निर्वाचन आयोग (ईसी) ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय में अपनी दलील पेश करते हुए बताया कि वह केवल मतदाता के रूप में पंजीकरण के लिए नागरिकता का निर्धारण कर सकता है। साथ ही आयोग ने कहा कि वह किसी को भी निर्वासित नहीं कर सकता और यह तय नहीं कर सकता कि किसी व्यक्ति के पास भारत में रहने का वीजा है या नहीं।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने इस संबंध में दलीलें पेश कीं। पीठ ने उन याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई फिर से शुरू की, जिनमें बिहार समेत कई राज्यों में निर्वाचन आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की कवायद को चुनौती दी गई थी और आयोग की शक्तियों के दायरे, नागरिकता और मताधिकार का निर्धारण करने पर संवैधानिक प्रश्न उठाए गए थे।
सुनवाई की शुरुआत में आयोग के वकील द्विवेदी ने एसआईआर करने के आयोग के निर्णय का समर्थन करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 326 का हवाला दिया और कहा कि यह वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनावों का प्रावधान करता है। उन्होंने दलील दी कि संवैधानिक अर्थों में वयस्क मताधिकार में तीन अलग-अलग तत्व शामिल हैं और पंजीकरण के चरण में इन तीनों का पूरा होना आवश्यक है।
उन्होंने कहा, ‘‘जब तक ये तीनों शर्तें पूरी नहीं होतीं, कोई भी व्यक्ति मतदाता के रूप में पंजीकृत होने का हकदार नहीं होगा।’’ राकेश द्विवेदी ने कहा कि यदि उचित तर्क के आधार पर यह पाया जाता है कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है और फिर भी उसका नाम मतदाता सूची में शामिल है, तो यह संविधान के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।
याचिकाकर्ता एनजीओ एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि हालांकि, नागरिकता मतदान के लिए एक पूर्व शर्त है और इस बात में कोई विवाद नहीं है, लेकिन मूल प्रश्न यह है कि निर्वाचन आयोग के पास नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार है भी या नहीं।
इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि आयोग का रुख यह है कि वह केवल नागरिकों की पहचान कर रहा है, व्यापक अर्थ में नागरिकता का निर्णय नहीं कर रहा है। पीठ ने कहा कि हालांकि आयोग नागरिकता प्रदान करने वाले प्राधिकरण के रूप में कार्य नहीं कर सकता है, लेकिन वह यह सत्यापित करने के लिए जांच कर सकता है कि क्या कोई व्यक्ति जो नागरिक होने का दावा कर रहा है, चुनावी उद्देश्यों के लिए वास्तविक है।
एक फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया था कि यदि किसी व्यक्ति का नाम किसी मतदाता सूची में है, तो उसकी नागरिकता होने का अनुमान लगाया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है कि वह यह सुनिश्चित करे कि गैर-नागरिकों का नाम मतदाता सूची में न हो।
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि नागरिक अधिकारों के प्रति जागरूकता अक्सर आर्थिक समृद्धि के अनुपात में नहीं होती, वहीं प्रधान न्यायाधीश ने हल्के-फुल्के अंदाज में टिप्पणी की, ‘‘अगले चुनावों तक, अगर ऑनलाइन मतदान शुरू हो जाए तो हमें आश्चर्य नहीं होगा।’’ मामले में अगली सुनवाई 20 जनवरी को अपराह्न दो बजे फिर से शुरू होगी।