Valentine's Day 2026: दिल्ली-आगरा हारने के बाद हुमायूं को कैसे हुआ हमीदा से प्यार? एक शर्त ने जीत लिया दिल
TV9 Bharatvarsh February 05, 2026 11:43 AM

दिल्ली और आगरा की सत्ता गंवाने के बाद मुगल बादशाह हुमायूं का जीवन किसी फिल्मी त्रासदी से कम नहीं था. लेकिन इसी निर्वासन और संघर्ष के बीच एक ऐसी प्रेम कहानी ने जन्म लिया, जिसने न केवल हुमायूं के जीवन को सहारा दिया, बल्कि हिंदुस्तान को उसका सबसे महान शासक अकबर भी दिया.

वैलेंटाइंस डे की तैयारियों के इस दौर में, आइए इतिहास के पन्नों को पलटते हैं और जानते हैं मुगल बादशाह हुमायूं और हमीदा बानो बेगम की प्यार की वह दास्तान, जो महलों की चकाचौंध में नहीं, बल्कि रेगिस्तान की तपती रेत और अनिश्चितता के साये में शुरू हुई थी.

सत्ता का पतन और निर्वासन की राह

साल 1540 में कन्नौज की लड़ाई में शेरशाह सूरी से हारने के बाद हुमायूं का साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह ढह गया. दिल्ली और आगरा उसके हाथ से निकल चुके थे. हुमायूं अपने भाइयों और वफादार सैनिकों के साथ दर-दर भटकने को मजबूर था. वह मदद की तलाश में सिंध की ओर बढ़ा. यह हुमायूं के जीवन का सबसे कठिन दौर था, जहाँ एक तरफ उसे अपनी जान बचाने की फिक्र थी और दूसरी तरफ खोई हुई सल्तनत को वापस पाने की तड़प. इसी संघर्ष के दौरान, हुमायूं अपने भाई हिंदाल के पास पहुंचा, जो उस समय सिंध के इलाके में था. यहीं हुमायूं की मुलाकात उस लड़की से हुई, जो आगे चलकर उसकी मरियम मकानी बनने वाली थी.

Humayun And Hamida Banu Begum

पहली नजर का वह अहसास

सिंध के पातर (Paatar) नामक स्थान पर हिंदाल के गुरु शेख अली अकबर जामी रहते थे. उनकी एक 14 साल की बेहद खूबसूरत और बुद्धिमान बेटी थी, हमीदा बानो. जब हुमायूं ने पहली बार हमीदा को देखा, तो वह उसकी सादगी और व्यक्तित्व पर मोहित हो गया.

मुगल सल्तनत की महिला इतिहासकार गुलबदन बेगम (हुमायूं की बहन) ने हुमायूंनामा में इस मुलाकात का जिक्र किया है. हुमायूं ने हमीदा से निकाह करने की इच्छा जताई, लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं थी. हमीदा के पिता और खुद हमीदा इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं थे. इसके पीछे कई कारण थे, जिनमें सबसे बड़ा कारण हुमायूं की तत्कालीन स्थिति थी. वह एक ऐसा राजा था जिसके पास न राज्य था, न धन और न ही कोई निश्चित भविष्य.

हमीदा की वो शर्त और हुमायूं की जिद

हमीदा बानो एक स्वाभिमानी युवती थी. जब हुमायूं ने निकाह का पैगाम भेजा, तो हमीदा ने उसे ठुकरा दिया. उसकी शर्त व्यावहारिक और दिलचस्प थी. उसने कहा था-मैं ऐसे व्यक्ति से निकाह करना चाहती हूं जिसका हाथ मेरे गिरेबान तक पहुंच सके, न कि ऐसे व्यक्ति से जिसका हाथ इतना ऊंचा हो कि मैं उसे छू भी न सकूं. हमीदा का इशारा हुमायूं के बादशाह होने की ओर था, भले ही वह उस वक्त सत्ता में नहीं था. उसे डर था कि एक बादशाह की कई पत्नियों के बीच उसका अस्तित्व खो जाएगा.

हुमायूं की बेगम हमीदा.

हुमायूं ने हार नहीं मानी. उसने कई दिनों तक हमीदा को मनाने की कोशिश की. उसने संदेश भिजवाया कि वह उसे केवल एक रानी की तरह नहीं, बल्कि अपने जीवन की सबसे महत्वपूर्ण साथी की तरह रखेगा. लगभग 40 दिनों के इंतजार और मान-मनौव्वल के बाद, हमीदा की मां के समझाने पर वह निकाह के लिए तैयार हुई. सितंबर 1541 में, सिंध की तपती गर्मी और अनिश्चित भविष्य के बीच, हुमायूं और हमीदा का निकाह हुआ.

रेगिस्तान का सफर और प्रेम की परीक्षा

निकाह के बाद का समय किसी हनीमून जैसा सुखद नहीं था. हुमायूं और हमीदा को सिंध और राजस्थान के रेगिस्तानों में भटकना पड़ा. पानी की कमी, भीषण गर्मी और दुश्मनों का डर हर वक्त बना रहता था. हमीदा ने एक राजकुमारी की तरह महलों में रहने के बजाय, अपने पति के साथ घोड़े पर सवार होकर मीलों का सफर तय किया. इतिहास बताता है कि एक बार जब हुमायूं के पास सवारी के लिए घोड़ा नहीं था, तो हमीदा ने अपना घोड़ा उसे दे दिया और खुद पैदल चलने को तैयार हो गई. यह वह दौर था जब हुमायूं को अहसास हुआ कि हमीदा केवल उसकी पत्नी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत है.

अमरकोट का किला और अकबर का जन्म

भटकते हुए हुमायूं को अमरकोट के राणा प्रसाद ने शरण दी. यहीं 15 अक्टूबर 1542 को हमीदा ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम जलालुद्दीन मोहम्मद रखा गया, जिसे दुनिया आज अकबर के नाम से जानती है. बेटे के जन्म ने हुमायूं के डूबते हुए हौसलों को नई उड़ान दी. हमीदा ने न केवल हुमायूं को भावनात्मक सहारा दिया, बल्कि कठिन समय में उसे सही सलाह भी दी.

ईरान का प्रवास और सत्ता की वापसी

जब हुमायूं को भारत छोड़कर ईरान (फारस) के शाह तहमास्प की शरण में जाना पड़ा, तब भी हमीदा साये की तरह उसके साथ रही. ईरान के दरबार में हमीदा की बुद्धिमत्ता की काफी प्रशंसा हुई. शाह की मदद से हुमायूं ने धीरे-धीरे कंधार और काबुल जीता और अंततः 1555 में दिल्ली के तख्त पर दोबारा कब्जा किया. हुमायूं की इस जीत के पीछे हमीदा का वह अटूट विश्वास था, जिसने उसे 15 साल के लंबे निर्वासन के दौरान कभी टूटने नहीं दिया.

अमर प्रेम का प्रतीक है हुमायूं का मकबरा

हुमायूं की मृत्यु के बाद, हमीदा बानो बेगम ने अपने पति की याद में दिल्ली में एक भव्य मकबरा बनवाया, जिसे आज हम हुमायूं का मकबरा (Humayun’s Tomb) के नाम से जानते हैं. यह भारत में मुगल वास्तुकला का पहला बड़ा उदाहरण था, जिसने बाद में ताजमहल की प्रेरणा बनी. यह मकबरा केवल पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि हमीदा का अपने पति के प्रति प्रेम का एक शाश्वत स्मारक है.

दिल्ली स्थित हुमायूं का मकबरा.

हुमायूं और हमीदा की कहानी हमें सिखाती है कि प्रेम केवल अच्छे समय का साथी नहीं होता. सच्चा प्रेम वह है जो हार में, निर्वासन में और अभाव में भी साथ खड़ा रहे. दिल्ली और आगरा हारने के बाद हुमायूं ने भले ही अपनी सल्तनत खो दी थी, लेकिन हमीदा के रूप में उसने एक ऐसा साम्राज्य पा लिया था, जिसकी नींव वफादारी और सम्मान पर टिकी थी.

वैलेंटाइंस वीक में जब हम प्रेम की बात करते हैं, तो हुमायूं और हमीदा की यह ऐतिहासिक दास्तान याद दिलाती है कि कठिन से कठिन समय में भी अगर जीवनसाथी का साथ हो, तो खोई हुई सल्तनत और खोया हुआ सम्मान वापस पाया जा सकता है. हमीदा बानो बेगम इतिहास की उन चंद महिलाओं में से एक हैं, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर एक साम्राज्य के पुनरुत्थान में सबसे बड़ी भूमिका निभाई.

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