पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य कर्मचारियों के बीच लंबे समय से चले आ रहे महंगाई भत्ता (DA) विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया है. जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा है कि राज्य सरकार को कर्मचारियों का 2009 से 2019 तक का बकाया डीए जारी करना होगा. जजों ने राज्य सरकार की वित्तीय तंगी से जुड़ी दलीलों को खारिज कर दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लगभग 20 लाख कर्मचारियों को बड़ी राहत मिली है. कोर्ट ने कहा है कि बकाया डीए का कम से कम 25 प्रतिशत हिस्सा 6 मार्च तक कर्मचारियों को दिया जाए. इसके बाद शेष राशि का भुगतान किस तरह और किस समय सीमा में किया जाएगा, इसे तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक उच्चस्तरीय कमेटी के गठन का निर्देश दिया है.
आदेश में कहा गया है कि कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा करेंगी. झारखंड हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस गौतम भादुड़ी कमेटी के सदस्य होंगे. इनके अलावा भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) या उनकी तरफ से मनोनीत एक वरिष्ठ अधिकारी भी कमेटी में होंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने कमेटी से 16 मई तक रिपोर्ट दाखिल करने को कहा है. उसी दिन मामले की अगली सुनवाई भी होगी. राज्य की ममता बनर्जी सरकार ने कहा था कि बढ़ा हुआ डीए देने से उस पर करीब 43 हजार करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ पड़ेगा, लेकिन कोर्ट ने इस दलील को ठुकरा दिया है. कोर्ट ने कहा कि महंगाई भत्ता कर्मचारियों का अधिकार है, कोई उपकार नहीं. सरकार की खराब वित्तीय स्थिति के चलते कर्मचारियों को उनके कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता.
ध्यान रहे कि सबसे पहले पश्चिम बंगाल स्टेट एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल ने आदेश दिया था कि देश के दूसरे राज्यों की तरह पश्चिम बंगाल में भी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता होना चाहिए. मई 2022 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को जुलाई 2009 से लंबित डीए तीन महीने के भीतर चुकाने का आदेश दिया था. इस आदेश को ममता बनर्जी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.