अल्केमिस्ट ग्रुप से जुड़े बड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ED को अहम कानूनी जीत मिली है. नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) नई दिल्ली ने 03 फरवरी 2026 को दिए अपने आदेश मेंमेसर्स एल्केमिस्ट लिमिटेड के खिलाफ चल रही कॉर्पोरेट दिवालियापन रिजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) को रद्द कर दिया. ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि ये इंसोल्वेंसी प्रक्रिया सही नीयत से नहीं, बल्कि धोखाधड़ी और मिलीभगत के साथ शुरू की गई थी.
NCLT ने अपने आदेश में ये भी साफ कर दिया कि इंसोल्वेंसी और बैंकरप्सी कोड (IBC) का इस्तेमाल मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े पैसों को वैध बनाने के लिए नहीं किया जा सकता. ट्रिब्यूनल के मुताबिक, कोई भी कंपनी इंसोल्वेंसी का सहारा लेकर मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम कानून के तहत चल रही जांच या संपत्ति जब्ती से नहीं बच सकती.
कोलकाता पुलिस और यूपी पुलिस की FIR पर हुई थी जांच शुरू
ED की जांच कोलकाता पुलिस और यूपी पुलिस की FIR के आधार पर शुरू हुई थी. जांच में सामने आया कि अल्केमिस्ट होल्डिंग्स लिमिटेड और अल्केमिस्ट टाउनशिप इंडिया लिमिटेड ने आम लोगों से प्लॉट, विला, फ्लैट और हाई रिटर्न देने का लालच देकर करीब 1840 करोड़ रुपये से ज्यादा जुटाए, लेकिन न तो निवेशकों को कोई प्रॉपर्टी मिली और न ही उनका पैसा वापस किया गया.
ED के मुताबिक, निवेशकों से जुटाया गया पैसा अल्केमिस्ट ग्रुप की दूसरी कंपनियों में घुमा दिया गया. ये रकम इंटर कॉर्पोरेट डिपॉजिट (ICDs) के जरिए दूसरी ग्रुप कंपनियों को दी गई, जिनमें मेसर्स एल्केमिस्ट लिमिटेड भी शामिल है. इस मामले में ED अब तक कई अभियोजन शिकायतें दाखिल कर चुकी है और करीब 492.72 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियां अटैच की जा चुकी है.
ED की जांच में ये भी सामने आया कि मेसर्स एल्केमिस्ट लिमिटेडके खिलाफ सेक्शन 9, IBC के तहत जानबूझकर इंसोल्वेंसी की अर्जी डाली गई. इस प्रक्रिया में जो कमिटी ऑफ क्रेडिट (CoC) बनी, उस पर भी लगभग पूरी तरह अल्केमिस्ट ग्रुप की ही कंपनियों का कब्जा था. एक ग्रुप कंपनी के पास करीब 97 फीसदी वोटिंग अधिकार थे, यानी फैसले वही लोग ले रहे थे, जो खुद इस मामले में आरोपी है.
ED ने NCLT को ये भी बताया कि CIRP के दौरान जिस रिजोल्यूशन प्रोफेशनल को नियुक्त किया गया. वो पहलेअल्केमिस्ट ग्रुप में काम कर चुका था. इससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो गए. इसके अलावा, NCLT के निर्देशों के बावजूद ED को समय पर इस केस में पार्टी नहीं बनाया गया, जिसे ट्रिब्यूनल ने गलत नीयत माना.
ED की दलीलों से सहमत होते हुए NCLT ने कहा कि IBC एक राहत देने वाला कानून है, न कि अपराध से कमाए गए पैसे को साफ करने का जरिया. ट्रिब्यूनल ने साफ शब्दों में कहा कि IBC की धारा 32A का इस्तेमाल करके PMLA के तहत चल रही आपराधिक कार्रवाई को खत्म नहीं किया जा सकता.
NCLT ने ये भी माना कि आरोपी कंपनियों के कंट्रोल वाली CoC से इंसोल्वेंसी प्रक्रिया की विश्वसनीयता खत्म हो जाती है. अगर ऐसी CIRP को जारी रहने दिया जाता, तो इससे मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े पैसों को वैधता मिलती और ED की कार्रवाई कमजोर पड़ती.
अपने आदेश में NCLT ने CIRP को पूरी तरह रद्द कर दिया, IBC की धारा 14 के तहत लगा मोरेटोरियम हटा दिया, रिजोल्यूशन प्रोफेशनल की नियुक्ति और उसके सभी फैसले भी खत्म कर दिए. इतना ही नहीं, कानून की प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करने के लिए साई टेक मेडिकेयर प्राइवेट लिमिटेड पर 5 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया गया.