सदन में माइक कौन बंद करता है, क्या हैं नियम? राहुल-अखिलेश को बोलने से रोका तो बना मुद्दा
TV9 Bharatvarsh February 03, 2026 04:43 PM

भारतीय लोकतंत्र के मंदिर संसद में ‘माइक’ का बंद होना या चालू होना अक्सर तीखी बहस और विवाद का विषय बनता है. हाल ही में लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के भाषणों के दौरान माइक बंद होने के आरोपों ने इस मुद्दे को फिर से गरमा दिया है.

विपक्ष का आरोप है कि उनकी आवाज को दबाने के लिए माइक बंद किया जाता है, जबकि सत्ता पक्ष और संसदीय सचिवालय इसे तकनीकी प्रक्रिया और नियमों का हिस्सा बताते हैं.

माइक को कौन कंट्रोल करता है?

सदन की कार्यवाही के दौरान माइक का नियंत्रण सीधे तौर पर लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) या सदन की अध्यक्षता कर रहे पीठासीन अधिकारी के पास होता है. हालांकि, स्पीकर स्वयं कोई बटन नहीं दबाते. उनके आसन के पास एक तकनीकी टीम और सचिवालय के अधिकारी होते हैं जो स्पीकर के निर्देशों का पालन करते हैं. संसद की नियमावली के अनुसार, केवल उसी सदस्य का माइक चालू किया जाता है जिसे अध्यक्ष ने बोलने की अनुमति दी हो. जैसे ही अध्यक्ष किसी अन्य सदस्य का नाम पुकारते हैं या बोलने वाले सदस्य को बैठने का निर्देश देते हैं, तकनीकी टीम पिछले सदस्य का माइक बंद कर देती है.

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When Akhilesh Yadav stood in support of Rahul Gandhi on National security,

His mic was turned off in few seconds as camera focus was shifted to speaker Om Birla

Akhilesh + Rahul will defeat arrogant BJP in 2027 UP election ☠️🔥 pic.twitter.com/RpLgcS2mfv

— PEGGYASHU (@peggyashu)

क्या हैं इससे जुड़े नियम?

लोकसभा के संचालन के लिए प्रक्रिया और कार्य संचालन नियम (Rules of Procedure and Conduct of Business) बने हुए हैं. माइक के संबंध में मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं.

  • अध्यक्ष की अनुमति: नियम 350 के तहत कोई भी सदस्य तभी बोल सकता है जब वह अध्यक्ष द्वारा पुकारा जाए. यदि कोई सदस्य बिना अनुमति के खड़ा होकर बोलने लगता है, तो उसका माइक चालू नहीं किया जाता.
  • असंगत बातें हटाना: यदि कोई सदस्य ऐसी भाषा का प्रयोग करता है जो असंसदीय है या सदन की गरिमा के खिलाफ है, तो अध्यक्ष उसे रिकॉर्ड से हटाने (Expunge) का आदेश दे सकते हैं. ऐसी स्थिति में भी माइक बंद किया जा सकता है.
  • समय सीमा: हर दल को उसकी सदस्य संख्या के आधार पर समय आवंटित किया जाता है. समय समाप्त होने पर अध्यक्ष सदस्य को अपनी बात समाप्त करने का संकेत देते हैं और फिर माइक स्वतः या निर्देशानुसार बंद कर दिया जाता है.
  • व्यवधान की स्थिति: यदि सदन में भारी शोर-शराबा हो रहा हो और अध्यक्ष कार्यवाही स्थगित करने वाले हों, तो सभी माइक बंद कर दिए जाते हैं ताकि अव्यवस्था रिकॉर्ड न हो.
राहुल गांधी और अखिलेश यादव का मुद्दा

विपक्ष के दो प्रमुख नेताओं, राहुल गांधी और अखिलेश यादव ने माइक बंद होने को ‘लोकतंत्र की हत्या’ और विपक्ष की आवाज दबाने के प्रतीक के रूप में पेश किया है. राहुल गांधी ने कई बार आरोप लगाया है कि जब वे अडानी मुद्दे या जाति जनगणना जैसे संवेदनशील विषयों पर बोलते हैं, तो उनका माइक बंद कर दिया जाता है. उनका तर्क है कि एक सांसद के रूप में उन्हें अपनी बात पूरी करने का संवैधानिक अधिकार है. हाल ही में जब अखिलेश यादव सदन में बोल रहे थे और उन्होंने राहुल गांधी के समर्थन में कुछ तीखी टिप्पणियां कीं, तो उनका माइक बंद हो गया. अखिलेश ने इसे सदन की गरिमा और सदस्यों के अधिकारों का हनन बताया.

किस बात पर बंद कराया गया माइक?

असल में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी बीते सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए डोकलाम में कई चीनी टैंक के भारतीय सीमा में पहुंचने की बात कही. उन्होंने पूर्व थल सेनाध्यक्ष नरवणे की किताब का उल्लेख किया. एक मैगजीन की भी चर्चा की. इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उन्हें टोका.

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी यह बताएं कि किताब पब्लिश हुई है या नहीं? वे सदन को गुमराह न करें. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किताब सदन में रखने पर जोर दिया. इसके बाद सत्ता पक्ष से कई मंत्री, सांसद राहुल के भाषण का विरोध करते देखे गए. 46 मिनट के राहुल के भाषण के दौरान हंगामा ही चलता रहा. जब उनके समर्थन में अखिलेश यादव खड़े हुए और देश के हित में चीन के संवेदनशील मुद्दे पर बात करने का समर्थन करने लगे तो थोड़ी ही देर बाद उनका माइक बंद कर दिया गया.

अक्सर सवाल क्यों उठते हैं?

माइक बंद होने पर सवाल उठने के पीछे कई राजनीतिक और तकनीकी कारण हैं और इसके निहितार्थ भी हैं. विपक्ष का मानना है कि सत्ता पक्ष के मंत्रियों और सांसदों को बोलने के लिए अधिक लचीलापन दिया जाता है, जबकि विपक्ष के नेताओं के माइक समय सीमा खत्म होते ही तुरंत बंद कर दिए जाते हैं. जब किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहस चल रही हो और अचानक माइक बंद हो जाए, तो जनता के बीच यह संदेश जाता है कि सरकार कुछ छिपाना चाहती है या बहस से डर रही है.

संसद की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है. माइक बंद होने से टीवी पर देख रही जनता को केवल विजुअल्स दिखते हैं, आवाज नहीं. इससे भ्रम और आक्रोश की स्थिति पैदा होती है. भारत में लोकसभा के स्पीकर प्रायः सत्ताधारी दल से आते हैं इसलिए, उनके हर फैसले को राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है. इसी वजह से अक्सर विवाद होता है.

सदन में माइक का नियंत्रण तकनीकी से ज्यादा एक अनुशासनात्मक उपकरण है. जहां एक ओर सदन को सुचारू रूप से चलाने के लिए नियमों का पालन अनिवार्य है, वहीं दूसरी ओर यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि विपक्ष की जायज आवाज को तकनीकी आधार पर दबाया न जाए.

लोकतंत्र की मजबूती इस बात में है कि सदन के भीतर हर सदस्य को यह महसूस हो कि उसकी बात सुनी जा रही है. माइक का बंद होना केवल एक तकनीकी क्रिया नहीं, बल्कि संवाद की निरंतरता का प्रतीक है. यदि यह विवाद बार-बार उठता है, तो शायद समय आ गया है कि माइक संचालन की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए ताकि पीठासीन अधिकारी की निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे.

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