भारतीय शेयर बाजार लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में गिरावट के साथ बंद हुआ, जहां वैश्विक अनिश्चितताओं, विदेशी निवेशकों की निरंतर बिकवाली और रुपये की कमजोरी ने निवेशकों की धारणा को कमजोर किया। दिन के अंत में हल्की रिकवरी के बावजूद सेंसेक्स 82,000 के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया, जिससे बाजार में सतर्कता और बढ़ गई।
वैश्विक दबाव, विदेशी पूंजी निकासी और मुद्रा कमजोरी ने बाजार पर बढ़ाया बोझ
घरेलू शेयर बाजार में पूरे सत्र के दौरान तेज उतार-चढ़ाव देखने को मिला, जो वैश्विक वित्तीय बाजारों में बने अस्थिर माहौल का साफ संकेत था। 30 शेयरों वाला बीएसई सेंसेक्स 270.84 अंकों या 0.33 प्रतिशत की गिरावट के साथ 81,909.63 पर बंद हुआ। यह स्तर 82,000 के मनोवैज्ञानिक अंक से नीचे रहा, जिसे निवेशक बाजार की मजबूती का एक अहम संकेत मानते हैं। कारोबारी सत्र के दौरान सेंसेक्स ने एक समय 1,056.02 अंकों या 1.28 प्रतिशत की तेज गिरावट के साथ 81,124.45 का इंट्रा-डे निचला स्तर भी छुआ, हालांकि अंतिम घंटों में कुछ खरीदारी से नुकसान की भरपाई होती दिखी।
नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 भी गिरावट के साथ बंद हुआ। यह 75 अंकों या 0.30 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 25,157.50 पर ठहरा। दोनों प्रमुख सूचकांकों की गिरावट यह दर्शाती है कि निवेशक फिलहाल जोखिम लेने से बच रहे हैं और वैश्विक संकेतों को लेकर बेहद सतर्क रुख अपना रहे हैं।
बाजार पर दबाव की सबसे बड़ी वजहों में वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजारों से मिले कमजोर संकेत और विदेशी संस्थागत निवेशकों की लगातार बिकवाली शामिल रही। वैश्विक आर्थिक वृद्धि को लेकर बनी अनिश्चितता, व्यापार से जुड़ी आशंकाएं और विकसित बाजारों में बढ़ती अस्थिरता का असर भारतीय बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। इसके साथ ही रुपये में जारी कमजोरी ने भी निवेशकों की चिंता बढ़ा दी, क्योंकि कमजोर मुद्रा से आयात महंगा होने और कई कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ने की आशंका रहती है।
आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशकों ने पिछले सत्र में भारतीय शेयर बाजार से 2,938.33 करोड़ रुपये की निकासी की। विदेशी निवेशकों की यह निरंतर बिकवाली हालिया बाजार गिरावट का एक प्रमुख कारण बनी हुई है। वैश्विक निवेशक बदलती ब्याज दर अपेक्षाओं, भू-राजनीतिक जोखिमों और मुद्रा में उतार-चढ़ाव के बीच उभरते बाजारों में अपनी हिस्सेदारी पर पुनर्विचार कर रहे हैं। इसके विपरीत, घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 3,665.69 करोड़ रुपये की खरीदारी कर बाजार को कुछ हद तक सहारा दिया, जिससे दिन के अंत में गिरावट सीमित रही।
क्षेत्रीय स्तर पर देखें तो वित्तीय, बैंकिंग और उपभोक्ता क्षेत्र के शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव देखा गया। बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थानों में बिकवाली ने प्रमुख सूचकांकों को नीचे खींचा, क्योंकि निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी और जोखिम से बचने का रुख अपनाया। आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक, एचडीएफसी बैंक और स्टेट बैंक ऑफ इंडिया जैसे दिग्गज शेयर सेंसेक्स के प्रमुख नुकसान उठाने वालों में शामिल रहे। वैश्विक वित्तीय स्थिरता और सख्त होती तरलता स्थितियों को लेकर बनी चिंताओं ने बैंकिंग सेक्टर में सतर्कता बढ़ा दी।
इसके अलावा ट्रेंट, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, लार्सन एंड टुब्रो और मारुति जैसे शेयरों में भी गिरावट देखने को मिली, जिससे बाजार की समग्र धारणा कमजोर बनी रही। व्यापक बाजार में भी दबाव का माहौल रहा, जहां मिडकैप और स्मॉलकैप शेयरों में चुनिंदा बिकवाली देखने को मिली।
हालांकि पूरे बाजार में कमजोरी के बीच कुछ चुनिंदा शेयरों में खरीदारी भी देखने को मिली, जिससे सूचकांकों को कुछ स्थिरता मिली। इटरनल, अल्ट्राटेक सीमेंट, इंटरग्लोब एविएशन और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे शेयर सकारात्मक दायरे में बंद हुए। इन शेयरों में तेजी मुख्य रूप से स्टॉक-विशेष कारकों और निचले स्तरों पर वैल्यू बायिंग के कारण रही। इसके बावजूद, ये सीमित बढ़त बाजार में व्यापक गिरावट को संतुलित करने के लिए पर्याप्त नहीं रही।
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि एशियाई बाजारों से मिले मिश्रित संकेतों और अमेरिकी बाजारों में आई तेज गिरावट ने घरेलू निवेशकों की धारणा को प्रभावित किया। वैश्विक बाजारों में असमान प्रदर्शन ने अनिश्चितता को और बढ़ा दिया है, क्योंकि निवेशक धीमी वैश्विक वृद्धि, सख्त वित्तीय हालात और भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के संभावित प्रभावों को लेकर असमंजस में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि घरेलू अर्थव्यवस्था के बुनियादी संकेत अपेक्षाकृत मजबूत बने हुए हैं, लेकिन निकट अवधि में वैश्विक कारक बाजार की दिशा तय करते रहेंगे।
कमजोर वैश्विक संकेत, सेक्टोरल बिकवाली और सतर्क रुख से बनी अस्थिरता
एशियाई शेयर बाजारों में कारोबारी सत्र के दौरान मिला-जुला रुख देखने को मिला, जिससे घरेलू निवेशकों को कोई स्पष्ट दिशा नहीं मिल सकी। जापान का निक्केई 225 सूचकांक वैश्विक मांग और मुद्रा से जुड़ी चिंताओं के चलते गिरावट के साथ बंद हुआ, जबकि दक्षिण कोरिया का कोस्पी, चीन का शंघाई कंपोजिट और हांगकांग का हैंग सेंग चुनिंदा खरीदारी और नीतिगत उम्मीदों के चलते बढ़त के साथ बंद हुए। इसके विपरीत, यूरोपीय बाजारों में कमजोरी देखने को मिली, जो वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
अमेरिकी बाजारों में पिछली रात आई तेज गिरावट ने भी एशियाई और भारतीय बाजारों पर दबाव बनाया। टेक्नोलॉजी शेयरों से भरा नैस्डैक कंपोजिट 2.39 प्रतिशत लुढ़क गया, जबकि एसएंडपी 500 में 2.06 प्रतिशत और डाओ जोंस इंडस्ट्रियल एवरेज में 1.76 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। वॉल स्ट्रीट पर यह बिकवाली कॉरपोरेट आय को लेकर चिंताओं, ब्याज दरों की दिशा को लेकर अनिश्चितता और व्यापक आर्थिक जोखिमों के कारण हुई, जिससे वैश्विक निवेशकों ने जोखिम वाली परिसंपत्तियों से दूरी बनानी शुरू कर दी।
निवेशकों की नजर कच्चे तेल की कीमतों पर भी बनी रही, जिनमें सत्र के दौरान गिरावट देखने को मिली। वैश्विक बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 1 प्रतिशत की गिरावट के साथ 64.27 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया। आम तौर पर तेल की कम कीमतें भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए सकारात्मक मानी जाती हैं, लेकिन मौजूदा सत्र में इसका असर सीमित रहा क्योंकि निवेशक वैश्विक अस्थिरता, रुपये की कमजोरी और पूंजी प्रवाह जैसे बड़े कारकों पर ज्यादा ध्यान दे रहे थे।
विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय बाजार की हालिया कमजोरी किसी एक कारण का नतीजा नहीं है, बल्कि यह वैश्विक और घरेलू कारकों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाती है। रुपये में लगातार गिरावट निवेशकों के लिए एक अहम चिंता का विषय बनी हुई है, क्योंकि कमजोर मुद्रा से आयात लागत बढ़ती है और खासतौर पर उन कंपनियों के मार्जिन पर असर पड़ता है, जो कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर हैं। इसके अलावा, रुपये में कमजोरी विदेशी निवेशकों के लिए अतिरिक्त जोखिम पैदा करती है, जिससे पूंजी निकासी और तेज हो सकती है और बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
इसके बावजूद कुछ विश्लेषकों ने बाजार में लचीलापन भी देखा है। उनका कहना है कि दिन के निचले स्तरों से अंत तक हुई रिकवरी इस बात का संकेत है कि दीर्घकालिक निवेशक गिरावट को अच्छे शेयरों में निवेश का अवसर मान रहे हैं। मजबूत बुनियादी आधार वाली कंपनियों में निचले स्तरों पर खरीदारी का रुझान अभी भी बना हुआ है, जो बाजार को पूरी तरह टूटने से बचा रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि निकट भविष्य में अस्थिरता बनी रह सकती है, क्योंकि वैश्विक अनिश्चितताएं अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं।
लगातार तीन सत्रों की गिरावट ने निवेशकों को वैल्यूएशन पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां पिछले एक साल में तेज उछाल देखा गया था। वित्तीय और उपभोक्ता क्षेत्र में मुनाफावसूली इस बात का संकेत है कि निवेशक अब ज्यादा चयनात्मक हो गए हैं और आय की स्पष्टता तथा बैलेंस शीट की मजबूती को प्राथमिकता दे रहे हैं। मौजूदा वैश्विक माहौल में निवेशक जोखिम प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं और बिना ठोस आधार के तेजी वाले शेयरों से दूरी बना रहे हैं।
पिछले सत्र पर नजर डालें तो बाजार में भारी दबाव देखने को मिला था, जब सेंसेक्स 1,065.71 अंक या 1.28 प्रतिशत टूटकर 82,180.47 पर बंद हुआ था, जबकि निफ्टी 353 अंक या 1.38 प्रतिशत गिरकर 25,232.50 पर आ गया था। इस गिरावट के बाद लगातार कमजोरी यह दर्शाती है कि बाजार की धारणा फिलहाल नाजुक बनी हुई है और निवेशक हर नकारात्मक संकेत पर सतर्क प्रतिक्रिया दे रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि लंबी अवधि में भारतीय शेयर बाजार का आउटलुक अब भी सकारात्मक है, जिसे आर्थिक वृद्धि की संभावनाओं और संरचनात्मक सुधारों से समर्थन मिलता है। हालांकि निकट अवधि में वैश्विक जोखिम कारक—जैसे विदेशी बाजारों में उतार-चढ़ाव, मुद्रा की दिशा और भू-राजनीतिक तनाव—निवेशकों को सतर्क बनाए रखेंगे। ऐसे माहौल में बाजार सहभागियों के लिए रणनीति यही रहने की संभावना है कि वे मजबूत बुनियादी आधार वाले शेयरों पर ध्यान केंद्रित करें और जोखिम प्रबंधन को प्राथमिकता दें।
आने वाले सत्रों में बाजार की दिशा तय करने में विदेशी निवेशकों के रुख, रुपये की चाल और वैश्विक बाजारों से मिलने वाले संकेत अहम भूमिका निभाएंगे। बीच-बीच में वैल्यू बायिंग के चलते बाजार में उछाल देखने को मिल सकता है, लेकिन जब तक वैश्विक आर्थिक हालात को लेकर स्पष्टता नहीं आती और विदेशी निवेशकों का भरोसा नहीं लौटता, तब तक बाजार में स्थायी तेजी हासिल करना चुनौतीपूर्ण बना रह सकता है।
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