बछ बारस पर चाकू से कटी चीजें क्यों नहीं खाते? जानें इस परंपरा के पीछे की धार्मिक मान्यता
जागृति सोनी बरसले September 07, 2026 10:42 AM

Bach Baras 2026: साल में दो बार गोवत्स द्वादशी मनाई जाती है एक कार्तिक और दूसरी भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर, इस बार भादों की बछ बारस यानी गोवत्स द्वादशी 7 सितंबर 2026 को है. ये गाय और उसके बछड़े की पूजा का महत्वपूर्ण पर्व है.

पंचांग के अनुसार द्वादशी तिथि 7 सितंबर शाम 5:03 बजे शुरू होगी और 8 सितंबर दोपहर 2:42 बजे तक रहेगी.इस दिन प्रदोषकाल में पूजा का खास महत्व है. इसके अलावा महिलाएं ये व्रत क्यों करती हैं और इस दिन चाकू से कटी चीजों का सेवन क्यों नहीं किया जाता आइए जानते हैं. 

क्यों किया जाता है बछ बारस व्रत?

बछ बारस पर महिलाएं गाय और बछड़े की पूजा करके अपनी संतान की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. हिंदू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया है और ये दिन गौ के प्रति आभार प्रकट करने का पर्व है. मान्यता है कि बछ बारस की पूजा से संतान पर आने वाल कष्ट दूर होते हैं.  

पूजा में गाय-बछड़े को स्नान कराकर तिलक लगाया जाता है और चना, मोठ, बाजरा आदि अर्पित किए जाते हैं. गाय उपलब्ध न होने पर मिट्टी से गाय-बछड़े की आकृति बनाकर पूजा करने की परंपरा भी मिलती है.

चाकू से कटी चीजें क्यों नहीं खाते?

बछ बारस की सबसे खास परंपराओं में से एक है चाकू से कटी हुई सब्जी या फल का सेवन न करना. कई परिवारों में इस दिन चाकू और कैंची का इस्तेमाल भी नहीं किया जाता.  इसके पीछे बछ बारस की एक प्रसिद्ध लोककथा जुड़ी है. कथा में एक बहू से भूलवश बछड़े को काटकर पकाने की गलती हो जाती है.

वह बछ बारस माता से प्रार्थना करती है और पूजा के प्रभाव से बछड़ा फिर जीवित हो जाता है. इसी कथा से जुड़ी मान्यता के कारण इस दिन किसी जीव को काटने का प्रतीक माने जाने वाले चाकू से भोजन काटने से भी परहेज किया जाने लगा. 

क्या-क्या नहीं खाते?

  • इस दिन गेहूं और गाय के दूध से बनी चीजों का त्याग किया जाता है.
  • चाकू से कटी सब्जियों की जगह अंकुरित अनाज, चना, मोठ, बाजरा, ज्वार और बेसन से बने व्यंजन खाए जाते हैं. 

बछ बारस की पूजा कैसे करें

  • सुबह स्नान करने के बाद व्रती महिलाएं गाय और बछड़े की पूजा करती हैं.
  • घर में गाय-बछड़े की मूर्ति या चित्र बनाकर, या वास्तविक गाय-बछड़े को स्नान कराकर उनका श्रृंगार किया जाता है.
  • उनके माथे पर हल्दी-कुमकुम लगाकर रोली और अक्षत चढ़ाए जाते हैं.
  • दीप, धूप, नैवेद्य, फल और मिठाई से विधिपूर्वक पूजा की जाती है.
  • पूजा के बाद गाय और बछड़े को मीठा चारा, गुड़-चना आदि खिलाया जाता है.
  • महिलाएं श्रद्धा से व्रत रखती हैं और दिनभर गाय की सेवा, भजन-कीर्तन व कथा श्रवण करती हैं.
  • शाम को दोबारा पूजा करने के बाद व्रत का पारण कर भोजन किया जाता है.

बछ बारस की कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में नन्दिनी नामक एक दिव्य गो थी जो कामधेनु की कन्या थी. वह सभी ऋषियों की कामनायें पूर्ण करती थी. एक बार एक स्त्री ने अपने पुत्र की रक्षा के लिये नन्दिनी गो का त्याग कर दिया तथा उसे गोवध से नहीं बचाया. इस अपराध के कारण उस स्त्री का अपने पुत्र से वियोग हो गया. पश्चात्ताप करने पर देवताओं ने उसे गोवत्स द्वादशी का व्रत करने को कहा, जिससे उसका पुत्र पुनः प्राप्त हुआ. इसीलिये, यह व्रत संतान की रक्षा और सन्तान प्राप्ति की आशा से भी किया जाता है.

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