पुराने डीजल वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने एक अहम कदम उठाने जा रही है. सरकार पुराने डीजल ट्रक और बसों में Retrofit Emission Control Device (RECD) लगाने की दिशा में आगे बढ़ रही है. यह डिवाइस खास तौर पर उन पुरानी गाड़ियों के लिए जरूरी हो सकता है, जिन्हें सिर्फ ज्यादा पॉल्यूशन की वजह से बदलना महंगा पड़ता है. सरकार के मुताबिक, इस तकनीक की मदद से पुरानी डीजल गाड़ियों से निकलने वाले प्रदूषण को काफी हद तक कम किया जा सकता है.
RECD एक तरह का पॉल्यूशन कंट्रोल डिवाइस है, जिसे पुराने डीजल वाहन के एग्जॉस्ट सिस्टम में लगाया जाएगा. आसान भाषा में कहें तो इसे डीजल इंजन के धुएं के लिए एक तरह का एयर प्यूरीफायर कहा जा सकता है. इंजन से निकलने वाला धुआं सीधे वातावरण में जाने की बजाय पहले इस डिवाइस से होकर गुजरेगा. इससे धुएं में मौजूद हानिकारक प्रदूषकों की मात्रा कम करने में मदद मिलेगी.
90% तक कम हो सकता है प्रदूषण
इस डिवाइस की सबसे बड़ी खासियत इसका पॉल्यूशन कम करने की कैपेसिटी है. सरकार के मुताबिक, RECD लगाने के बाद पार्टिकुलेट मैटर यानी PM उत्सर्जन में 90 फीसदी तक की कमी आ सकती है. इसके अलावा नाइट्रोजन ऑक्साइड यानी NOx के उत्सर्जन में करीब 60 फीसदी तक कमी आने का दावा किया गया है. इसका सीधा फायदा हवा की क्वालिटी सुधारने में मिल सकता है, खासकर उन जगहों पर जहां बड़ी संख्या में पुरानी डीजल गाड़ियां चलती हैं.

BS-III और BS-IV वाहनों में भी लग सकेगा
सरकार की योजना के मुताबिक, यह डिवाइस BS-III, BS-IV और इससे पुराने डीजल वाहनों में भी लगाया जा सकेगा. डिवाइस लगाने के बाद इन पुरानी गाड़ियों के उत्सर्जन लेवल को मॉडर्न BS-VI वाहनों के करीब लाने की कोशिश की जाएगी. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पुरानी गाड़ी तकनीकी रूप से BS-VI गाड़ी में बदल जाएगी. इसका मकसद सिर्फ उसके पॉल्यूशन को काफी कम करना है.
कितनी है इस डिवाइस की कीमत?
- RECD की एक और खास बात इसकी कम कीमत है. इसकी कीमत करीब 4,000 से 5,000 रुपये होने की उम्मीद है. ऐसे में पुरानी गाड़ी मालिकों के लिए यह नया वाहन खरीदने के मुकाबले काफी सस्ता ऑप्शन हो सकता है. खासकर पुराने ट्रक और बसों के मामले में यह तकनीक प्रदूषण कम करने के साथ गाड़ी को कुछ समय तक चलाने का किफायती रास्ता दे सकती है.
- इस डिवाइस की तकनीक IIT दिल्ली में हुए एक इनोवेशन पर बेस्ड है और इसकी टेस्टिंग भी सफलतापूर्वक पूरी की जा चुकी है. इसका इस्तेमाल पहले डीजल जनरेटर सेट में भी इसी तरह के प्रदूषण नियंत्रण के लिए किया जा चुका है. अब इसे पुराने वाहनों में इस्तेमाल करने की दिशा में काम किया जा रहा है.
- इस तकनीक को गाड़ियों में इस्तेमाल करने के लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय Automotive Industry Standard-228 यानी AIS-228 को नोटिफाई करने की तैयारी कर रहा है. इसमें RECD की तकनीकी जरूरतें, प्रदर्शन और दूसरे जरूरी मानक तय किए जाएंगे. यानी डिवाइस को गाड़ियों में लगाने से पहले उसके लिए स्पष्ट नियम और मानक तैयार किए जाएंगे.

- ऐसे में कहा जा सकता है कि सरकार का यह कदम पुराने डीजल गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को कम करने की कोशिश है. जहां एक तरफ सरकार पुराने प्रदूषण फैलाने वाले गाड़ियों को स्क्रैप कर नए वाहन खरीदने को बढ़ावा दे रही है, वहीं RECD जैसी तकनीक के जरिए मौजूदा पुरानी गाड़ियों के उत्सर्जन को कम करने का ऑप्शन भी तैयार किया जा रहा है.
- सरकार की इस पहल को पुराने डीजल वाहनों से होने वाले प्रदूषण को कम करने की बड़ी कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. एक तरफ पुराने और ज्यादा प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों को स्क्रैप करने की नीति पर जोर दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ RECD जैसी तकनीक के जरिए वाहनों के उत्सर्जन को कम करने का विकल्प तैयार किया जा रहा है.