यमन में पहले से ही जंग, भुखमरी और बीमारियों से जूझ रही आम जनता पर अब एक और बड़ी मार पड़ी है. संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने यमन से अपने सैन्य कदम पीछे खींचते ही कई अहम अस्पतालों को दी जा रही मानवीय मदद अचानक बंद कर दी है.
Middle East Eye की एक खबर के मुताबिक इस फैसले का सबसे बड़ा असर उन गरीब मरीजों पर पड़ा है, जिनके लिए ये अस्पताल जीवन रेखा बने हुए थे. खासतौर पर विशेषज्ञ इलाज और जटिल सर्जरी अब अचानक ठप हो गई है.
फैसले की टाइमिंग अहमइस महीने की शुरुआत में यूएई ने यमन से अपनी सैन्य मौजूदगी खत्म कर दी. यह फैसला उस वक्त लिया गया जब उसके समर्थित दक्षिणी अलगाववादी गुटों को सऊदी समर्थित सरकार के दबाव में पीछे हटना पड़ा. इसके साथ ही यूएई ने वर्षों से चल रहे कई मानवीय प्रोजेक्ट्स, खासकर अस्पतालों की फंडिंग भी रोक दी. यमन में एक दशक से जारी संघर्ष ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को लगभग तबाह कर दिया है. ऐसे में यूएई के फंड से बने अस्पताल गरीबों के लिए मुफ्त और बेहतर इलाज का बड़ा सहारा थे.
अस्पताल खुले हैं, लेकिन इलाज अधूरायूएई के समर्थन से बने मोखा का अस्पताल और शबवा अस्पताल जैसे दर्जनों स्वास्थ्य केंद्र अब मुश्किल दौर से गुजर रहे हैं. ये अस्पताल तो खुले हैं, लेकिन विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं बंद हो चुकी हैं. वजह यह है कि यूएई ने इन अस्पतालों का संचालन कर रही विदेशी मेडिकल कंपनियों के साथ अनुबंध अचानक खत्म कर दिए. इसका नतीजा यह हुआ कि किडनी, हार्ट और जटिल सर्जरी के मरीज इलाज की कतार में फंस गए हैं. निजी अस्पतालों में इलाज की लागत इतनी ज्यादा है कि आम यमनी के लिए वहां जाना लगभग नामुमकिन है.
सऊदी अरब ने ली कमानयूएई के कदम के बाद सऊदी अरब ने हालात बिगड़ने से रोकने के लिए आगे कदम बढ़ाया है. सऊदी डेवलपमेंट एंड रिकंस्ट्रक्शन प्रोग्राम फॉर यमन ने करीब 1.9 अरब सऊदी रियाल (करीब 500 मिलियन डॉलर) की सहायता का ऐलान किया है. इसमें अस्पतालों के साथ-साथ बिजली और बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट भी शामिल हैं. हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि यह ट्रांजिशन तुरंत असरदार नहीं हो पाया है. विशेषज्ञ स्टाफ की कमी अब भी बनी हुई है और मरीज असमंजस की स्थिति में हैं.
राजनीति के बीच फंसी इंसानियतMiddle East Eye के मुताबिक यमन के कई इलाकों में यह धारणा मजबूत हो रही है कि यूएई की मानवीय मदद सैन्य और राजनीतिक हितों से जुड़ी हुई थी. जैसे ही यूएई की सैन्य मौजूदगी खत्म हुई, वैसे ही मदद भी रोक दी गई. इससे आम लोगों में गुस्सा और मायूसी दोनों बढ़ी है. स्थानीय जानकार मानते हैं कि अगर यूएई चाहता तो सैन्य वापसी के बावजूद अस्पतालों की मदद जारी रख सकता था, कम से कम तब तक जब तक कोई दूसरा देश पूरी जिम्मेदारी न संभाल लेता.
मरीजों पर सबसे भारी असरइस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा नुकसान उन गरीब मरीजों को हुआ है, जिनके पास न तो पैसे हैं और न ही विकल्प. कई लोग दूर-दराज के इलाकों से इन अस्पतालों तक सिर्फ इस उम्मीद में आते थे कि यहां मुफ्त और बेहतर इलाज मिलेगा. अब वही लोग इलाज अधूरा छोड़कर लौटने को मजबूर हैं.
सऊदी अरब की ओर से मदद का भरोसा जरूर दिया गया है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि नुकसान हो चुका है. यमन में स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा फिर से कायम करना आसान नहीं होगा. इस पूरे घटनाक्रम ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या युद्धग्रस्त देशों में मानवीय मदद को राजनीतिक हथियार बनाना सही है.