वेस्ट एशिया संकट से बिगड़ते ग्लोबल रिस्क सेंटिमेंट के बीच पिछले चार ट्रेडिंग सेशन में फॉरेन इन्वेस्टर्स ने इंडियन इक्विटीज से 21,000 करोड़ रुपए (करीब USD 2.3 बिलियन) निकाले हैं. यह लेटेस्ट बिकवाली तब हुई जब फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने फरवरी में इंडियन इक्विटीज में 22,615 करोड़ रुपए डाले थे, जो 17 महीनों में सबसे ज्यादा मंथली इनफ्लो था. इससे पहले, FPIs लगातार तीन महीनों तक नेट सेलर रहे थे. डिपॉजिटरी के डेटा के मुताबिक, उन्होंने जनवरी में 35,962 करोड़ रुपए, दिसंबर में 22,611 करोड़ रुपए और नवंबर में 3,765 करोड़ रुपए निकाले.
लेटेस्ट आउटफ्लो 2-6 मार्च के दौरान हुआ, जब FPIs ने कैश मार्केट में लगभग 21,000 करोड़ रुपए के इक्विटीज बेचे. 3 मार्च को होली की वजह से ट्रेडिंग हॉलिडे था. मार्केट एक्सपर्ट्स ने इस निकासी की मुख्य वजह वेस्ट एशिया में बढ़ते जियोपॉलिटिकल टेंशन को बताया. US और इज़राइल ने 28 फरवरी को ईरान पर एक बड़ा हमला किया, जिसमें ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई मारे गए, जिससे इलाके में लड़ाई शुरू हो गई.
क्यों खराब हुआ सेंटीमेंट?एंजल वन के सीनियर फंडामेंटल एनालिस्ट वकारजावेद खान ने कहा कि होर्मुज स्ट्रेट में संभावित रुकावटों के डर से ब्रेंट क्रूड की कीमतें USD 90 प्रति बैरल से ऊपर चली गईं, जिससे दुनिया भर में रिस्क-ऑफ सेंटिमेंट शुरू हो गया. उन्होंने आगे कहा कि आउटफ्लो में योगदान देने वाले दूसरे फैक्टर्स में रुपए का 92-प्रति-डॉलर लेवल से ज़्यादा कमज़ोर होना, US ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी से कैपिटल का सेफ-हेवन एसेट्स की ओर वापस जाना, और Q4 FY26 कॉर्पोरेट अर्निंग्स के लिए शुरुआती मिले-जुले आउटलुक, खासकर IT और कंजम्प्शन सेक्टर्स में मार्जिन प्रेशर शामिल हैं.
इन कारणों ने बढ़ाया रिस्कजियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार ने कहा कि मिडिल ईस्ट लड़ाई को लेकर अनिश्चितता, हालिया मार्केट करेक्शन, क्रूड की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से भारतीय अर्थव्यवस्था की कमजोरी, और रुपए की गिरावट, इन सभी ने कैश मार्केट में FPI की लगातार बिकवाली में योगदान दिया है. मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव ने कहा कि क्रूड ऑयल की ज़्यादा कीमतें महंगाई, करंट अकाउंट डेफिसिट और करेंसी स्टेबिलिटी से जुड़े रिस्क को बढ़ाती हैं, जो आम तौर पर उभरते बाज़ारों के प्रति विदेशी निवेशकों की सोच पर असर डालती हैं. उन्होंने कहा कि बढ़ती अनिश्चितता के बीच ग्लोबल निवेशक भी US डॉलर जैसे सुरक्षित एसेट्स की ओर शिफ्ट हो गए हैं. इस हफ़्ते US ट्रेजरी यील्ड में हालिया तेज़ी ने उभरते बाज़ारों से कैपिटल आउटफ्लो में और योगदान दिया.
आगे भी जारी रहेगी बिकवाली?आगे, विजयकुमार ने कहा कि जब तक जियोपॉलिटिकल स्थिति पर ज़्यादा क्लैरिटी नहीं आती और क्रूड ऑयल की कीमतें कम नहीं होतीं, तब तक FPI के खरीदार के तौर पर वापस आने की संभावना नहीं है. उन्होंने कहा कि ब्रेंट क्रूड का USD 90 प्रति बैरल से ऊपर ट्रेड करना भारतीय अर्थव्यवस्था और इक्विटी बाज़ारों के लिए नेगेटिव है. FPI की बिकवाली के बावजूद, बाज़ार को घरेलू इंस्टीट्यूशनल निवेशकों (DII) और म्यूचुअल फंड सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (SIP) के ज़रिए लगातार इनफ्लो से सपोर्ट मिलता रहा है.