अजित पवार के निधन से महाराष्ट्र की राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण परिवर्तन आ सकता है। यह घटना न तो अप्रत्याशित है और न ही चौंकाने वाली। जब भी किसी प्रमुख नेता का असामयिक निधन होता है, तो राजनीतिक समीकरण बदल जाते हैं। उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू की हेलीकॉप्टर दुर्घटना के बाद वहां की राजनीति में स्थायी बदलाव आया। उनके बेटे पेमा खांडू ने अलग पार्टी बनाई और बाद में भाजपा में विलय कर मुख्यमंत्री बने। इस घटना ने कांग्रेस के मजबूत आधार को समाप्त कर दिया।
इसी तरह, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर रेड्डी की हेलीकॉप्टर दुर्घटना ने भी राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया। उनके निधन के बाद कांग्रेस ने उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री नहीं बनाया, जिसके परिणामस्वरूप राज्य का विभाजन हुआ। इसके बाद से कांग्रेस का आंध्र प्रदेश में कोई प्रभाव नहीं रहा।
मध्य प्रदेश में माधवराव सिंधिया के निधन के बाद कांग्रेस केवल एक बार बहुमत के करीब पहुंची। राजीव गांधी के निधन के बाद की राष्ट्रीय राजनीति में भी उथलपुथल देखी गई। अजित पवार के निधन के बाद महाराष्ट्र की राजनीति में भी कई चीजें बदल सकती हैं। उनकी पार्टी भले ही बनी रहे, लेकिन उनके जैसा नेता मिलना मुश्किल होगा।
2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने 235 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन सरकार गठन में कई दिन लगे थे। अजित पवार ने उस समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अब, उनके बिना, देवेंद्र फड़नवीस को पार्टी के अंदर और बाहर के संघर्षों का सामना अकेले करना होगा।
अजित पवार की पार्टी के सामने कई विकल्प हैं। एक विकल्प यथास्थिति बनाए रखना है, लेकिन नेता के बिना यह संभव नहीं है। यदि पार्टी स्वतंत्रता बनाए रखती है, तो यह अच्छा होगा, लेकिन इसके लिए एक मजबूत नेता की आवश्यकता है।
अजित पवार के अचानक चले जाने से भाजपा को अपने विस्तार की संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। जब शिवसेना और एनसीपी एकजुट थीं, तब भाजपा अपने विस्तार में असमर्थ थी। अब, दोनों पार्टियों के कमजोर होने के बाद, भाजपा पश्चिमी महाराष्ट्र और मराठवाड़ा में अपने आधार को बढ़ा सकती है।
अजित पवार के निधन से महाराष्ट्र की राजनीति में उथलपुथल का दौर शुरू होगा। शरद पवार इस स्थिति को समझते हुए भाजपा की विस्तारवादी राजनीति के संभावित नुकसान पर चर्चा करेंगे। अगले कुछ दिनों में, जब अजित पवार के निधन से उत्पन्न तूफान थमेगा, तब दीर्घकालिक राजनीति की तस्वीर स्पष्ट होने लगेगी।