आपने भगवान को भी नहीं बख्शा… सबरीमाला सोना चोरी मामले में SC ने केपी शंकरदास को लगाई फटकार, खारिज की याचिका
TV9 Bharatvarsh January 05, 2026 10:43 PM

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला अय्यप्पा स्वामी मंदिर में सोना चोरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (टीडीबी) के पूर्व सदस्य के.पी. शंकर दास की याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने शंकरदास को लगाई फटकार लगाते हुए कहा कि आपने भगवान को भी नहीं बख्शा.

सोमवार (5 जनवरी) को सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्त और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने केरल हाई कोर्ट के आदेश में उनके खिलाफ की गई टिप्पणियों को को हटाने से साफ इनकार कर दिया. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि आपने तो भगवान को भी नहीं छोड़ा. कम से कम मंदिर और भगवान को तो बख्श दीजिए.

मंदिर की संपत्ति की रक्षा करना जिम्मेदारी

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि देवस्वोम बोर्ड के सदस्य के रूप में के.पी. शंकर दास की जिम्मेदारी मंदिर की संपत्ति की रक्षा करना थी, लेकिन आरोपों के अनुसार वो सोने की लूट और हेराफेरी के लिए भी जिम्मेदार ठहराए गए हैं. कोर्ट ने कहा कि अपराध बेहद गंभीर है, फिर भी हाई कोर्ट ने आपकी खराब सेहत और उम्र को ध्यान में रखते हुए कुछ राहत दी थी. कोर्ट ने कहा कि इसका अर्थ ये नहीं है कि आपके खिलाफ लगे आरोप कमजोर हैं या अपराध की मेरिट पर कोई टिप्पणी की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

केरल हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि के.पी. शंकर दास और के. विजयकुमार सोने की चोरी और हेराफेरी की आपराधिक साजिश से बच नहीं सकते. हाई कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद दास ने आदेश के पांच पैराग्राफ हटाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान शंकर दास के वकील के तर्कों को सुनने के बाद इसे खारिज कर दिया. कोर्ट ने माना कि केरल हाई कोर्ट की टिप्पणियां मामले के तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं. उन्हें हटाने का कोई आधार नहीं है.

यह मामला सबरीमाला मंदिर से जुड़े होने के कारण पहले से ही सुर्खियों में था. मंदिर की संपत्ति में बड़े पैमाने पर अनियमितता और चोरी के आरोपों ने धार्मिक भावनाओं को आहत किया था. कोर्ट के इस फैसले को मंदिर प्रशासन से जुड़े मामलों में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक अहम संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. दास की याचिका खारिज होने से केरल हाई कोर्ट का आदेश बरकरार रहेगा.

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