Life lessons from Mahabharata: सनातन परंपरा में भीष्म अष्टमी का पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रद्धा भाव से मनाया जाता है. साल 2026 में भीष्म अष्टमी सोमवार, 26 जनवरी को पड़ रही है, जिसकी अष्टमी तिथि 25 जनवरी 2026 रात 11:10 बजे से शुरू होकर 26 जनवरी 2026 रात 09:17 बजे तक रहेगी. इस दिन महाभारत के महान पात्र पितामह भीष्म को स्मरण किया जाता है. जिन्हें धर्म, त्याग और वचन पालन का सर्वोच्च उदाहरण माना गया है.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भीष्म अष्टमी के दिन पितामह भीष्म ने इच्छामृत्यु का वरदान त्याग कर देह त्याग किया था. इसी कारण यह तिथि धर्म के स्तंभ माने जाने वाले भीष्म पितामह को समर्पित है. श्रद्धालु इस दिन तर्पण, पूजा और स्मरण के माध्यम से उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं.
पितामह भीष्म का जीवन त्याग और समर्पणपितामह भीष्म का जीवन त्याग, ब्रह्मचर्य और वचन निभाने का श्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है. उन्होंने अपने पिता राजा शांतनु के वचन की रक्षा के लिए जीवन भर ब्रह्मचर्य का कठोर संकल्प लिया. इसी व्रत के कारण उन्हें भीष्म के नाम से जाना गया. धर्म के प्रति उनकी निष्ठा इतनी मजबूत थी कि उन्होंने अपने सुख, अधिकार और व्यक्तिगत इच्छाओं को त्याग कर हस्तिनापुर की सेवा को ही अपना कर्तव्य मान लिया.
महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह ने धर्म और कर्तव्य के बीच संतुलन बनाए रखा. वे जानते थे कि सत्य और धर्म का मार्ग आसान नहीं होता, फिर भी उन्होंने कभी अपने वचन और मर्यादा से समझौता नहीं किया. जीवन के हर चरण में उन्होंने संयम, धैर्य और कर्तव्य को महत्व दिया. इसी कारण पितामह भीष्म को आज भी धर्म का स्तंभ कहा जाता है.
भीष्म अष्टमी का धार्मिक महत्व और परंपराभीष्म अष्टमी को विशेष रूप से पितृ तर्पण और धर्म स्मरण का दिन माना जाता है. शास्त्रों में उल्लेख है कि इस दिन पितामह भीष्म का तर्पण करने से पितृ दोष में कमी आती है और परिवार में शांति का वास होता है. कई स्थानों पर श्रद्धालु नदी या जल स्रोत के पास जाकर तिल, जल और कुश से भीष्म तर्पण करते हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भीष्म पितामह का स्मरण करने से जीवन में धर्म, संयम और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है. यही कारण है कि यह पर्व केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और धर्म पालन का अवसर भी माना जाता है.
आज के समय में भीष्म पितामह की सीखआधुनिक युग में भी पितामह भीष्म के आदर्श उतने ही प्रासंगिक हैं. उनका जीवन सिखाता है कि वचन पालन, नैतिकता और कर्तव्य बोध से ही समाज मजबूत बनता है. भीष्म अष्टमी के अवसर पर लोग उनके चरित्र से प्रेरणा लेकर जीवन में सत्य और धर्म का मार्ग अपनाने का संकल्प लेते हैं. माता-पिता और गुरुजन बच्चों को भीष्म पितामह की कथा सुनाकर संस्कारों का महत्व समझाते हैं. शास्त्रों के अनुसार, इस दिन किया गया स्मरण और पूजा मनुष्य को आत्मबल प्रदान करती है. इसलिए भीष्म अष्टमी केवल एक पौराणिक स्मृति नहीं, बल्कि धर्म, मर्यादा और त्याग की जीवंत प्रेरणा है.
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