भारत में अंतर-मजहबी विवाह न तो नई अवधारणा है, न ही यह अवैध है। दो वयस्कों के बीच प्रेम संबंध में धर्म या जाति को बाधा नहीं बनना चाहिए। लेकिन यदि विवाह का आधार छल है और इसका उद्देश्य केवल मतांतरण के लिए दबाव बनाना है, तो यह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि एक अपराध है।
माननीय न्यायमूर्ति भुइयां जी,
आपने 21 फरवरी को हैदराबाद में एक संगोष्ठी में भारत के सामाजिक ढांचे में मौजूद "गहरी दरारों" पर चर्चा की। आपने दो घटनाओं का उल्लेख किया: एक, दिल्ली में एक मुस्लिम शोधार्थी को उसकी पहचान उजागर होने के बाद आवास न मिलना; और दूसरा, ओडिशा में एक दलित द्वारा बनाए गए मध्यान्ह भोजन को कुछ बच्चों द्वारा अभिभावकों के दबाव में न खाना। किसी भी समाज में धर्म या जाति के आधार पर भेदभाव अस्वीकार्य है और यह संवैधानिक नैतिकता के खिलाफ है।
जब आपका विचार मीडिया में था, उसी समय उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में दलितों पर हमले का मामला सामने आया। शिकायतकर्ता आकाश कुमार के अनुसार, उनके आयोजन में तेज आवाज में डीजे और नाच-गाना चल रहा था, जिसे स्थानीय मुस्लिमों की नमाज के लिए रोक दिया गया। इसके बाद, 15-20 स्थानीय मुस्लिमों ने लाठी-डंडों से जलसे में उपस्थित लोगों पर हमला किया। इस मामले में कई लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है।
दलित उत्पीड़न के मामलों में बुद्धिजीवियों का एक वर्ग अक्सर सक्रिय रहता है, लेकिन बुलंदशहर प्रकरण पर उनकी चुप्पी चिंताजनक है। क्या जातिगत अत्याचारों के प्रति हमारी संवेदनशीलता पीड़ित की धार्मिक पहचान के अनुसार बदलनी चाहिए? यदि आरोपी सवर्ण हिंदू होता, तो क्या इस तरह की खामोशी होती? शायद नहीं।
आपने कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाएं संख्या या शक्ति के बल पर नहीं, बल्कि मूल्यों के आधार पर चलनी चाहिए। क्या यह सच है? क्या सभी वर्गों को बिना किसी पूर्वाग्रह के हर प्रकार के छल, दबाव और हिंसा को पहचानने में ईमानदारी नहीं दिखानी चाहिए? हाल ही में फिल्म 'द केरल स्टोरी 2: गोज बियॉन्ड' पर विवाद ने 'लव-जिहाद' विषय को फिर से चर्चा में ला दिया।
इस संदर्भ में, 23 फरवरी को दिल्ली में फिल्म के निर्माताओं ने प्रेसवार्ता का आयोजन किया, जिसमें जबरन मजहबी मतांतरण की शिकार 33 महिलाओं ने अपने अनुभव साझा किए। इस फिल्म का विरोध इसलिए भी हो रहा है कि प्रेसवार्ता में शामिल पीड़ितों में एक भी महिला केरल से नहीं थी।
एक पीड़िता तारा शाहदेव हैं, जिन्होंने जुलाई 2014 में 'रंजीत' नामक व्यक्ति से विवाह किया, जो बाद में 'रकीबुल हसन' निकला। तारा का कहना है कि विवाह के कुछ ही दिनों में उन पर मतांतरण और गोमांस खाने का दबाव डाला गया। इस मामले में हाल ही में सीबीआई की विशेष अदालत ने रकीबुल को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
यह मामला केवल एक व्यक्ति द्वारा पहचान छिपाकर अपराध करने का नहीं है। प्रेम के नाम पर ऐसे छल-कपट संगठित समूहों द्वारा किया जाता है, जिसमें परिवारों का भी सहयोग होता है।
भारत में अंतर-मजहबी विवाह न तो नए हैं, न ही अवैध। लेकिन यदि विवाह का उद्देश्य केवल मतांतरण के लिए दबाव बनाना है, तो यह स्वतंत्रता नहीं, बल्कि अपराध है। इसमें प्रेम नहीं, बल्कि धर्म विशेष के प्रसार की प्रतिबद्धता है।
हमारी एकजुटता पीड़ित-आरोपी की पहचान से तय नहीं होनी चाहिए। यदि हर अपराध और भेदभाव को समान दृष्टि से नहीं देखा जाएगा, तो संवैधानिक नैतिकता और न्यायिक निष्पक्षता पर प्रश्न उठते रहेंगे।
उपदेश देना सरल है, लेकिन आत्ममंथन कठिन। "सामाजिक दरारों" पर चर्चा करते समय संस्थागत चुनौतियों की भी चर्चा आवश्यक है। केंद्रीय विधि मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि पिछले दस वर्षों में भारत के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को न्यायाधीशों के विरुद्ध 8,630 शिकायतें मिली हैं।
निसंदेह, न्यायाधीश अपने निर्णयों के साथ समाज को दिशा देते हैं। जब हम सिद्धांतों की चर्चा करते हैं, तो न्यायिक दायरे के भीतर भी आत्ममंथन जरूरी हो जाता है।