जब बिहार में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का काम चल रहा था तब हमारे एक परिचित की मेड महीने भर की छुट्टी ले कर अपने गांव गई थी. उसने न सिर्फ अपना नाम दुरुस्त कराया था बल्कि 2003 की मतदाता सूची की प्रक्रिया भी पूरी कर ली. हमारे घर की मेड भी मुस्लिम है और पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले से है, वह भी नवंबर में छुट्टी पर चली गई और वोटर लिस्ट में अपना नाम दर्ज करवा कर लौटी.
लौट कर उसने यह भी बताया कि उसने अपनी मेहनत से डेढ़ लाख रुपये बचाए थे, उससे खेती की कुछ जमीन भी गांव में खरीद ली. इसमें कोई शक नहीं कि पश्चिम बंगाल के माल्दा, मुर्शिदाबाद, उत्तरी दीनाजपुर, नादिया और कृष्णा नगर में मुस्लिम आबादी बहुत है. जमीन खरीद लेने से उसका नाम अब खतौनी में भी आ गया होगा. उसे अब अपनी नागरिकता का सबूत देने में ज्यादा पापड़ नहीं बेलने पड़ेंगे.
सबसे अधिक नाम UP से कटेगांव में खेती की जमीन खरीद लेने के चलते हर महीने उसके खाते में सरकारी पैसा भी आएगा. साथ ही यह खतरा भी समाप्त हुआ कि बांग्ला भाषा बोलने के कारण कोई उस पर बांग्लादेशी होने का ठप्पा मढ़ने की हिम्मत नहीं करेगा. इसलिए यह कहना कि अमुक का नाम जान-बूझ कर काट दिया गया, फालतू है. बिहार में SIR की प्रक्रिया सबसे पहले शुरू हुई और विधानसभा चुनाव में जिस तरह वोट पड़े उनसे साबित हो गया कि SIR का उद्देश्य किसी का नाम काटने का नहीं है बल्कि मतदाता सूची को दुरुस्त करने का है.
उत्तर प्रदेश इसका ताजा प्रमाण है. वहां 2.89 करोड़ लोगों के नाम मतदाता सूची से काटे गए. ये नाम अधिकतर उनके थे जिनका नाम एक से अधिक स्थान की वोटर लिस्ट में दर्ज है. बहुत से लोगों को मरे हुए कई दशक बीत गए परंतु उनके नाम वोटर लिस्ट में चढ़े रहे. जाहिर है उनके वोट भी पड़ते रहे होंगे. ये गड़बड़ियां शहरी क्षेत्रों में अधिक हुई होंगी. परंपरागत रूप से शहरी वोटर बीजेपी का माना जाता है.
BLO नहीं BLA अपना काम भूलेशायद इसीलिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राज्य के करोड़ों वोटरों के नाम सूची से काटे जाने से खिन्न हैं. जो लोग अब जीवित नहीं हैं या शहर छोड़ चुके हैं और यदि उनके नाम वोटर लिस्ट में दर्ज थे तो वोट किसे मिलता रहा होगा. जाहिर है जिसके BLA (बूथ लेबल एजेंट) सक्रिय रहे होंगे. शहरी क्षेत्रों में कांग्रेस के BLA अब दिखते नहीं हैं. 1984 के बाद की भारी जीत के बाद वे निश्चिंत हो गए कि वोट तो हमें मिलेगा ही.
इसके बाद से कांग्रेस का पतन शुरू हुआ. यहीं से बीजेपी का उत्थान भी. बीजेपी ने यह बात गांठ बांध ली थी कि बूथ स्तर पर कार्यकर्त्ता सबसे जरूरी होते हैं. ऐसे में इस श्रेणी के वोट कटने का अर्थ बीजेपी के वोटों में कटौती रही होगी. इसलिए अन्य दलों द्वारा शोर मचाये जाने का कोई मतलब नहीं है. अलबत्ता यह हो सकता है कि वे भी आने वाले चुनावों में बीजेपी की रणनीति अपनाने जा रहे हों.
पिता की उम्र 56 और बेटे की 46इसमें कोई शक नहीं कि SIR फ़ॉर्म भरने की प्रक्रिया काफी पेचीदगी भरी थी और खुद BLO भी इस काम को पूरा करने में परेशान रहे. क्योंकि उनके लिए यह नया और अलग किस्म का काम था. BLO घर-घर जा कर तस्दीक़ कर रहे थे कि फॉर्म भरने वाले व्यक्ति ने सही जानकारी दी है या नहीं!
पर सबसे जटिल काम था, 2003 के पहले की सूची में अपना नाम तलाशना. तब एपिक (EPIC) नंबर कोई सुरक्षित रखने की चीज थी नहीं क्योंकि तब मतदाता सूची में ब्योरा BLO और राजनीतिक दलों के BLA अपनी मिलीभगत से भर देते थे. घर के मुखिया जितने परिवार जनों के नाम लिखाये वही सत्य मान लिया गया. न तो किसी का जन्म प्रमाणपत्र मांगा गया न उनकी कोई आईडी. यहां तक कि कई मतदाता सूची में पिता की उम्र 56 लिखी है और पुत्र की 46 वर्ष. इसलिए इसे दुरुस्त करना जरूरी था.
देर आयद दुरुस्त आयद!परंतु इस बात पर अंगुली अवश्य उठनी चाहिए कि इतने वर्षों बाद सरकार को मतदाता सूची सुधारने की सुधि आई. यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिए था. मतदाता पहचान पत्र को ही किसी नागरिक की भारतीय नागरिकता का वैध प्रमाणपत्र माना जाना चाहिए. भारत में पासपोर्ट बहुत काम लोगों के पास होगा, ऐसे में मतदाता पहचान पत्र ही उसकी अकेली पहचान है.
सबसे खास बात यह कि हर वर्ष यह पुनरीक्षण भी करवाते रहना चाहिए कि अमुक नागरिक जीवित है या नहीं अथवा वह किसी दूसरे शहर में शिफ्ट तो नहीं हो गया. इसके लिए एक बात अनिवार्य तौर पर पूरी की जाए कि जब भी किसी दूसरे शहर में वह मतदाता पहचान पत्र के लिए आवेदन करे तो निर्वाचन विभाग उसके एपिक नम्बर से स्वयं पता कर ले कि यह नम्बर किसी और निर्वाचन क्षेत्र में दर्ज तो नहीं है.
6.56 करोड़ मतदाता बाहरकई बार तारीख आगे बढ़ाने के बाद आखिरकार मंगलवार को उत्तर प्रदेश के भी कुल मतदाताओं की गणना आ गई. नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित क्षेत्रों में जो मतदाता गणना हुई है उसके अनुसार पिछली मतदाता सूची से 6.56 करोड़ मतदाता बाहर हुए हैं. यह कटौती 12.88 प्रतिशत है. सबसे अधिक कटौती उत्तर प्रदेश में हुई है, जहां पर बीजेपी का ही शासन है. वहां पर 18.69 प्रतिशत वोट कटे हैं जबकि बिहार में 8.3 प्रतिशत मतदाता बाहर हुए थे.
अब इन राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों में 44.40 मतदाता रह गए हैं जो SIR के पहले 50.90 करोड़ थे. अभी कई क्षेत्रों से शिकवा शिकायतें हैं. बहुत से लोगों का कहना है कि बीजेपी के राज में चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों के मतदाताओं के नाम उड़ा दिए. उधर मुसलमानों के कुछ संगठनों ने अपने समुदाय के नाम काटे जाने का आरोप लगाया है.
BLO पर ही भार डाला गयालेकिन आरोप लगाने वाले राजनीतिक दलों ने कहीं भी अपने BLA नहीं भेजे. यदि इनके कार्यकर्ता BLO के साथ खुद भी मतदाताओं के घर जा कर सर्वेक्षण करते तो वोटरों को भी शिकायत नहीं रहती. BLO पर काम का दबाव इतना अधिक था कि कहीं मतदाताओं के नाम गलत लिख दिए गए या पते में त्रुटि रह गई.
साल 2003 के पहले की सूची तो अधिकतर लोगों को मिल नहीं सकी. किसी को भी अपने पिछले निर्वाचन क्षेत्र का नाम नहीं पता था. ऐसे में अकेले BLO से यह उम्मीद करना कि वह 100 प्रतिशत त्रुटिविहीन ड्राफ़्ट तैयार कर लेगा, संभव नहीं है. जबकि चुनाव आयोग के पास अपने कर्मचारी नहीं है. न ही BLO की भर्ती हुई. यह काम अधिकतर उन लोगों को सौंपा गया जो या तो प्राथमिक विद्यालयों में अध्यापक हैं अथवा ज़िला कलेक्ट्रेट, नगर निगम में काम कर रहे संविदा में रखे गए कर्मचारी.
लोगों का उत्साह भी दिखाउन पर जिला अधिकारी का दबाव था कि किसी तरह काम पूरा करो. 2003 की मतदाता सूची में नाम खोजने का हल यह तलाशा गया कि जिन पर शक हो सिर्फ उनके नाम तलाशो. यहां BLO को जिला अधिकारी से छूट मिल गई तो उन्होंने दिखावे के लिए कुछ नाम छोड़ कर सारे नाम फ़ाइनल कर दिए. पर यह पहली बार देखने को मिला कि लोगों ने स्वयं से आगे बढ़ कर मतदाता सूची में अपने नाम दर्ज करवाने के लिए पूरी मशक्कत की.
अभी तक तो कुछ ही लोग मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने को व्याकुल रहते थे. इस बार लोगों को लगा कि भविष्य में शायद मतदाता पहचान पत्र से ही उनके पासपोर्ट बनेंगे या अन्य जरूरी काम होंगे. इसलिए लोग परेशान हुए और नाम जोड़ने को लेकर पूरी कोशिश करते दिखे.
OCI लेने वालों को वोटर लिस्ट से नाम कटवाना जरूरीविदेश में नागरिकता ले चुके प्रवासी भारतीयों को भी OCI (ओवरसीज सिटीजंस ऑफ इंडिया) के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि यदि उनका नाम भारत की मतदाता सूची में दर्ज है तो पहले वे वहां से अपना नाम कटवाएं. पिछले 10 वर्षों में क़रीब दस लाख लोगों ने अपना भारतीय पासपोर्ट छोड़ा है तथा उस देश की नागरिकता ली है, जहां वे रह रहे हैं.
ऐसे में जब भी वे OCI की मांग करते तो पहली शर्त है भारत कि मतदाता सूची से नाम कटवाना. यह बहुत मुश्किल काम था. अब SIR से उनका नाम स्वतः कट गया. इसके अलावा वे लोग भी परेशान रहते थे जिनका नाम किसी और शहर या किसी दूसरे निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज है. उन्हें स्वयं उस क्षेत्र में जा कर नाम कटवाना होता था. मगर निर्वाचन अधिकारी जिले का DM होता है, उसके पास पहुंचना आसान नहीं. मृत लोगों के नाम भी डिलीट हो गए.
मुस्लिम स्वयंसेवी संगठनों का सराहनीय कामकुल मिला कर देखा जाए तो SIR से बहुतों को राहत मिली है. शिकवा-शिकायतें तो बनी रहेंगी और सुधार के मौक़े भी हैं पर इसमें कोई शक नहीं कि निर्वाचन विभाग ने एक बड़ा काम पूरा कर लिया है. शुरू में इसे हौआ बना कर पेश किया गया. खासकर मुसलमानों को लगा कि उनके नाम काटने के लिए बीजेपी सरकार ने यह साज़िश रची है. इसलिए उनके कई स्वयंसेवी संगठन खुद जा कर BLO से पैरवी करते रहे.
इससे BLO का काम भी आसान हो गया. जिन्होंने खुद से अपने SIR फॉर्म को समय से नहीं भरा, उनके साथ अवश्य दिक्कतें हुईं. ग्रामीण क्षेत्रों में फॉर्म भरने का काम जटिल था. और जहां कहीं भी ग्राम प्रधानों ने उदासीनता बरती या विरोधियों के नाम कटवाए, वहां कुछ मुश्किलें भी आईं. फिर भी SIR का काम पूरा कर लेना चुनाव आयोग की एक बड़ी सफलता तो कही ही जाएगी.