प्रयागराज: संगमनगरी प्रयागराज में 13 जनवरी को शुरू हुआ भव्य महाकुंभ अब समाप्त हो चुका है। 26 फरवरी को महाशिवरात्रि स्नान के साथ इस ऐतिहासिक आयोजन ने अपनी पूर्णाहुति ली। इस दौरान 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने पावन त्रिवेणी में आस्था की डुबकी लगाई। इस विशाल आयोजन को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे विश्व इतिहास में अभूतपूर्व और अविस्मरणीय बताया।
हालांकि, इस पावन आयोजन के बीच विवाद भी उठा। ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने महाकुंभ को 'सरकारी कुंभ' करार दिया। उन्होंने कहा कि असली कुंभ माघ पूर्णिमा को ही समाप्त हो चुका था। उनके अनुसार कुंभ माघ महीने में ही पूरा होता है, और पूर्णिमा के दिन सभी कल्पवासी प्रयागराज छोड़कर चले गए थे। इसके बाद जो आयोजन हुआ, उसे उन्होंने सरकारी आयोजन बताया। उल्लेखनीय है कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के बयान अक्सर विवादों में रहते हैं। वे भाजपा सरकारों की आलोचना के लिए सुर्खियों में बने रहते हैं।
हाल ही में उन्होंने महाराष्ट्र के राजनीतिक संकट के दौरान उद्धव ठाकरे का समर्थन किया था और कहा था कि जब तक उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री पद पर वापस नहीं आते, तब तक न्याय नहीं होगा। इससे पहले राहुल गांधी द्वारा संसद में दिए गए 'हिंदू हिंसक' बयान पर भी अविमुक्तेश्वरानंद ने समर्थन जताया था और कहा था कि राहुल ने कुछ गलत नहीं कहा। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा को लेकर भी उन्होंने सवाल उठाए थे और सरकार पर निशाना साधा था। इसके अलावा, उन्होंने उत्तराखंड सरकार और केदारनाथ मंदिर प्रशासन पर सोना बेचने का गंभीर आरोप लगाया था। इस आरोप पर केदारनाथ मंदिर प्रबंधन ने उन्हें कोर्ट में चुनौती दी थी और सबूत पेश करने को कहा था, लेकिन शंकराचार्य इस चुनौती को स्वीकार नहीं कर पाए।
इन विवादों के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा होता है। कई संत समाज और धार्मिक गुरुओं ने महाकुंभ को लेकर ऐसा बयान नहीं दिया है, जैसा अविमुक्तेश्वरानंद ने दिया है। देशभर से आए साधु-संतों, सन्यासियों और मठ गुरुओं ने इस आयोजन की भव्यता और इसकी आध्यात्मिक महत्ता को सराहा है। यह भी गौर करने वाली बात है कि अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पद को लेकर भी विवाद है। कई संतों का आरोप है कि उन्हें गुरु द्वारा शंकराचार्य घोषित नहीं किया गया था, बल्कि उन्होंने खुद को इस पद पर घोषित किया। 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड में ज्योतिष पीठ के नए शंकराचार्य के रूप में उनके अभिषेक पर रोक लगा दी थी, और यह मामला अभी भी अदालत में लंबित है।
महाकुंभ के इस भव्य आयोजन के बीच अविमुक्तेश्वरानंद का यह बयान कितना तर्कसंगत है, यह तो आने वाले दिनों में संत समाज की प्रतिक्रिया से स्पष्ट होगा। लेकिन इतना तय है कि महाकुंभ ने न केवल करोड़ों श्रद्धालुओं को एक आध्यात्मिक अनुभव दिया, बल्कि एक बार फिर भारतीय संस्कृति की विशालता और भव्यता को दुनिया के सामने रखा।
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