवरी 2023 को 100 साल की उम्र में उनका निधन हो गया. वे भारत के पूर्व कानून एवं न्याय मंत्री और सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता थे. वे मोरारजी देसाई सरकार में विधि, न्याय एवं कंपनी कार्य मंत्री थे.
10. मेधा पाटकर: सबसे अलग और सबसे साहसी
अन्ना आंदोलन में मेधा पाटकर सबसे अलग चेहरा थीं. वह एक नारीवादी, पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता थीं.
मेधा अब नर्मदा बचाओ आंदोलन (NBA) की नेता हैं. 2026 में भी नर्मदा बांध परियोजना से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए जनहित याचिका दायर की. 2024 में मानहानि के मामले में दोषी ठहराई गईं. वे आदिवासियों, दलितों, किसानों, मजदूरों और महिलाओं के लिए काम कर रही हैं.
अन्ना आंदोलन के 10 चेहरों की यह कहानी दिखाती है कि एक आंदोलन कितनी दिशाओं में बंट सकता है. कैसे एक जैसी मांग के लिए उठे लोग अलग-अलग रास्तों पर चले गए.