प्रयागराज, 30 जनवरी . प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और उनके शिष्यों के साथ Police द्वारा कथित दुर्व्यवहार के खिलाफ Supreme Court में Friday को जनहित याचिका (पीआईएल) दाखिल की गई.
अधिवक्ता उज्ज्वल गौर द्वारा दाखिल इस याचिका में मौनी अमावस्या (18 जनवरी) के दिन हुई घटना को आधार बनाते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) तथा 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है.
याचिका में कहा गया है कि मौनी अमावस्या के राजसी स्नान के दौरान शंकराचार्य की पालकी को Police ने रोका, शिष्यों और ब्राह्मण विद्यार्थियों के साथ धक्का-मुक्की, मारपीट और अपमानजनक व्यवहार किया गया. वीडियो फुटेज में शिखा पकड़कर घसीटने और बल प्रयोग के दृश्य सामने आए हैं, जिससे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची और कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे हैं.
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि धार्मिक व्यक्तियों, खासकर शंकराचार्यों और संतों के साथ Police कार्रवाई के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया (एसओपी) नहीं है, जिससे मनमानी बढ़ती है और संतों को अपमानित किया जाता है.
याचिका में Supreme Court से मांग की गई है कि माघ मेले या किसी अन्य धार्मिक आयोजन में शंकराचार्य, धर्माचार्य और संतों के लिए एक स्थायी एसओपी बनाया जाए, जिसमें उनके राजसी स्नान, पालकी प्रवेश और सुरक्षा का प्रावधान हो. धार्मिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के खिलाफ Governmentी ज्यादतियों की शिकायत के लिए प्रभावी तंत्र स्थापित किया जाए, ताकि पीड़ितों को त्वरित राहत मिल सके. यह भी मांग की गई कि ऐसी घटनाओं में Police की मनमानी पर दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, जिससे भविष्य में धार्मिक स्वतंत्रता का हनन न हो.
यह विवाद मौनी अमावस्या पर शुरू हुआ, जब शंकराचार्य संगम स्नान के लिए जा रहे थे. Police ने बैरिकेडिंग और भीड़ प्रबंधन के नाम पर उन्हें रोका, जिसके बाद शिष्यों ने विरोध किया और झड़प हो गई.
शंकराचार्य ने इसे अपमान बताते हुए 10-11 दिनों तक धरना दिया, अनशन किया और अंततः बिना स्नान किए 28 जनवरी को मेला छोड़कर वाराणसी लौट गए. उन्होंने योगी Government पर ‘नकली हिंदू’ को बढ़ावा देने का आरोप लगाया.
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एससीएच/एबीएम