नई दिल्ली, 27 जनवरी। शास्त्रीय संगीत की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जिनकी चमक समय के साथ और भी बढ़ती है। पंडित जसराज, जिन्हें शास्त्रीय संगीत के 'मार्तण्ड' के रूप में जाना जाता है, ऐसे ही एक अद्वितीय कलाकार हैं। उन्होंने मेवाती घराने की परंपरा को न केवल संजोया, बल्कि इसे वैश्विक पहचान भी दिलाई।
उनकी भक्ति से भरी गायकी, अनोखी 'जसरंगी' शैली और आध्यात्मिक भजन आज भी लाखों लोगों के दिलों को छूते हैं। पंडित जसराज की कला और समर्पण ने शास्त्रीय संगीत को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, जो आज भी जीवित है। 28 जनवरी को उनके जन्मदिन के अवसर पर हम उनकी यादों को ताजा करते हैं।
एक बार उन्होंने एक भावुक किस्सा साझा किया था, जिसमें महान गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खां उनकी वजह से रो पड़े थे। यह घटना 1960 की है, जब पंडित जसराज मुंबई आए थे और उस्ताद से मिलने गए। उस समय खां साहब बीमार थे।
उन्होंने बताया, "मैं 1960 में मुंबई गया था, मेरे साथ डॉक्टर मुकुंदलाल भी थे। जब मैं उस्ताद से मिला, तो उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। हमने उनके पैर दबाए और उनसे बातचीत की, जिससे वह काफी खुश हुए। अचानक उन्होंने कहा, 'मेरा शागिर्द बन जा।'"
पंडित जसराज ने आगे कहा, "यह सुनकर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि मैंने कभी नहीं सोचा था कि इतने बड़े उस्ताद मुझसे ऐसा कहेंगे। मैंने विनम्रता से कहा, 'चाचा जान, मैं आपसे गाना नहीं सीख सकता।' यह सुनकर खां साहब भावुक हो गए और उनकी आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, 'अल्लाह तेरी हर मुराद पूरी करे।'"
जसराज ने बताया कि खां साहब का रोना उनकी भावनाओं की गहराई को दर्शाता था। वे पहले से ही अपने बड़े भाई पंडित मणिराम के शिष्य थे और मेवाती घराने की परंपरा को निभा रहे थे। खास बात यह थी कि वह अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने मना कर दिया, लेकिन यह इनकार सम्मान से भरा था।
पंडित जसराज का जन्म 28 जनवरी 1930 को हुआ था। वे मेवाती घराने के प्रमुख गायक थे। उनके पिता पंडित मोतीराम भी इस घराने के प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। जब जसराज चार साल के थे, तब उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनके बड़े भाइयों ने उन्हें संगीत सिखाया।
बचपन से ही संगीत उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। तीन साल की उम्र में उनके पिता उन्हें सरगम सिखाते थे। जब वह 'तिरछी नजरिया दिखा गयो रे...' गाते थे, तो गड़बड़ी हो जाती थी, जिस पर उनके पिता हंसते थे। 11 साल की उम्र में जसराज ने मंच पर तबला वादन किया, लेकिन गायन की ललक उनके मन में थी।
एक गुरु ने कहा, "तबले में ताकत है, लेकिन तेरी आवाज में जादू है।" पंडित जसराज ने मेवाती घराने की परंपरा को न केवल संजोया, बल्कि इसे विश्व स्तर पर नई पहचान भी दी। उनकी गायकी में भक्ति और शास्त्र का अनोखा मेल था।
उनके भजन जैसे "मात-पिता गुरु गोविंद दियो..." सुनने वालों को आध्यात्मिक अनुभव देते थे। उन्होंने 'जसरंगी' नाम की अनूठी जुगलबंदी शैली विकसित की, जिसमें पुरुष और महिला गायक अलग-अलग राग गाते हैं और फिर एक स्वर में मिल जाते हैं।
उनकी कला की कोई सीमा नहीं थी। भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा और यूरोप में उन्होंने हजारों लोगों को मंत्रमुग्ध किया। पंडित जसराज ने 17 अगस्त 2020 को दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी गायकी आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित है।